अभिनेत्री स्वरा भास्कर एक बार फिर अपने बयानों के कारण इंटरनेट पर तीव्र चर्चा के केंद्र में आ गई हैं। सोशल मीडिया मंचों पर प्रसारित हो रहे एक वीडियो क्लिप में वह सर्वोच्च न्यायालय द्वारा वर्ष 2019 में राम जन्मभूमि विवाद पर दिए गए ऐतिहासिक निर्णय के प्रति अपना व्यक्तिगत दृष्टिकोण साझा करती नजर आ रही हैं। दशकों पुराने और संवेदनशील माने जाने वाले राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद जमीन विवाद पर आए अदालती नतीजे को लेकर उनकी इस पुरानी टिप्पणी के सामने आते ही उपयोगकर्ताओं के बीच परस्पर विरोधी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं।
फोन में मौजूद मुस्लिम संपर्कों से खेद जताने का दावा
प्रसारित फुटेज में स्वरा भास्कर इस बात का उल्लेख कर रही हैं कि जब राम जन्मभूमि विवाद पर अंतिम अदालती निर्णय घोषित हुआ था, तब वह मानसिक तौर पर काफी विचलित और निराश महसूस कर रही थीं। उन्होंने कहा कि बहुसंख्यक हिंदू समुदाय के पक्ष में जमीन का मालिकाना हक जाने वाले इस निर्णय को वह स्वीकार नहीं कर पा रही थीं। अपनी इसी मनःस्थिति का वर्णन करते हुए उन्होंने बताया कि एक हिंदू होने के नाते उन्होंने अपनी फोनबुक में दर्ज सभी मुस्लिम परिचितों को निजी संदेश भेजकर अपनी भावनाएं व्यक्त की थीं।
इन संदेशों को प्राप्त करने वालों में फिल्म जगत के प्रमुख कलाकारों आमिर खान, शाहरुख खान, सलमान खान के साथ-साथ फहाद अहमद का नाम भी शामिल था। स्वरा भास्कर के अनुसार, उन्होंने अपने संदेश में यह लिखा था कि वह शीर्ष अदालत के इस फैसले से किसी भी तरह सहमत नहीं हैं, उन्हें इस पर गहरा खेद है और वह व्यक्तिगत रूप से शर्मिंदगी महसूस कर रही हैं।
सोशल मीडिया पर छिड़ी राय और कानूनी मर्यादा की जंग
इस वीडियो के पुनः चर्चा में आने के बाद ऑनलाइन मंचों पर दो ध्रुवों में बंटी राय देखने को मिल रही है। आलोचकों के एक बड़े वर्ग का कहना है कि देश की सबसे बड़ी न्यायिक संस्था के सर्वसम्मत फैसले पर इस तरह खुलेआम सवाल उठाना और उस पर शर्मिंदगी जताना भारतीय न्याय व्यवस्था की निष्पक्षता का अपमान है। इस पक्ष का तर्क है कि अदालत ने तमाम ऐतिहासिक साक्ष्यों, पुरातात्विक रिपोर्टों और ठोस कानूनी आधारों की विस्तृत समीक्षा के उपरांत ही अपना फैसला सुनाया था, इसलिए इतने वर्ष बाद इस पर संशय पैदा करना अनुचित है।
इसके विपरीत, दूसरे पक्ष के समर्थकों का कहना है कि लोकतांत्रिक ढांचे में प्रत्येक नागरिक को अपनी व्यक्तिगत राय और असहमति प्रकट करने का संवैधानिक अधिकार प्राप्त है। उनका मानना है कि किसी भी न्यायिक अथवा प्रशासनिक निर्णय पर अपनी व्यक्तिगत संवेदना या असंतोष व्यक्त करना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दायरे में आता है, भले ही वह विचार जनसामान्य या बहुसंख्यक दृष्टिकोण से मेल न खाता हो।
वर्ष 2019 के ऐतिहासिक अदालती फैसले की मुख्य बातें
अयोध्या विवाद में सर्वोच्च न्यायालय की पांच न्यायाधीशों वाली संविधान पीठ ने 9 नवंबर 2019 को अपना ऐतिहासिक और सर्वसम्मत निर्णय सुनाया था। शीर्ष अदालत ने विवादित 2.77 एकड़ भूमि का संपूर्ण स्वामित्व रामलला विराजमान को सौंपने का स्पष्ट आदेश जारी किया था। इसके साथ ही, अदालत ने मुस्लिम पक्ष की भरपाई के लिए सुन्नी वक्फ बोर्ड को अयोध्या में ही मस्जिद निर्माण हेतु 5 एकड़ वैकल्पिक भूमि आवंटित करने का भी सख्त निर्देश दिया था।
संविधान पीठ ने अपने समग्र फैसले में वर्ष 1949 में विवादित ढांचे के भीतर गुप्त रूप से मूर्तियां रखे जाने और 1992 में बाबरी मस्जिद को बलपूर्वक ध्वस्त किए जाने की घटनाओं को गंभीर गैर-कानूनी कृत्य करार दिया था। इसके बावजूद, कानूनी दस्तावेजों, निरंतर पूजा के अधिकारों और उपलब्ध साक्ष्यों का समग्र विश्लेषण करते हुए अदालत ने विवादित भूमि पर रामलला के कानूनी हक को अंतिम रूप से मान्यता दी थी।


















