आध्यात्मिक गुरु नीम करौली बाबा के जीवन और उनकी लीलाओं पर केंद्रित सिनेमाई प्रस्तुति हनुमान अंश इन दिनों एक अनोखे संयोग को लेकर चर्चा के केंद्र में है। सिनेमा निर्माण के दौरान कई बार रचनात्मक कल्पना और वास्तविक जीवन के बीच ऐसे तार जुड़ जाते हैं, जिन्हें सामान्य संयोग कहकर खारिज नहीं किया जा सकता। फिल्म के निर्माता विशाल चतुर्वेदी ने जब पटकथा में पार्वती के हठ नामक दृश्य और गीत को जोड़ा था, तब उनके जेहन में केवल लोकश्रुतियों में सुना हुआ एक साधारण प्रसंग था। हालांकि जब पूरी फिल्म तैयार होने के उपरांत यह खास दृश्य नीम करौली बाबा की सुपुत्री के समक्ष प्रस्तुत किया गया, तो उन्होंने जो तथ्य उजागर किए, उससे पूरी निर्माण टीम अवाक रह गई।
गृहस्थ दायित्व और आध्यात्मिक साधना का द्वंद्व
फिल्म की पटकथा में नीम करौली बाबा के वैवाहिक और पारिवारिक जीवन के कई अनछुए पहलुओं को बहुत संवेदनशीलता के साथ पिरोया गया है। इसमें उनकी धर्मपत्नी रामबेटी के अंतर्मन में उठने वाले सवालों और भावनाओं को प्रमुखता दी गई है। एक पारंपरिक गृहस्थ जीवन में प्रवेश करने के बाद हर पत्नी की स्वाभाविक आकांक्षा होती है कि उसका जीवनसाथी उसे पर्याप्त समय, स्नेह और मानसिक संबल दे। इसके विपरीत बाबा का अधिकांश समय लोक कल्याण, जनसेवा और गहन आध्यात्मिक साधना में व्यतीत होता था। सांसारिक दायित्वों के बीच सामंजस्य साधने के इसी संघर्ष ने रामबेटी के भीतर कई जटिल प्रश्न खड़े किए थे।
कथानक के एक मार्मिक दृश्य में जब रामबेटी रोजमर्रा के घरेलू कार्यों में व्यस्त थीं, तब उन्होंने बाबा की इस विरक्ति और उदासीनता को लेकर उनसे सीधे सवाल किए। यह प्रसंग किसी साधारण घरेलू विवाद का हिस्सा नहीं था, बल्कि इसके मूल में दांपत्य जीवन की अपेक्षाओं और ईश्वरीय विधान के प्रति गहरी आस्था की खींचतान छुपी हुई थी।
जीभ पर राई और अलौकिक चमत्कार की लीला
पत्नी के इन सवालों के प्रत्युत्तर में नीम करौली बाबा ने जो किया, वह मानवीय समझ से परे था। उन्होंने राई के कुछ छोटे दाने अपनी जीभ पर रखे और देखते ही देखते उन सूक्ष्म बीजों से पौधे अंकुरित होकर वृक्ष का आकार लेने लगे। इस अलौकिक दृश्य को प्रत्यक्ष देखकर रामबेटी के मन के सारे संशय एक पल में समाप्त हो गए। उन्हें तुरंत यह बोध हो गया कि उनके समक्ष उपस्थित व्यक्ति कोई साधारण सांसारिक मनुष्य नहीं, बल्कि एक उच्च आध्यात्मिक सत्ता का साक्षात रूप हैं।
निर्माता विशाल चतुर्वेदी के मानस पटल पर बाबा की आध्यात्मिक सामर्थ्य से जुड़ा यह राई वाला आख्यान लंबे समय से अंकित था। उन्होंने इसी प्रसंग को आधार बनाकर पार्वती के हठ दृश्य की संरचना की थी। उनका उद्देश्य मात्र यह दिखाना था कि किस प्रकार एक अलौकिक घटना ने साधारण स्त्री के मन को भक्ति और समर्पण में बदल दिया। लेकिन इस दृश्य के पीछे की वास्तविक सच्चाई का उद्घाटन तब हुआ, जब फिल्म का संपादन पूरा हो चुका था।
स्क्रीनिंग के दौरान सामने आई शिवलिंग तपस्या की असलियत
निर्माण कार्य पूरा होने के बाद जब विशाल चतुर्वेदी ने नीम करौली बाबा की बेटी के लिए इस विशेष दृश्य की स्क्रीनिंग रखी, तो उन्होंने एक ऐसा गोपनीय पारिवारिक इतिहास साझा किया, जिससे सिनेमा के निर्माता पूरी तरह अनभिज्ञ थे। बाबा की पुत्री ने बताया कि वास्तविक जीवन में रामबेटी ने ठीक उसी स्वरूप में शिवलिंग के समक्ष बैठकर कठोर तपस्या की थी, जैसा कि फिल्म में माता पार्वती के हठ के रूप में दर्शाया गया है।
सिनेमाई पर्दे पर माता पार्वती को शिवलिंग के सम्मुख हठपूर्वक ध्यान लगाते हुए चित्रित किया गया था। निर्माताओं ने इसे विशुद्ध रूप से एक प्रतीकात्मक और काव्यात्मक कल्पना मानकर रचा था। लेकिन जब बाबा के परिवार ने पुष्टि की कि रामबेटी की वास्तविक जीवनगाथा में भी शिवलिंग के सम्मुख ऐसी ही तपस्या का अध्याय दर्ज था, तो विशाल चतुर्वेदी के लिए यह महज एक फिल्मी इत्तेफाक न रहकर एक ईश्वरीय संकेत बन गया।
रचनात्मक कल्पना और आस्था का दुर्लभ संगम
यही ऐतिहासिक और आध्यात्मिक समानता इस समय हनुमान अंश के इस दृश्य को अत्यंत विशिष्ट बना रही है। इस दृश्य में एक ओर जहां नीम करौली बाबा की पत्नी पार्वती की शिकायतें, उनका मानवीय दर्द और दांपत्य रिश्ते का भावनात्मक ताना-बाना सामने आता है, वहीं दूसरी ओर बाबा के राई वाले चमत्कार से उनकी अलौकिक सिद्धि का प्रमाण मिलता है।
रचनात्मक स्वतंत्रता के तहत रची गई कहानी जब किसी संत के वास्तविक पारिवारिक इतिहास से शब्दशः मेल खा जाती है, तो वह केवल मनोरंजन न रहकर आस्था का गहरा दस्तावेज बन जाती है। पार्वती के हठ प्रसंग ने यही साबित किया है कि कई बार लेखक और निर्देशक की कल्पना भी अज्ञात रूप से उसी सत्य को दोहरा देती है, जो इतिहास के पन्नों में कहीं मौन पड़ा होता है।


















