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देशभर में थम क्यों नहीं रहीं दुष्कर्म की घटनाएं, क्या निर्भया कानून के बाद भी सुरक्षित नहीं हैं हमारी बेटियांभारत
4 सित॰ 2026, 3:40 pm (19 मिनट पहले)· 3

देशभर में थम क्यों नहीं रहीं दुष्कर्म की घटनाएं, क्या निर्भया कानून के बाद भी सुरक्षित नहीं हैं हमारी बेटियां

दिल्ली, मुंबई और पटना जैसे बड़े शहरों में लगातार सामने आ रही दुष्कर्म की घटनाओं ने एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं कि कड़े कानूनों के बावजूद देश में महिलाओं और बच्चियों के खिलाफ अपराध कम क्यों नहीं हो रहे हैं।

हाल ही में मुंबई से एक बेहद दहला देने वाली खबर सामने आई, जहां स्कूल वैन के ड्राइवर ने तीन साल की मासूम बच्ची के साथ दरिंदगी की हदें पार कर दीं। स्कूल से घर लौटते समय जब वह नन्ही बच्ची वैन में बिल्कुल अकेली थी, तब उस ड्राइवर की गंदी मानसिकता ने उसे अपनी हवस का शिकार बना लिया। इस घटना से ठीक पहले बिहार के बक्सर जिले से एक ऐसी ही शर्मनाक खबर आई, जहां स्कूल के शिक्षकों ने ही छात्राओं के साथ दुष्कर्म किया। वहीं, नोएडा से दिल्ली के बीच महज 47 किलोमीटर के सफर के दौरान एक सोलह साल की छात्रा के साथ हुए सामूहिक दुष्कर्म ने पूरे इलाके में सनसनी फैला दी। इन तमाम घटनाओं के बीच सबसे बड़ा और गंभीर सवाल यह बना हुआ है कि आखिर भारत में दुष्कर्म की ये घटनाएं थमने का नाम क्यों नहीं ले रही हैं। स्कूल की वैन हो, स्कूल बस हो या फिर खुद शिक्षा का मंदिर कहे जाने वाले स्कूल, आखिर हमारी बेटियां देश में कहां सुरक्षित हैं और इस सवाल का सबसे सीधा और कड़वा जवाब यही है कि वे कहीं भी सुरक्षित नहीं हैं।

राजधानियों से लेकर महानगरों तक एक जैसी डरावनी तस्वीर

यदि पिछले दस दिनों के भीतर हुई आपराधिक वारदातों पर गहरी नजर डाली जाए, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि चाहे देश की राजधानी हो या किसी राज्य की राजधानी, हर तरफ हालात एक जैसे ही हैं। दिल्ली, मुंबई और पटना तीनों ही बड़े शहरों की चकाचौंध और आधुनिकता के पीछे जो एक खौफनाक हकीकत समान रूप से देखने को मिली है, वह लगातार सामने आ रही दुष्कर्म की जघन्य वारदातें हैं। कहीं शिक्षक के रूप में, कहीं वैन चालक के रूप में और कहीं बस ड्राइवर के रूप में समाज के बीच घूम रहे इन दरिंदों का शरीर भले ही इंसानों का हो, लेकिन इनकी आत्मा पूरी तरह से शैतान बन चुकी है और ये हैवान लगातार हमारी और आपकी बेटियों को अपना निशाना बना रहे हैं। यह कोई पहली या सौवीं घटना नहीं है, बल्कि इससे पहले अनगिनत दुष्कर्म, सामूहिक दुष्कर्म और यौन उत्पीड़न के मामले सामने आ चुके हैं और यह सिलसिला लगातार जारी है। जब भी इस तरह की कोई भयानक घटना प्रकाश में आती है, तो जनता के मन में फिर से वही पुराने सवाल उठ खड़े होते हैं कि आखिर ये अपराध रुक क्यों नहीं रहे हैं, इन बलात्कारियों को तुरंत मौत के घाट क्यों नहीं उतारा जाता और इन अपराधियों के दिलों में देश के कानून का कोई खौफ क्यों नहीं बचा है। क्या हमारे देश में मजबूत और सख्त कानूनों की कमी है या फिर 2012 के ऐतिहासिक निर्भया कांड के बाद भी भारत की व्यवस्था में कुछ भी नहीं बदला है।

