चार दशकों से अधिक समय से भारतीय सिनेमा में सक्रिय वरिष्ठ अभिनेता संजय दत्त ने हाल ही में फिल्म उद्योग के बदलते मिजाज और अपनी व्यक्तिगत जिंदगी से जुड़े कई अहम अनुभवों पर बेबाकी से चर्चा की है। हैदराबाद स्थित एआईजी हॉस्पिटल्स के आधिकारिक यूट्यूब चैनल पर अस्पताल के चेयरमैन डॉ. डी. नागेश्वर रेड्डी के साथ बातचीत के दौरान उन्होंने बॉलीवुड के वर्तमान माहौल, अपने अभिनय के सहज अंदाज और जेल के दिनों में मिली सबसे बड़ी सीख को साझा किया। लंबे समय तक हिंदी सिनेमा का हिस्सा रहने के नाते संजय दत्त ने इस बात पर चिंता व्यक्त की कि समय के साथ फिल्म इंडस्ट्री के भीतर आपसी आत्मीयता और काम करने का माहौल काफी हद तक बदल चुका है।
पारिवारिक माहौल से गलाकाट प्रतिस्पर्धा तक का सफर
फिल्म उद्योग में बिताए अपने शुरुआती दिनों को याद करते हुए संजय दत्त ने बताया कि जब उन्होंने अपने फिल्मी करियर की शुरुआत की थी, तब पूरी इंडस्ट्री एक एकजुट परिवार की तरह काम करती थी। उस दौर में कलाकार, निर्माता और निर्देशक एक-दूसरे के सुख-दुख में साथ खड़े रहते थे तथा किसी भी साथी कलाकार की सफलता पर खुलकर खुशियां मनाते थे। हालांकि, बदलते वक्त के साथ इस सकारात्मक वातावरण में भारी गिरावट आई है। संजय दत्त के अनुसार, अब इंडस्ट्री में पहले जैसा अपनापन और आपसी सहयोग देखने को नहीं मिलता। वर्तमान समय में बॉलीवुड में अत्यधिक कॉम्पिटिटिव माहौल बन चुका है और सब कुछ पहले से कहीं ज्यादा कट-थ्रोट यानी गलाकाट हो गया है, जहां हर कोई एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ में लगा हुआ है।
हॉलीवुड के आपसी सहयोग और एकजुटता से तुलना
अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए संजय दत्त ने भारतीय फिल्म इंडस्ट्री की तुलना हॉलीवुड से की। उन्होंने स्पष्ट किया कि हॉलीवुड में कलाकार, पटकथा लेखक और सिनेमा जगत से जुड़े तमाम संगठन हमेशा एक-दूसरे के साथ मजबूती से खड़े नजर आते हैं। वहां जब ऑस्कर जैसे बड़े और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर किसी कलाकार को सम्मानित किया जाता है, तो साथी कलाकारों के चेहरे पर ईर्ष्या के बजाय सच्ची खुशी और गर्व का भाव दिखाई देता है। संजय दत्त का मानना है कि किसी भी फिल्म उद्योग को लंबे समय तक समृद्ध और मजबूत बनाए रखने के लिए यह एकजुटता और आपसी जुड़ाव सबसे महत्वपूर्ण ताकत होती है, जिसकी कमी आज स्थानीय स्तर पर महसूस हो रही है।
दिल के सबसे करीब रही 'मुन्ना भाई एमबीबीएस'
साक्षात्कार के दौरान जब संजय दत्त से उनके सबसे पसंदीदा किरदारों के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने मुस्कुराते हुए स्वीकार किया कि पर्दे पर गैंगस्टर की भूमिकाएं निभाना उन्हें हमेशा से काफी पसंद रहा है। इसके बावजूद, उनकी मशहूर फिल्म 'मुन्ना भाई एमबीबीएस' उनके दिल के सबसे करीब है। संजय दत्त ने बताया कि इस फिल्म ने डॉक्टरों और मरीजों के बीच के मानवीय रिश्तों को लेकर उनके दृष्टिकोण को पूरी तरह से बदल दिया। उन्होंने कहा कि चिकित्सा क्षेत्र में काम करने वाले डॉक्टरों पर मानसिक दबाव बहुत अधिक होता है। ऐसी स्थिति में, यदि डॉक्टर किसी मरीज के पास जाकर केवल दो मिनट भी उसका हाल-चाल पूछ लें और उसका हाथ थामकर यह भरोसा दें कि सब ठीक हो जाएगा, तो इससे मरीज को बहुत बड़ी मानसिक शक्ति मिलती है। संजय दत्त ने इस भावनात्मक पहलू को अपनी मां की बीमारी के दौरान अस्पताल में मिले व्यक्तिगत अनुभवों से जोड़ते हुए साझा किया।
अभिनय का सहज तरीका और सेट का अनुभव
अपनी अभिनय शैली का खुलासा करते हुए संजय दत्त ने बताया कि वे किसी भी दृश्य को फिल्माने से पहले बहुत अधिक तैयारी या रिहर्सल करने में विश्वास नहीं रखते। उनकी काम करने की शैली बेहद सहज और व्यावहारिक है। वे सबसे पहले निर्देशक से स्क्रिप्ट सुनते हैं और फिर सीधे शूटिंग सेट पर पहुंच जाते हैं। इसके बाद निर्देशक जिस तरह से दृश्य की मांग और भावना को समझाते हैं, संजय दत्त उसी के अनुसार कैमरे के सामने प्रदर्शन कर देते हैं। उनका मानना है कि अत्यधिक रिहर्सल के बजाय सेट पर निर्देशक के निर्देशों के अनुसार काम करना चरित्र को अधिक प्रामाणिक बनाता है।
जेल में मिला जीवन का सबसे बड़ा सबक
अपने जीवन के कठिन और चुनौतीपूर्ण दौर का जिक्र करते हुए वरिष्ठ अभिनेता ने कारावास के दिनों को भी याद किया। उन्होंने बताया कि जेल में बिताए समय ने उन्हें जिंदगी का सबसे बड़ा और अनमोल सबक 'माफ करना' सिखाया। संजय दत्त के अनुसार, जेल में तैनात एक कांस्टेबल ने उन्हें एक बेहद महत्वपूर्ण सलाह दी थी। उस सिपाही ने कहा था कि यदि जिंदगी में शांति से आगे बढ़ना है, तो लोगों की गलतियों को भुलाकर उन्हें माफ करना सीखना होगा। संजय दत्त ने उस सिपाही की इस सलाह को अपने दिल से लगा लिया और आज भी इसे अपने दैनिक जीवन का एक मुख्य आधार मानते हैं। उनका मानना है कि क्षमाशीलता ही इंसान को जीवन में आगे बढ़ने का संबल देती है।



















