हिंदी सिनेमा के इतिहास में परदे की चमक-दमक के पीछे कई ऐसे आत्मीय रिश्ते पनपे, जिन्होंने कलाकारों को निजी जिंदगी में हमेशा के लिए एक सूत्र में बांध दिया। ऐसा ही एक बेहद भावुक और यादगार वाकया मशहूर अदाकारा आशा पारेख के शुरुआती करियर से जुड़ा है। जब वह फिल्म जगत में बतौर मुख्य नायिका अपनी पहचान बनाने के लिए संघर्ष कर रही थीं, तब उस जमाने की बेहद लोकप्रिय और स्थापित अभिनेत्री गीता बाली का दिल उनकी मासूमियत पर आ गया था। दोनों के बीच स्नेह का बंधन इतना गहरा हो गया था कि गीता बाली ने उन्हें बाकायदा अपनी बेटी बनाकर गोद लेने तक की इच्छा अपने पति शम्मी कपूर के सामने रख दी थी।
बाल कलाकार से मुख्य नायिका बनने तक का सफर
आशा पारेख ने अभिनय की दुनिया में बेहद कम उम्र में कदम रख दिया था। जब वह केवल पांचवीं कक्षा में पढ़ रही थीं, तभी मशहूर फिल्मकार बिमल रॉय ने उन्हें अपनी फिल्म 'मां' में एक बाल कलाकार के रूप में काम करने का अवसर दिया। बचपन के इस अनुभव ने उन्हें कैमरे की बारीकियों से परिचित कराया, लेकिन एक स्वतंत्र स्टार के रूप में उनकी असली पहचान कुछ वर्षों बाद कायम हुई।
साल 1959 में निर्माता-निर्देशक नासिर हुसैन की संगीतमय रोमांटिक फिल्म 'दिल देके देखो' रिलीज हुई। इस फिल्म में आशा पारेख को अभिनेता शम्मी कपूर के अपोजिट मुख्य नायिका के रूप में कास्ट किया गया। इस फिल्म की अपार सफलता ने न केवल आशा पारेख को रातों-रात एक चमकता सितारा बना दिया, बल्कि इसी परियोजना के जरिए उनका कपूर खानदान के साथ एक अटूट और आत्मीय पारिवारिक नाता भी कायम हुआ।
रानीखेत की वादियों में मेकअप और पहली मुलाकात
फिल्म 'दिल देके देखो' की शूटिंग के दिनों में आशा पारेख की मुलाकात शम्मी कपूर की धर्मपत्नी गीता बाली से हुई। गीता बाली उस समय तक भारतीय सिनेमा में एक बेहद सम्मानित, सहज और बड़ी अदाकारा के रूप में स्थापित हो चुकी थीं। वहीं दूसरी ओर, आशा पारेख उस वक्त एक बिल्कुल नई कलाकार थीं जो पहली बार किसी बड़े प्रोजेक्ट में मुख्य भूमिका निभा रही थीं।
अपनी आत्मकथा 'द हिट गर्ल' में आशा पारेख ने इस रिश्ते के कई अनछुए पहलुओं को विस्तार से दर्ज किया है। उन्होंने बताया कि जब उत्तराखंड के रानीखेत में फिल्म की शूटिंग शुरू होने वाली थी, तब पहले ही दिन गीता बाली ने खुद आगे बढ़कर उनका मेकअप किया था। एक नवोदित कलाकार के लिए उस दौर की इतनी बड़ी स्टार का खुद अपने हाथों से श्रृंगार करना और संवारना किसी सपने के सच होने जैसा था। गीता बाली ने सिर्फ उनका रूप ही नहीं संवारा, बल्कि शूटिंग के माहौल में सहज होने और कैमरे के सामने सहजता से अभिनय करने के तरीके भी प्यार से समझाए।
जब शम्मी कपूर के सामने रखी गोद लेने की बात
दिनों-दिन दोनों के बीच आत्मीयता इतनी बढ़ती चली गई कि गीता बाली उन्हें अपनी सगी बेटी की तरह मानने लगी थीं। इस रिश्ते में औपचारिकता की कोई जगह नहीं बची थी। एक दिन जब शम्मी कपूर भी वहां मौजूद थे, तब गीता बाली ने अपने पति से खुले दिल से कहा कि वह आशा पारेख को कानूनी तौर पर गोद लेना चाहती हैं और अपनी बेटी बनाना चाहती हैं।
शम्मी कपूर इस पूरे वाकये और दोनों के बीच के अटूट प्यार के खुद प्रत्यक्षदर्शी थे। आशा पारेख ने अपनी किताब में लिखा है कि वह शम्मी कपूर को आदर और प्यार से 'चाचा' कहकर पुकारती थीं, जबकि गीता बाली को वह हमेशा 'चाची' कहती थीं। यह एक ऐसा पारिवारिक रिश्ता था जो किसी फिल्मी औपचारिकता से परे दिल से निभाया जाता था।
हिट गर्ल का शानदार दौर और यादगार सिनेमा
'दिल देके देखो' की जबर्दस्त कामयाबी के बाद आशा पारेख के फिल्मी सफर ने ऐसी रफ्तार पकड़ी कि उन्होंने फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। 1960 और 1970 के पूरे दशक में वह हिंदी सिनेमा की सबसे सफल, व्यस्त और महंगी अभिनेत्रियों की जमात में शामिल रहीं। उन्हें उस दौर में 'हिट गर्ल' का खिताब दिया गया क्योंकि उनकी लगातार कई फिल्में बॉक्स ऑफिस पर ब्लॉकबस्टर साबित हुईं।
उन्होंने शम्मी कपूर के साथ 'तीसरी मंजिल' जैसी कालजयी थ्रिलर फिल्म में काम किया, जिसके गीत-संगीत और रहस्य ने पूरे देश को दीवाना बना दिया था। इसके अलावा उन्होंने 'जब प्यार किसी से होता है', 'फिर वही दिल लाया हूं', 'प्यार का मौसम', 'कटी पतंग' और 'कारवां' जैसी अनगिनत सदाबहार फिल्मों में अपने संजीदा और चुलबुले अभिनय का लोहा मनवाया। करियर के उस स्वर्णिम मुकाम पर पहुंचने के बावजूद आशा पारेख ने गीता बाली के उस शुरुआती दुलार और अपनत्व को अपने दिल में हमेशा जीवित रखा।



