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निर्भया कांड और उसके बाद बदले हुए आपराधिक कानून

देशवासियों को अच्छी तरह याद होगा कि 16 दिसंबर 2012 को दिल्ली में निर्भया के साथ हुई अत्यंत बर्बर और क्रूर घटना ने पूरे देश को अंदर तक झकझोर कर रख दिया था। इस घटना ने केवल आम नागरिकों के दिलों में भारी गुस्सा ही नहीं पैदा किया, बल्कि देश की पूरी कानून व्यवस्था और सुरक्षा तंत्र में बड़े पैमाने पर बदलाव लाने की जोरदार मांग भी खड़ी कर दी थी। देश के युवा सड़कों पर उतर आए थे और इस घटना की गूंज विदेशों तक साफ सुनाई दी थी। सरकार ने तुरंत कई समितियों का गठन किया और न्यायमूर्ति वर्मा समिति की महत्वपूर्ण सिफारिशों के आधार पर आपराधिक कानून संशोधन अधिनियम, 2013 को संसद द्वारा पारित किया गया, जिसे आम बोलचाल की भाषा में निर्भया कानून या निर्भया एक्ट के रूप में जाना जाता है। इस दौरान निर्भया फंड की भी स्थापना की गई, लेकिन इसके बावजूद सबसे बड़ा सवाल यही बना रहा कि इन सब का असल धरातल पर क्या असर हुआ और जमीन पर स्थितियां कितनी बदलीं।

कानून के दायरे में आए व्यापक बदलाव

यदि केवल कागजी दस्तावेजों और अदालती फैसलों के दृष्टिकोण से देखा जाए, तो इस नए कानून ने दुष्कर्म की कानूनी परिभाषा को बेहद व्यापक और विस्तृत बना दिया था। इस संशोधन से पहले कानून में केवल पेनाइल पेनिट्रेशन को ही दुष्कर्म की श्रेणी में माना जाता था, लेकिन निर्भया कानून के लागू होने के बाद शरीर के किसी भी अन्य हिस्से या किसी भी वस्तु के द्वारा पेनिट्रेशन किया जाना, तथा ओरल सेक्स जैसे कुकृत्य भी दुष्कर्म की कानूनी परिभाषा के अंतर्गत शामिल कर लिए गए। इसके अलावा एसिड फेंकने की घटनाएं, किसी का पीछा करना यानी स्टॉकिंग, तांकझांक करना यानी वोयरिज्म और यौन उत्पीड़न जैसे नए गंभीर अपराधों को भी कानून में जोड़ा गया। दुष्कर्म के मामलों में सजा की न्यूनतम अवधि को काफी बढ़ा दिया गया। सामूहिक दुष्कर्म के मामलों में कम से कम बीस साल की कठोर कैद का प्रावधान किया गया। यदि दुष्कर्म के दौरान पीड़िता की मृत्यु हो जाती है या वह कोमा यानी वेजिटेटिव अवस्था में चली जाती है, तो अदालत द्वारा मौत की सजा सुनाए जाने का प्रावधान भी संभव बनाया गया। इसके अलावा सहमति की कानूनी उम्र को सोलह साल से बढ़ाकर अठारह साल कर दिया गया। किशोर न्याय कानून में भी आवश्यक संशोधन किए गए, जिसके तहत सोलह से अठारह वर्ष की आयु वर्ग के आरोपियों पर गंभीर और जघन्य अपराधों के मामलों में एक वयस्क अपराधी की तरह ही मुकदमा चलाया जा सके।

