बॉलीवुड अभिनेता इमरान हाशमी हाल के दिनों में अपनी नई एक्शन थ्रिलर फिल्म आवारापन 2 की शानदार बॉक्स ऑफिस सफलता को लेकर काफी चर्चा में रहे हैं। उनकी इस फिल्म ने दुनियाभर के सिनेमाघरों में रिकॉर्ड तोड़ प्रदर्शन करते हुए चंद दिनों के भीतर 100 करोड़ रुपये से अधिक का कारोबार कर लिया है। लेकिन एक कलाकार के तौर पर ऐसी बड़ी व्यावसायिक सफलताएं हासिल करने वाले इमरान हाशमी के जीवन में एक दौर ऐसा भी आया था जब काम की सफलता, शोहरत और बॉक्स ऑफिस के आंकड़े उनके लिए पूरी तरह बेमानी हो चुके थे। यह वह दौर था जब साल 2014 में उनके मासूम बेटे अयान की एक गंभीर और जानलेवा बीमारी का पता चला। हाल ही में रणवीर इल्लाहाबादिया को दिए गए एक विशेष इंटरव्यू में इमरान हाशमी ने अपने परिवार पर टूटे उस दर्दनाक वज्रपात, बेटे के कैंसर के कठिन इलाज और उसके बाद लगातार 5 सालों तक चले मानसिक तथा चिकित्सकीय संघर्ष की पूरी दास्तान बयान की है, जिसका एक अंश इन्स्टाग्राम पर साझा वीडियो में भी सामने आया है।
एक साधारण लंच डेट और 12 घंटे में बदली दुनिया
इमरान हाशमी ने उस भयावह घटना का जिक्र करते हुए बताया कि जनवरी 2014 का वह दिन आज भी उनके जेहन में इस तरह दर्ज है जिसे शब्दों में बयां करना बेहद दर्दनाक है। वह 13 जनवरी 2014 की तारीख थी जब पूरा परिवार एक साथ बाहर दोपहर के भोजन के लिए निकला था। इमरान अपने मासूम बेटे अयान के साथ एक रेस्टोरेंट में पिज्जा खा रहे थे। उस समय अयान की उम्र महज तीन साल और ग्यारह महीने थी। सब कुछ सामान्य चल रहा था कि तभी अचानक अयान ने वॉशरूम जाने की बात कही। जब अयान वॉशरूम गया तो उसके पेशाब में खून दिखाई दिया। बिना किसी पूर्व चेतावनी या बीमारी के लक्षणों के आया यह लक्षण परिवार के लिए बेहद चौंकाने वाला था।
पेशाब में खून देखते ही परिवार में हड़कंप मच गया और वे बिना एक पल गंवाए डॉक्टर की ओर भागे। घटना के महज तीन घंटे के भीतर ही इमरान और उनकी पत्नी अपने मासूम बच्चे को लेकर डॉक्टर के क्लिनिक में बैठे थे। शुरुआती जांच के बाद डॉक्टरों ने जो कहा, उसने माता-पिता के पांवों तले जमीन खिसका दी। डॉक्टर ने स्पष्ट शब्दों में बता दिया कि मासूम अयान को कैंसर है और स्थिति की गंभीरता को देखते हुए अगले ही दिन उसकी सर्जरी के साथ-साथ कीमोथेरेपी की प्रक्रिया शुरू करनी होगी। केवल 12 घंटों के छोटे से अंतराल में इमरान हाशमी और उनके परिवार की एक हंसती-खेलती और बेफिक्र दुनिया पूरी तरह से पलट चुकी थी।
विल्म्स ट्यूमर की चपेट में आया था मासूम अयान
चिकित्सकीय जांचों में इस बात की पुष्टि हुई कि अयान विल्म्स ट्यूमर नाम की एक बेहद दुर्लभ और गंभीर बीमारी से पीड़ित था। विल्म्स ट्यूमर छोटे बच्चों में पाया जाने वाला किडनी कैंसर का एक विशिष्ट प्रकार है जो बेहद तेजी से फैलता है। इमरान हाशमी ने बताया कि इस जांच रिपोर्ट से पहले अयान के स्वास्थ्य में किसी भी तरह की गिरावट या बीमारी के कोई लक्षण दिखाई नहीं दिए थे। बच्चा पूरी तरह सक्रिय और स्वस्थ लग रहा था। अचानक आए इस मेडिकल आपातकाल ने पूरे परिवार को गहरे सदमे में डाल दिया क्योंकि किसी ने सपने में भी नहीं सोचा था कि तीन साल के बच्चे को इतनी खतरनाक बीमारी घेर सकती है।
