सिनेमा की दुनिया बाहर से जितनी चमकदार दिखती है, भीतर से वहां कदम जमाना उतना ही चुनौतीपूर्ण होता है। कई बार शुरुआत में मिला एक तीखा तिरस्कार इंसान को पूरी तरह तोड़ देता है, तो कभी वही चोट नई पहचान की बुनियाद खड़ी कर देती है। साठ और सत्तर के दशक में सिल्वर स्क्रीन पर राज करने वाली आशा पारेख का सफर भी कुछ ऐसी ही नाटकीय शुरुआत से गुजरा था। एक दौर था जब कुछ दिनों के शूट के बाद उन्हें यह कहकर प्रोजेक्ट से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया था कि उनमें स्टार बनने का माद्दा नहीं है। उसी कलाकार ने आगे चलकर ऐसी बुलंदियां छुईं कि बॉक्स ऑफिस पर उनकी फिल्मों की कामयाबी का डंका बजने लगा।
बचपन का रुझान और कैमरे के सामने पहला कदम
मुंबई के सांता क्रूज इलाके में 2 अक्टूबर 1942 को जन्मी आशा पारेख को बाल्यकाल से ही नृत्य कला से गहरा लगाव था। आठ साल की नन्हीं उम्र में उन्होंने विद्यालय के मंच पर पहली बार नृत्य प्रस्तुत किया था। कला के प्रति उनकी लगन देखकर उन्हें विधिवत भरतनाट्यम और कथक की तालीम दिलाई गई। मंच पर उनकी लय और भाव-भंगिमाओं ने मशहूर फिल्मकार बिमल रॉय का ध्यान खींचा। उन्होंने इस नन्हीं प्रतिभा को अपनी फिल्म ‘बाप बेटी’ में कैमरे के सामने अभिनय का अवसर प्रदान किया। इसके उपरांत उन्होंने ‘मां’, ‘आसमान’ और ‘श्री चैतन्य महाप्रभु’ में बतौर बाल कलाकार अपनी मौजूदगी दर्ज कराई। उम्र बढ़ने के साथ पर्दे पर मुख्य भूमिका निभाने का सपना उनके भीतर आकार लेने लगा था।
सिर्फ 11 रुपये की टोकन रकम और करियर का पहला बड़ा झटका
बाल कलाकार के दिनों को पीछे छोड़ जब वे मुख्य किरदार की तलाश में थीं, तब निर्देशक विजय भट्ट ने उन्हें अपनी आगामी फिल्म ‘गूंज उठी शहनाई’ के लिए मुख्य नायिका चुना। उस जमाने में इस अनुबंध के लिए उन्हें महज 11 रुपये की टोकन राशि साइनिंग फीस के तौर पर थमाई गई थी। यह अवसर उनके लिए किसी वरदान जैसा था और उन्होंने पूरे उत्साह के साथ सेट पर जाकर दृश्य फिल्माने भी शुरू कर दिए।
लेकिन यह खुशी अधिक समय तक नहीं टिक सकी। कुछ ही दिनों के काम के बाद फिल्म निर्माता-निर्देशक ने अचानक उन्हें बाहर करने का फैसला सुना दिया। उन्हें साफ शब्दों में बताया गया कि उनमें वह चमक और रूप-रंग नहीं है जो किसी मुख्य स्टार में होना चाहिए। उनकी जगह पर अमीता को मुख्य नायिका के तौर पर चुन लिया गया। इस अप्रत्याशित फैसले ने उन्हें भीतर तक झकझोर कर रख दिया, लेकिन इस कड़वे अनुभव ने उनके भीतर कुछ बड़ा कर दिखाने की जिद भी भर दी।
नासिर हुसैन की खोज और शम्मी कपूर संग रातोंरात स्टारडम
‘गूंज उठी शहनाई’ से बाहर किए जाने का सदमा अभी ताजा ही था कि फिल्ममेकर नासिर हुसैन अपनी नई फिल्म के लिए एक नए चेहरे की तलाश कर रहे थे। उन्होंने आशा पारेख को बुलाकर स्क्रीन टेस्ट लिया। कैमरे के सामने उनकी अदायगी और आकर्षण को देखकर नासिर हुसैन ने बिना देर किए उन्हें ‘दिल देके देखो’ की मुख्य नायिका के रूप में चुन लिया।
साल 1959 में पर्दे पर उतरी इस संगीतमय फिल्म में उनके जोड़ीदार शम्मी कपूर थे। फिल्म टिकट खिड़की पर जबरदस्त हिट साबित हुई। जिस कलाकार को कुछ ही दिन पहले खारिज कर दिया गया था, वह दर्शकों के दिलों पर छा चुकी थी। इसके बाद फिल्म उद्योग में उनका नाम उन चुनिंदा कलाकारों में शुमार हो गया जिनकी मौजूदगी ही सफलता की गारंटी मानी जाती थी।
धर्मेंद्र से लेकर राजेश खन्ना तक के साथ सुनहरी पारी
पहली बड़ी कामयाबी के बाद उनके खाते में लगातार यादगार फिल्में जुड़ती चली गईं। उन्होंने ‘जब प्यार किसी से होता है’, ‘तीसरी मंजिल’, ‘लव इन टोक्यो’, ‘मेरे सनम’ और ‘आए दिन बहार के’ जैसी फिल्मों से दर्शकों का भरपूर मनोरंजन किया। देशभक्ति के ताने-बाने पर बुनी मनोज कुमार की ‘उपकार’ हो या फिर सामाजिक ताने-बाने वाली कहानियां, हर जगह उनकी अदाकारी की सराहना हुई।
राजेश खन्ना के साथ आई ‘कटी पतंग’ में एक बेसहारा विधवा का किरदार निभाकर उन्होंने यह साबित कर दिया कि वे केवल चुलबुली भूमिकाओं तक सीमित नहीं हैं। इस संवेदनशील अभिनय के लिए उन्हें फिल्मफेयर का सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री पुरस्कार भी मिला। इसके अलावा ‘आन मिलो सजना’, ‘कारवां’ और धर्मेंद्र के साथ वाली ‘मेरा गांव मेरा देश’ ने टिकट खिड़की पर कमाई के नए कीर्तिमान रचे।
परदे के पीछे का नेतृत्व और सेंसर बोर्ड की पहली महिला मुखिया
सफलता के शिखर पर रहने के बावजूद आशा पारेख ने खुद को सिर्फ फिल्मों के सेट तक बांधकर नहीं रखा। उन्होंने दूरदर्शन और छोटे पर्दे के उभार को भांपते हुए निर्माण और निर्देशन की कमान संभाली। गुजराती भाषा के धारावाहिक ‘ज्योति’ का कुशल निर्देशन करने के साथ-साथ उन्होंने ‘कोरा कागज’ जैसे चर्चित टीवी धारावाहिकों के निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
उद्योग के कलाकारों के कल्याण के लिए वे सिने एंड टीवी आर्टिस्ट्स एसोसिएशन की अध्यक्ष भी चुनी गईं। इसके बाद उन्होंने एक और ऐतिहासिक उपलब्धि अपने नाम दर्ज की, जब उन्हें केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड यानी सेंसर बोर्ड का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। साल 1998 से 2001 तक इस महत्वपूर्ण संवैधानिक पद को संभालने वाली वे पहली महिला बनीं। शुरुआती दिनों में खारिज किए जाने से लेकर फिल्म उद्योग के शीर्ष नियामक पद तक पहुंचना उनके संकल्प की मिसाल पेश करता है।



