क्या कड़े कानूनों से रुके अपराध, आंकड़े क्या कहते हैं

ये सभी कानूनी बदलाव सैद्धांतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण और आवश्यक थे, लेकिन इसके बावजूद सबसे बड़ा और कड़वा सवाल यही बना हुआ है कि क्या इन संशोधनों से देश में दुष्कर्म और सामूहिक दुष्कर्म की वारदातों में कोई कमी आई है। इसका सबसे सीधा और निराशाजनक जवाब है कि नहीं, क्योंकि राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो यानी एनसीआरबी के आंकड़े साल दर साल इसकी वास्तविक और डरावनी हकीकत को बयां करते रहते हैं। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि साल 2012 में देश भर में दर्ज किए गए दुष्कर्म के मामलों की कुल संख्या 24,923 थी। इसके तुरंत बाद साल 2013 में यह संख्या तेजी से बढ़कर 33,707 हो गई। साल 2014 में यह आंकड़े और बढ़कर 36,735 तक पहुंच गए और साल 2016 में यह अपने सबसे ऊंचे शिखर यानी 38,947 मामलों पर जा पहुंचे। इसके बाद के वर्षों में यह आंकड़े लगभग 31 हजार से 33 हजार के दायरे के आसपास ही स्थिर बने रहे। साल 2020 में कोविड महामारी के दौरान यह संख्या 28,046 दर्ज की गई, जबकि साल 2022 में 31,516, साल 2023 में 29,670 और साल 2024 में लगभग 29,536 मामले दर्ज किए गए। इन आंकड़ों से साफ पता चलता है कि साल 2012 के मुकाबले आज भी रिपोर्ट किए जाने वाले मामलों की संख्या स्पष्ट रूप से ज्यादा है और इसमें कोई कमी नहीं आई है।

मासूम बच्चियों को बनाया जा रहा है दरिंदगी का शिकार

कानून बनने के बाद भी आपराधिक घटनाओं में कोई कमी न आना समाज के लिए बेहद चिंताजनक विषय है। आज हालत यह है कि एक साल, दो साल, तीन साल और चार साल की ऐसी मासूम बच्चियां, जो ठीक से ढंग से बोल भी नहीं पाती हैं और अपने साथ हुई इस भयानक दरिंदगी को शब्दों में बयां भी नहीं कर सकती हैं, वे आज पहले से कहीं अधिक संख्या में दुष्ट और दुर्दांत मानसिकता वाले राक्षसों की हवस का शिकार बन रही हैं। सरकारें और विभिन्न एजेंसियां भले ही अपने बचाव में लाख तर्क दें कि मामलों में यह बढ़ोतरी इस बात का सबूत नहीं है कि वास्तविक अपराध बढ़े हैं, बल्कि इसका कारण यह है कि निर्भया कांड के बाद समाज में जागरूकता आई है, पुलिस स्टेशनों में रिपोर्ट दर्ज कराने को लेकर लोगों का डर कम हुआ है और महिलाएं अब खुलकर सामने आने लगी हैं, जिसके चलते रिपोर्टिंग का दायरा बढ़ा है। लेकिन इसके साथ ही यह कड़वी सच्चाई भी अपनी जगह कायम है कि देश में मुकदमों के बाद सजा मिलने की दर अभी भी मात्र सत्ताईस प्रतिशत के आसपास ही है, यानी लगभग तिहत्तर फीसदी दरिंदे आज भी हमारे देश की लचर कानूनी प्रक्रिया और व्यवस्था का पूरा फायदा उठाकर खुलेआम घूम रहे हैं। हकीकत यही है कि कानून भले ही कागजों पर सख्त कर दिए गए हों, लेकिन हमारी सामाजिक मानसिकता, पुलिस की संवेदनशीलता और धीमी अदालती प्रक्रिया आज भी दुष्कर्म जैसी गंभीर घटनाओं को प्रभावी ढंग से रोकने में पूरी तरह नाकाम साबित हो रही है।