करियर के चरम पर कंक्रीट की दीवार से टकराने जैसा अनुभव
अपनी जिंदगी के उस सबसे मुश्किल दौर को याद करते हुए इमरान हाशमी ने साझा किया कि साल 2003 में अपने अभिनय सफर की शुरुआत करने के बाद से वे लगातार कड़ी मेहनत कर रहे थे। साल 2014 तक आते-आते वे अपने फिल्मी करियर के सबसे बेहतरीन और सफल दौर का आनंद ले रहे थे। उनकी फिल्में बॉक्स ऑफिस पर झंडे गाड़ रही थीं और वे अपने पेशेवर जीवन की ऊंचाइयों पर थे। लेकिन बेटे की बीमारी की खबर उनके लिए किसी साधारण रुकावट या स्पीड ब्रेकर जैसी नहीं थी। इमरान के शब्दों में, उन्हें ऐसा महसूस हुआ मानो वे पूरी रफ्तार के साथ किसी मजबूत कंक्रीट की दीवार से जा टकराए हों। अचानक जिंदगी की तमाम प्राथमिकताएं बदल गईं और करियर की तमाम उपलब्धियां एक झटके में बेमानी हो गईं।
उस पल में इमरान हाशमी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि वे अपने मासूम बेटे के सामने खुद को टूटने से कैसे बचाएं। एक तरफ जहां पिता का दिल अंदर से पूरी तरह बिखर चुका था, वहीं दूसरी तरफ बेटे के सामने साहस का एक मजबूत कवच बनाए रखना बेहद जरूरी था ताकि बच्चा माता-पिता के चेहरों पर खौफ न देख सके।
मासूम के सामने आंसुओं पर काबू और 6 महीने का कठिन इलाज
डॉक्टरों द्वारा कैंसर की पुष्टि किए जाने के बाद इमरान हाशमी और उनकी पत्नी परवीन के लिए सबसे बड़ी परीक्षा अपने अंदर के डर को अयान से छिपाने की थी। जब डॉक्टर ने उन्हें अयान की बीमारी के बारे में बताया तो दोनों पति-पत्नी ने अपने आंसुओं को बेटे के सामने नहीं बहने दिया। अयान को उस कमरे में अकेला छोड़कर दोनों दूसरे कमरे में चले गए और वहां जाकर एक-दूसरे को पकड़कर फूट-फूटकर रोए। वे जानते थे कि अगर बच्चे ने उन्हें रोते हुए देख लिया तो उसके बाल मन और मानसिक स्थिति पर इसका बहुत बुरा और नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
इमरान बताते हैं कि शुरुआती एक हफ्ता उनके और उनकी पत्नी परवीन के लिए अत्यंत भारी और असहनीय बीता। लेकिन उस कठिन सप्ताह के गुजरने के बाद दोनों ने यह दृढ़ संकल्प लिया कि वे अयान के सामने कभी भी अपनी कमजोरी नहीं दिखाएंगे और एक चट्टान की तरह मजबूत खड़े रहेंगे। इसके बाद अयान के इलाज की मुख्य प्रक्रिया शुरू हुई जो अगले छह महीनों तक जारी रही। इन छह महीनों के दौरान मासूम अयान को अत्यंत दर्दनाक सर्जरी और कीमोथेरेपी की तकलीफदेह प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ा। इस पूरे दौर में इमरान और उनकी पत्नी ने अपनी तमाम तकलीफों को छुपाकर बेटे के भीतर उम्मीद और आत्मविश्वास की किरण को जलाए रखा कि वह जल्द ही पूरी तरह ठीक हो जाएगा।
इलाज पूरा होने के बाद भी 5 सालों तक छाया रहा खौफ
छह महीने की कठिन और सघन चिकित्सा प्रक्रिया पूरी होने के बाद अयान का ट्यूमर तो निकाल दिया गया, लेकिन इसके बावजूद परिवार की चिंताएं और खौफ खत्म नहीं हुआ था। कैंसर एक ऐसी बीमारी है जिसमें इसके दोबारा उभरने या वापस लौटने का जोखिम हमेशा बना रहता है। इसी वजह से मुख्य इलाज खत्म होने के बाद भी अगले पांच सालों तक अयान के हर तीन महीने में नियमित मेडिकल टेस्ट और स्कैन कराए जाते रहे। हर तीन महीने पर आने वाली टेस्ट रिपोर्ट का इंतजार परिवार के लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं होता था।
