मानवीय संवेदनाओं के दायरे बहुत व्यापक होते हैं, लेकिन जब मन के भीतर पल रही जिद और नफरत चरम सीमा पर पहुंच जाती है, तो इंसानियत का पतन होने लगता है। हिंदी सिनेमा में कहानीकारों ने समय-समय पर इस नकारात्मक और डार्क पहलू को बेहद संजीदगी और गहराई के साथ दर्शकों के सामने पेश किया है। चाहे बात किसी एकतरफा दीवानगी की हो, बरसों पुरानी रंजिश की आग हो या फिर प्रतिशोध की जिद्दी ललक, इन विषयों पर बनी फिल्में हमेशा सिनेमाप्रेमियों को अंदर तक झकझोर देती हैं। भारतीय बॉक्स ऑफिस और दर्शकों के दिलों पर अमिट छाप छोड़ने वाली ऐसी ही 7 बेहतरीन फिल्मों का ब्योरा नीचे दिया गया है, जिनकी ठोस पटकथा और जबरदस्त अभिनय ने नफरत और सनक के कई अनछुए रंगों को उजागर किया।
डर (1993)
वर्ष 1993 में रिलीज हुई और प्रसिद्ध निर्देशक यश चोपड़ा के निर्देशन में बनी फिल्म डर को जुनूनी प्रेम और सनक का सबसे बड़ा उदाहरण माना जाता है। इस थ्रिलर ड्रामा में राहुल का किरदार निभा रहे शाहरुख खान की दीवानगी किरण यानी जूही चावला के लिए इस कदर बढ़ जाती है कि वह साधारण प्रेम से एक खौफनाक और जानलेवा जुनून में तब्दील हो जाती है। फिल्म का बहुचर्चित संवाद 'आई लव यू क-क-क-किरन' और शाहरुख खान का साइको-लवर वाला रूप यह साफ दर्शाता है कि जब किसी व्यक्ति की जिद हिंसक नफरत का रूप ले लेती है, तो वह किस तरह तबाही का कारण बनती है।
बाजीगर (1993)
इसी साल 1993 में ही आई अब्बास-मस्तान द्वारा निर्देशित सस्पेंस थ्रिलर फिल्म बाजीगर नफरत और बदले की बेहद गहरी भावना पर केंद्रित है। इस कहानी में अजय शर्मा अथवा विक्की मल्होत्रा के किरदार में शाहरुख खान अपने पिता की असामयिक मौत और पूरे परिवार की बर्बादी का बदला लेने के इरादे से मैदान में उतरते हैं। उनका एकमात्र मकसद मदन चोपड़ा के खड़े किए गए व्यावसायिक साम्राज्य को पूरी तरह ध्वस्त करना होता है। प्रतिशोध की नफरत में अंधे होकर वह प्यार का झूठा ढोंग रचते हैं और निर्दयता से हत्या जैसी संगीन घटनाओं को अंजाम देने से भी नहीं हिचकते।
अग्नि साक्षी (1996)
निदेशक पार्थो घोष के निर्देशन में वर्ष 1996 में निर्मित थ्रिलर फिल्म अग्नि साक्षी में नाना पाटेकर द्वारा निभाया गया विश्वनाथ का चरित्र नफरत और अधिकार जमाने के जुनून की पराकाष्ठा को दिखाता है। अपनी पत्नी शुभांगी उर्फ मधु, जिसका किरदार मनीषा कोइराला ने निभाया था, पर जबरन अपना हक जताने और उसे हर हाल में पाने की जिद पूरी कहानी को बेहद डरावना और तनावपूर्ण बना देती है। नाना पाटेकर के असाधारण और खौफनाक अभिनय ने इस किरदार के साथ-साथ पूरी फिल्म को भारतीय सिनेमा के इतिहास में याद रखने योग्य बना दिया।
हासिल (2003)
वर्ष 2003 में आई तिग्मांशु धूलिया की फिल्म हासिल इलाहाबाद यूनिवर्सिटी की छात्र राजनीति और उसके पीछे छिपी आपसी नफरत की कड़वी सच्चाई पर एक तीखा प्रहार करती है। इस फिल्म में रणविजय सिंह के रूप में इरफान खान का किरदार निहारिका यानी ऋषिता भट्ट को पाने के जुनून में अंधा रहता है। साथ ही अपने प्रतिद्वंद्वी अनिकेत, जिसे जिमी शेरगिल ने निभाया है, के प्रति उसकी नफरत इतनी भयानक होती है कि वह नैतिकता, दोस्ती, मान-सम्मान और तमाम सामाजिक बंधनों को दांव पर लगा देता है। इरफान खान के इस जानदार प्रदर्शन को हिंदी सिनेमा के सबसे खतरनाक और जटिल नकारात्मक किरदारों में गिना जाता है।
एक विलेन (2014)
मोहित सूरी के निर्देशन में साल 2014 में बनी फिल्म एक विलेन नफरत की दो अलग-अलग मानसिकताओं और स्वरूपों को उजागर करती है। कहानी में एक तरफ राकेश महाडकर के रूप में रितेश देशमुख का किरदार अपनी रोजमर्रा की जिंदगी की कुंठाओं को मिटाने के लिए अनजान महिलाओं से नफरत करता है और उनकी हत्या कर देता है। दूसरी तरफ गुरु का किरदार निभा रहे सिद्धार्थ मल्होत्रा अपनी पत्नी की नृशंस हत्या का बदला लेने के लिए प्रतिशोध की आग में जलते हैं। यह फिल्म स्पष्ट रूप से संदेश देती है कि नफरत की इस अंधी लड़ाई में अंततः दोनों पक्षों का नुकसान होता है और जीत किसी की नहीं होती।
बदलापुर (2015)
श्रीराम राघवन के निर्देशन में वर्ष 2015 में आई क्राइम-थ्रिलर फिल्म बदलापुर पूरी तरह से प्रतिशोध की ललक और जिद पर आधारित है। एक बैंक डकैती के दौरान अपनी पत्नी और छोटे मासूम बेटे को खो देने के बाद राघव यानी वरुण धवन का जीवन केवल और केवल नफरत से भर जाता है। पूरे 15 वर्षों तक अपने भीतर प्रतिशोध की ज्वाला को जलाए रखना और शातिर अपराधी लायक, जिसका किरदार नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने निभाया है, से बदला लेने का उनका पक्का संकल्प दर्शकों को यह सोचने पर मजबूर कर देता है कि नफरत की राह पर चलकर बदला लेने वाला इंसान खुद किस हद तक बदल जाता है।
कबीर सिंह (2019)
साल 2019 में रिलीज हुई और संदीप रेड्डी वांगा द्वारा निर्देशित फिल्म कबीर सिंह एक ऐसे जुनूनी प्रेमी की कहानी बयान करती है जो अपने प्यार से बिछड़ने के बाद खुद को तबाही की ओर धकेल देता है। शाहिद कपूर द्वारा अभिनीत इस किरदार की बेकाबू जिद, अनियंत्रित गुस्सा और पूरी दुनिया के प्रति उपजी नफरत उसे आत्मघाती मोड़ पर खड़ा कर देती है। शाहिद कपूर के प्रभावशाली और गहन अभिनय ने इस किरदार को बेहद चर्चित बनाया और यह फिल्म उस साल की सबसे बड़ी ब्लॉकबस्टर फिल्मों में शामिल हुई।



















