सिनेमा जगत के अनुभवी अभिनेता मुकेश खन्ना एक लंबे अंतराल के बाद सिनेमाघरों के बड़े पर्दे पर वापसी की तैयारी में हैं। वह जल्द ही आने वाली फिल्म 'विश्वगुरु' में अहम भूमिका निभाते दिखाई देंगे। इस नई परियोजना से जुड़ने के फैसले को लेकर अभिनेता ने साफ किया कि किस बात ने उन्हें इस कहानी की तरफ खींचा और क्यों यह कदम उनके फिल्मी सफर में एक बेहद खास मुकाम साबित हो सकता है।
कहानी का खिंचाव और निर्माताओं से तीन दौर की चर्चा
मुकेश खन्ना के मुताबिक, इस फिल्म की मूल पटकथा और विषय वस्तु ने उन्हें पहली नजर में ही प्रभावित किया था। प्रोजेक्ट को अंतिम रूप देने से पहले फिल्म निर्माण टीम के साथ कई विस्तृत बैठकें आयोजित की गईं। अभिनेता ने साझा किया कि विषय और कहानी दोनों ही काफी दमदार थे, जिसके बाद उन्होंने निर्माताओं के साथ बातचीत आगे बढ़ाई।
प्रोजेक्ट के शुरुआती संवाद को याद करते हुए उन्होंने बताया कि निर्माता कई बार उनसे मिलने पहुंचे थे। बैठकों के दौरान लंबी चर्चाएं हुईं, कमरे के भीतर और बाहर लगातार विचार-विमर्श का दौर चला और आखिरकार फिल्म की टीम ने निर्णय का पूरा दारोमदार अभिनेता के विवेक पर ही छोड़ दिया। तीन मुलाकातों के बाद सहमति बनी और उन्होंने इस प्रोजेक्ट के लिए अपनी स्वीकृति दे दी।
देव आनंद की 'सेंसर' के बाद बड़ा सिनेमाई कदम
इस प्रोजेक्ट के महत्व पर बात करते हुए अभिनेता ने स्पष्ट किया कि वह बेहद सीमित और चुनिंदा फिल्मों में ही काम करना पसंद करते हैं। उनके अनुसार, वर्ष 2001 में रिलीज हुई देव आनंद की फिल्म 'सेंसर' के बाद यह उनका पहला ऐसा बड़ा प्रोजेक्ट बनने जा रहा है जो दर्शकों के सामने आएगा। वर्ष 2001 वाली उस फिल्म में उन्होंने एक भारतीय सेना अधिकारी की भूमिका अदा की थी।
मुकेश खन्ना ने इस बात पर जोर दिया कि दर्शक लंबे समय से उन्हें पर्दे पर देखने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। उनका मानना है कि जब तक कहानी का ताना-बाना और उसका संदेश मजबूत न हो, तब तक किसी फिल्म से जुड़ने का कोई औचित्य नहीं रहता। इस प्रोजेक्ट का विषय उनकी पसंद की कसौटी पर पूरी तरह खरा उतरा, जिसके चलते उन्होंने इस पर मुहर लगाई।
भारत के आध्यात्मिक सामर्थ्य को दर्शाती 'विश्वगुरु' की पृष्ठभूमि
शैलेश बोगानी और अतुल सोनार के संयुक्त निर्देशन में तैयार हो रही फिल्म 'विश्वगुरु' का कथानक एक ऐसे विदेशी गुट के इर्द-गिर्द बुना गया है, जो धोखे और ताकत के बल पर भारत को निशाना बनाने की साजिश रचता है। इस संघर्ष के बीच कहानी यह स्थापित करती है कि भारत का आध्यात्मिक ज्ञान और उसकी प्राचीन चेतना किस तरह देश की सबसे बड़ी रक्षा ढाल और वास्तविक ताकत बनकर उभरती है। फिल्म का मुख्य उद्देश्य भारत को विश्व पटल पर एक शिक्षक के रूप में पेश करना है।


















