सिनेमाघरों में आने से पहले ही दृश्यम 3 रिव्यू चर्चा के केंद्र में आ गया है, क्योंकि स्पेशल स्क्रीनिंग के शुरुआती रिएक्शंस में इसे पिछली दोनों फिल्मों से भी अधिक सघन और प्रभावशाली थ्रिलर माना जा रहा है। विजय सलगांवकर की कहानी का यह अगला पड़ाव दर्शकों के सामने उन सवालों के जवाब लेकर आया है, जिनका इंतज़ार लंबे समय से किया जा रहा था। ट्रेड एनालिस्ट तरण आदर्श ने फिल्म को 4.5 स्टार रेटिंग देते हुए इसे 2026 की सबसे बेहतरीन फिल्मों में शामिल बताया है। उनके मुताबिक निर्देशक अभिषेक पाठक ने कहानी की रफ्तार और तनाव को इस तरह बुना है कि दर्शक शुरुआत से अंत तक स्क्रीन से नजरें नहीं हटा पाते।
अभिषेक पाठक का निर्देशन और कसी हुई पटकथा
फिल्म की सबसे मजबूत बुनियाद इसका निर्देशन और लेखन है। अभिषेक पाठक ने पहली फिल्म की विरासत और मिजाज को संभालते हुए एक नया आयाम दिया है। वे किसी पुराने फॉर्मूले को दोबारा दोहराने के बजाय कहानी को स्वाभाविक और तार्किक मोड़ की तरफ ले जाते हैं। पहले हाफ में तनाव का ग्राफ धीरे-धीरे ऊपर चढ़ता है और दर्शक सलगांवकर परिवार पर आने वाले नए संकट की गंभीरता को महसूस करने लगते हैं। स्क्रीनप्ले में हर छोटे सुराग को बारीकी से पिरोया गया है, जिससे थ्रिलर शैली के शौकीनों के लिए यह एक संतुलित सिनेमाई अनुभव बन जाता है।
अजय देवगन और जयदीप अहलावत का सीधा टकराव
विजय सलगांवकर के जटिल किरदार में अजय देवगन ने एक बार फिर अपनी जबरदस्त अदाकारी का परिचय दिया है। परिवार की सुरक्षा के लिए किसी भी हद तक जाने वाले एक आम इंसान की बेबसी और उसका तेज दिमाग उनके चेहरे के भावों में साफ नजर आता है। इस बार उनका मुकाबला जयदीप अहलावत के किरदार से होता है, जिनकी एंट्री कहानी को बिल्कुल नया मोड़ देती है। जयदीप अहलावत का अभिनय बेहद सधा हुआ और गंभीर है, जो अजय देवगन के शांत किरदार के सामने एक सशक्त चुनौती बनकर खड़ा होता है। दोनों कलाकारों के बीच इंटरवल से ठीक पहले का दृश्य स्क्रीन पर भारी तनाव पैदा करता है, जिसे दर्शकों ने खड़े होकर तालियां बजाने लायक बताया है।
तब्बू और सहयोगी कलाकारों का दमदार प्रभाव
फिल्म में पूर्व पुलिस अधिकारी के रूप में तब्बू का काम हमेशा की तरह असरदार रहा है। उनके किरदार में वर्षों पुराना दर्द, गुस्सा, बदले की आग और सच तक पहुंचने की अटूट जिद एक साथ दिखाई देती है। भावनाओं का यह संतुलन उनके अभिनय को एक अलग ऊंचाई पर ले जाता है। वहीं प्रकाश राज की मौजूदगी स्क्रीन पर आते ही अपना प्रभाव छोड़ती है। अजय देवगन और उनके परिवार के साथ उनका पहला कोर्टरूम दृश्य बेहद प्रभावशाली बन पड़ा है। इसके अलावा श्रेया शरण ने विजय की पत्नी की भूमिका में मजबूती दिखाई है, जबकि रजत कपूर अपने किरदार की गरिमा को पूरी सच्चाई के साथ पर्दे पर जीते हैं। पुलिस सिपाही के रूप में कमलेश सावंत कहानी को जरूरी विश्वसनीयता देते हैं, वहीं इशिता दत्ता और मृणाल जाधव ने अपनी भूमिकाओं को सहजता से निभाया है।
अदालती बहस और संतुष्ट करने वाला अंत
दृश्यम श्रृंखला की असली पहचान इसका कोर्टरूम ड्रामा और अप्रत्याशित अंत रहा है, और यह भाग भी इस कसौटी पर पूरी तरह खरा उतरता है। प्रकाश राज और अजय देवगन के आमने-सामने वाले कानूनी तर्क दर्शकों को पूरी तरह बांधकर रखते हैं। फिल्म का क्लाइमैक्स दर्शकों की भारी उम्मीदों पर खरा उतरता है। यह अंत न केवल तार्किक और विश्वसनीय लगता है, बल्कि पूरी कहानी को एक संपूर्ण और संतोषजनक समापन भी देता है। दर्शकों के मन में उठने वाले हर सवाल का जवाब इस तरह सामने आता है कि थिएटर से बाहर निकलते वक्त कहानी दिमाग में घूमती रहती है।
बैकग्राउंड स्कोर और बॉक्स ऑफिस का माहौल
सस्पेंस-थ्रिलर फिल्मों में गीतों की जगह पार्श्व संगीत की भूमिका सबसे अहम होती है, और इस फिल्म में भी बैकग्राउंड स्कोर ने तनाव को कई गुना बढ़ा दिया है। हर रहस्यमयी पल और आमने-सामने की बातचीत के दौरान संगीत माहौल में भारी सस्पेंस घोल देता है। स्पेशल स्क्रीनिंग देखकर निकले अन्य दर्शकों ने भी इसे चार स्टार का दर्जा दिया है और सोशल मीडिया पर अपनी प्रतिक्रिया में कहा है कि हिंदी सिनेमा में इस स्तर का थ्रिलर कम ही देखने को मिलता है। कहानी के तीव्र प्रवाह और दमदार अदाकारी के दम पर यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर एक बड़ी सफलता साबित होने की ओर अग्रसर दिख रही है।



















