सिनेमाघरों में भक्ति और आस्था पर आधारित सिनेमा का ऐसा असर देखने को मिल रहा है कि टिकट खिड़की के आंकड़े लगातार नई मिसाल पेश कर रहे हैं। कम लागत में तैयार हुई फिल्म 'हनुमान अंश' सिनेमाघरों में पूरे 40 दिनों से मजबूती के साथ टिकी हुई है और अपने रोजाना के कलेक्शन से कई बड़ी फिल्मों को पीछे छोड़ रही है। इस फिल्म का असली रोमांच केवल बॉक्स ऑफिस पर बरसते रुपयों में नहीं, बल्कि कैमरे के पीछे की उस लगन में है जहां समय और पैसों की जबरदस्त किल्लत के बावजूद टीम ने घुटने नहीं टेके। इस पूरी फिल्म की शूटिंग बेहद कड़े दबाव के बीच केवल 26 दिनों के भीतर समेट ली गई थी। फिल्म निर्माण से जुड़े तमाम साथियों ने इस आध्यात्मिक सफर की कई हैरान करने वाली परतें सामने रखी हैं।
सीमित बजट और 26 दिनों की शूटिंग का सफर
आज हर तरफ 'हनुमान अंश' की कामयाबी की चर्चा है, लेकिन पर्दे के पीछे की राह बेहद चुनौतीपूर्ण थी। शूटिंग के दौरान पैसों की लगातार तंगी बनी हुई थी और वक्त की सख्त पाबंदी थी। इसके बावजूद कलाकारों और क्रू ने मिलकर महज 26 दिनों में पूरा काम निपटा लिया। सबसे बड़ा जोखिम यह था कि इसी विषय से जुड़ी एक अन्य फिल्म मई 2026 में रिलीज होकर बॉक्स ऑफिस पर नाकाम साबित हो चुकी थी। इसके बाद भी निर्माताओं का अपनी कहानी और विषय पर विश्वास तनिक भी नहीं डगमगाया। रिलीज के शुरुआती दो हफ्तों के बाद फिल्म ने जिस तरह रफ्तार पकड़ी, उसने पूरी फिल्म इंडस्ट्री के बड़े दिग्गजों को हैरान कर दिया।
11 भजनों का ताना-बाना और 1930-40 के दशक का संगीत
'हनुमान अंश' की ताकत उसकी भक्ति भावना के साथ-साथ उसका विशिष्ट संगीत भी है। फिल्म के अलग-अलग भावनात्मक मोड़ों पर वातावरण को गहराई देने के लिए एक-दो नहीं, बल्कि पूरे 11 भजनों और गीतों को पिरोया गया है। इसमें 'सासा हाले' से लेकर 'जिद्द पर आ गई पार्वती' जैसे गीत शामिल हैं, जिनकी हर धुन में भारत की देसी मिट्टी और अध्यात्म की महक सुनाई देती है। संगीत को तैयार करते समय इसमें बुंदेली और अवधी भाषा का स्वाभाविक पुट शामिल किया गया, जिससे 1930 और 1940 के दशक की पुरानी दुनिया और उसका सोंधापन आज के दौर में भी जीवंत महसूस होता है।
दतिया के पीताम्बरा पीठ से वंदे भारत एक्सप्रेस तक की कहानी
फिल्म के सबसे ज्यादा पसंद किए जा रहे गीत 'सासा हाले' के बनने की कहानी किसी चमत्कार से कम नहीं है। यह रचना 11वीं शताब्दी में गुरु गोरक्षनाथ जी द्वारा लिखी गई मानी जाती है, जिसका गहरा नाता कुंडलिनी जागरण की योग साधना से है। निर्देशक विशाल चतुर्वेदी जब दतिया स्थित पीताम्बरा पीठ गए थे, तब वहां उन्हें एक दुर्लभ पुस्तक में यह पंक्तियां मिली थीं। इसके बाद उन्होंने इसे फिल्म का अहम हिस्सा बनाने का मन बना लिया।
निर्देशक विशाल चतुर्वेदी उस वक्त वंदे भारत ट्रेन में यात्रा कर रहे थे। सफर के दौरान ही उन्होंने यह पंक्तियां संगीतकार साधु को मोबाइल के जरिए भेजीं। संगीतकार साधु ने उन पंक्तियों को पढ़ते ही गिटार उठाया और सिर्फ 15 मिनट के भीतर पूरे गाने की धुन तैयार कर रिकॉर्डिंग निर्देशक को भेज दी। संगीतकार साधु नियमित रूप से बाबा नीम करोली जी के नाम का जाप सुनते रहे हैं। उन्होंने बाबा जी की तस्वीर के सम्मुख बैठकर एक ही बार में, यानी 'वन गो' में इस अमर धुन की रचना कर दी थी।
नीम करोली बाबा का किरदार और लाइव संगीत की सादगी
बजट सीमित होने के बाद भी संगीत के स्तर पर कोई समझौता नहीं किया गया। कहानी में भजनों को महज पार्श्व संगीत की तरह नहीं, बल्कि दृश्य की भावना को गहरा करने के लिए शामिल किया गया है। फिल्म का एक अनूठा पहलू यह भी है कि नीम करोली बाबा का किरदार निभाने वाले अभिनेता के मुख से कोई गाना नहीं गवाया गया है। उनका किरदार पूरे समय भजनों को केवल सुनता और शांत भाव से महसूस करता हुआ नजर आता है।
निर्माण के दौरान संगीतकार को जो भी अतिरिक्त पारिश्रमिक मिला, उन्होंने उसे निजी बचत में रखने के बजाय सीधे गानों के अरेंजमेंट और लाइव वाद्ययंत्रों के प्रोडक्शन में खर्च कर दिया। टीम का साफ मानना है कि जब किसी कहानी के पीछे काम करने वालों की नीयत सच्ची हो और काम पूरी निष्ठा से किया जाए, तो प्रकृति भी सफलता के सारे रास्ते खुद ब खुद खोल देती है।



