इमरान हाशमी बताते हैं कि चूंकि उस समय अयान बहुत छोटा था, इसलिए उसे उस दर्दनाक इलाज और अस्पताल के चक्करों की ज्यादा बातें याद नहीं हैं। लेकिन इमरान का मानना है कि इतने छोटे बच्चे के शरीर और मन पर पड़े उस गहरे प्रभाव की कुछ न कुछ परछाई या छाया उसके अवचेतन मन में आज भी जरूर कहीं न कहीं मौजूद होगी।
ज्ञान को बनाया हथियार और लिखी प्रेरणादायक किताब
अपने बेटे की बीमारी से उपजे संकट के सामने घुटने टेकने के बजाय इमरान हाशमी ने स्थिति को समझने और ज्ञान हासिल करने का रास्ता चुना। उन्होंने कैंसर और विल्म्स ट्यूमर से जुड़ी मेडिकल किताबों, शोध पत्रों और रिसर्च आर्टिकल्स को गहराई से पढ़ना शुरू कर दिया। इमरान ने इस विषय पर इतना गहन अध्ययन कर लिया था कि कई बार अयान का इलाज कर रहे डॉक्टर भी हैरान रह जाते थे। डॉक्टर्स उनसे पूछते थे कि एक गैर-मेडिकल पृष्ठभूमि का व्यक्ति होने के बावजूद उन्हें इस बीमारी के हर बारीक पहलू और तकनीकी जानकारी के बारे में इतनी समझ कैसे है।
अपने इसी कठिन अनुभव, एकत्रित की गई जानकारी और व्यक्तिगत संघर्ष के आधार पर इमरान हाशमी ने आगे चलकर एक किताब भी लिखी। इस किताब का नाम द किस ऑफ लाइफ: हाउ ए सुपरहीरो एंड माई सन डिफीटेड कैंसर रखा गया। इमरान ने स्पष्ट किया कि इस पुस्तक को लिखने का उनका उद्देश्य केवल अपनी आपबीती या निजी दुख की कहानी सुनाना नहीं था। बल्कि वे उन तमाम माता-पिता की मदद और मार्गदर्शन करना चाहते थे जो अपने मासूम बच्चों के साथ कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी से जूझ रहे हैं और जिन्हें सही जानकारी तथा उम्मीद की जरूरत है।
परिवार पर दुखों का पहाड़ और मां का निधन
बेटे अयान के कैंसर से उबरने और ठीक होने की प्रक्रिया अभी चल ही रही थी कि इमरान हाशमी के परिवार पर दुखों का एक और बड़ा पहाड़ टूट पड़ा। अयान के इलाज के कुछ ही समय बाद इमरान की मां को भी कैंसर होने का पता चला। यह खबर परिवार के लिए एक और करारा झटका थी। मां की स्थिति तेजी से बिगड़ती चली गई और कैंसर का पता चलने के महज छह महीने के भीतर ही उनका निधन हो गया। अपनी मां को खोने के इस गहरे सदमे के साथ-साथ इसी दौर में इमरान ने अपनी दादी को भी हमेशा के लिए खो दिया।
साल 2014 से लेकर अगले छह से सात सालों का यह पूरा दौर इमरान हाशमी के लिए व्यक्तिगत त्रासदियों, गंभीर बीमारियों और अपनों को खोने का एक लंबा और कष्टकारी दौर रहा। इमरान का कहना है कि इन तमाम हादसों और मुश्किलों ने उन्हें जिंदगी को देखने का एक नया और बिल्कुल अलग नजरिया दिया है। इन संघर्षों ने उन्हें मानसिक रूप से बेहद मजबूत और भावनात्मक रूप से परिपक्व बना दिया। इमरान हाशमी का मानना है कि चाहे जिंदगी में परिस्थितियां कितनी ही प्रतिकूल क्यों न हो जाएं और इंसान अपने सबसे बुरे दौर से क्यों न गुजर रहा हो, फिर भी उसे कभी भी उम्मीद का दामन नहीं छोड़ना चाहिए।



















