बॉलीवुड में किसी भी मुख्य कलाकार के लिए लगातार कई सालों तक नाकामी का सामना करना बेहद कठिन दौर माना जाता है। वर्ष 2000 से 2008 के बीच ऐसा ही मुश्किल वक्त अभिनेता सलमान खान के करियर में भी देखा गया, जब उनकी कई फिल्में टिकट खिड़की पर दर्शकों को खींचने में विफल साबित हो रही थीं। सिनेमाघरों में कमजोर प्रदर्शन के कारण उनका स्टारडम संकट में नजर आ रहा था, जिसके चलते वे नई पटकथाओं को लेकर काफी सतर्क और आशंकित हो चुके थे।
जब सलमान को मनाने पहुंचे निर्माता
इस अनिश्चितता के माहौल में निर्माता बोनी कपूर एक नया एक्शन प्रोजेक्ट लेकर आगे आए। सलमान खान लगातार मिल रही असफलताओं के कारण इस कहानी को स्वीकार करने में झिझक महसूस कर रहे थे। उन्हें भरोसा दिलाने के लिए निर्माता को लगातार तीन दिनों तक उनके निवास के चक्कर काटने पड़े। आखिरकार अभिनेता को आश्वस्त करने के लिए बोनी कपूर ने एक अनोखी शर्त रखी। उन्होंने वादा किया कि यदि यह वेंचर दर्शकों की कसौटी पर खरा नहीं उतरा, तो वे भविष्य में कभी भी किसी नए काम के लिए उनसे संपर्क नहीं करेंगे।
प्रभु देवा का निर्देशन और यादगार संवाद
प्रभु देवा की देखरेख में तैयार हुई इस एक्शन थ्रिलर में मुख्य महिला किरदार के रूप में आयशा टाकिया ने काम किया। दोनों कलाकारों की जोड़ी पर्दे पर खूब सराही गई। साथ ही कहानी में प्रकाश राज, महेश मांजरेकर और महक चहल ने भी महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाईं, जबकि स्वयं प्रभु देवा भी एक विशेष अंदाज में दिखाई दिए। अभिनय के अलावा फिल्म का संगीत बेहद लोकप्रिय रहा और एक संवाद तो दशकों बाद भी पॉप कल्चर का अहम हिस्सा बना हुआ है, जिसमें मुख्य किरदार कहता है कि एक बार जो कमिटमेंट कर दी तो फिर वह अपनी भी नहीं सुनता।
थिएटर में भारी कमाई और करियर का नया मोड़
लगभग 50 करोड़ रुपये की लागत से निर्मित इस एक्शन एंटरटेनर ने टिकट खिड़की पर उतरते ही शानदार शुरुआत हासिल की। दर्शकों की भारी भीड़ के चलते सिनेमाघर कई हफ्तों और महीनों तक खचाखच भरे रहे। वैश्विक स्तर पर कुल 87.44 करोड़ रुपये की कमाई दर्ज करते हुए इसने घाटे के दौर को पूरी तरह समाप्त कर दिया। इस कामयाबी ने सलमान खान के स्टारडम को नए सिरे से स्थापित करने का काम किया।
लगातार ब्लॉकबस्टर प्रोजेक्ट्स का सिलसिला
वर्ष 2009 की इस चमत्कारी सफलता ने अभिनेता के सफर में एक नया अध्याय जोड़ दिया। इसके फौरन बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा और 'दबंग', 'बॉडीगार्ड', 'रेडी', 'एक था टाइगर', 'किक', 'बजरंगी भाईजान' तथा 'सुल्तान' जैसी एक के बाद एक बड़ी व्यावसायिक सफलताएं दर्ज कराईं। इसी आधार पर उन्हें भारतीय सिनेमा में टिकट खिड़की का निर्विवाद बादशाह माना जाने लगा, जिसकी शुरुआत निर्माता के उस अटूट भरोसे से संभव हो पाई थी।


