सजा के प्रावधानों से पहले सुधार की है सख्त जरूरत

निर्भया कांड के बाद देश में जितने भी नए कानून बनाए गए, उनमें सबसे बड़ा जोर इस बात पर रहा कि अपराध हो जाने के बाद सजा के प्रावधानों को कितना सख्त किया जाए और जेल की अवधि को कितना बढ़ाया जाए। लेकिन मौजूदा समय की सबसे बड़ी और अहम मांग यह है कि सख्ती उस शुरुआती स्तर पर होनी चाहिए जहां से इन दुष्कर्मियों के हौसले इतने बुलंद ही न हो सकें कि वे ऐसा जघन्य कदम उठाने के बारे में सोच भी सकें। अपराधियों के मन में अपराध करने से पहले उसका इतना भयंकर खौफ होना चाहिए कि ऐसा कोई भी कदम उठाने से पहले उनकी रूह कांप उठे। यह सख्ती केवल कानूनी स्तर पर ही नहीं, बल्कि प्रशासनिक स्तर पर, परिवार के स्तर पर, पूरे समाज के स्तर पर और स्कूलों के भीतर भी बेटियों को सुरक्षित और संरक्षित करने के लिए ठोस बदलाव लाने की बहुत बड़ी आवश्यकता है। आज लगातार नैतिक मूल्यों का पतन हो रहा है और इसी वजह से हमारा आधुनिक समाज बेटियों की रक्षा करने में पूरी तरह असफल साबित हो रहा है। निर्भया कानून निश्चित रूप से एक बहुत जरूरी और सराहनीय कदम था, लेकिन केवल कुछ कानूनों के बन जाने से पूरे समाज की सोच और आचार-विचार नहीं बदल सकते। जब तक हमारे घरों, परिवारों, शिक्षण संस्थानों और समाज के हर कोने में लड़कियों की सुरक्षा, उनकी गरिमा और उनके पूर्ण सम्मान की एक मजबूत संस्कृति का निर्माण नहीं किया जाता, तब तक देश के ये शर्मनाक आंकड़े हम सभी को हर दिन शर्मसार करते रहेंगे।

सवाल-जवाब

निर्भया कानून कब और क्यों पारित किया गया था?
यह कानून 16 दिसंबर 2012 को दिल्ली में हुई निर्भया की घटना के बाद न्यायमूर्ति वर्मा समिति की सिफारिशों के आधार पर 2013 में पारित किया गया था।
निर्भया कानून के तहत दुष्कर्म की परिभाषा में क्या बदलाव किए गए?
इस कानून के बाद पेनाइल पेनिट्रेशन के अलावा शरीर के किसी भी हिस्से या वस्तु से पेनिट्रेशन और ओरल सेक्स को भी दुष्कर्म की श्रेणी में जोड़ा गया।
सामूहिक दुष्कर्म के मामलों में नए कानून में न्यूनतम सजा का क्या प्रावधान है?
संशोधित कानूनों के तहत सामूहिक दुष्कर्म के मामलों में कम से कम 20 साल की कठोर सजा का प्रावधान किया गया है।
हाल ही में मुंबई और बिहार में किस तरह की घटनाएं सामने आईं?
मुंबई में स्कूल वैन के ड्राइवर द्वारा 3 साल की मासूम बच्ची के साथ और बिहार के बक्सर में शिक्षकों द्वारा छात्राओं के साथ दुष्कर्म की घटनाएं सामने आईं।
देश में दुष्कर्म के मामलों में सजा की मौजूदा दर कितनी है?
विभिन्न रिपोर्टों और आंकड़ों के अनुसार देश में दुष्कर्म के मामलों में सजा की दर अभी भी लगभग 27 प्रतिशत के आसपास बनी हुई है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

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