मुंबई के प्रतिष्ठित बांद्रा क्षेत्र में स्थित आशीर्वाद बंगला एक बार फिर कानूनी और सार्वजनिक चर्चा के केंद्र में आ गया है। बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में मीडिया संस्थानों, वेब पोर्टल्स और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को कड़ा निर्देश दिया है कि वे इस ऐतिहासिक संपत्ति को भूतिया, मनहूस, अशुभ या श्रापित बताने वाली रिपोर्ट और वीडियो का प्रसारण तुरंत रोकें। अदालत ने साफ किया है कि किसी के व्यक्तिगत निवास स्थान के बारे में बिना किसी ठोस सबूत के ऐसी मनगढ़ंत कहानियां फैलाना सीधे तौर पर मानहानि की श्रेणी में आता है।
आशीर्वाद बंगले का ऐतिहासिक दौर और राजेश खन्ना का दौर
एक समय था जब बांद्रा के इस बंगले के बाहर अपने पसंदीदा सुपरस्टार की एक झलक पाने के लिए प्रशंसकों की भारी भीड़ जमा रहती थी। दिवंगत सुपरस्टार राजेश खन्ना जब अपनी सफलता के चरम पर थे, तब हर रविवार को बंगले की बालकनी में आकर अपने चाहने वालों का अभिवादन स्वीकार करते थे। देश के दूर-दराज़ हिस्सों से आने वाले लोग घंटों वहां खड़े रहकर काका की एक मुस्कान का इंतजार करते थे। यह बंगला भारतीय सिनेमा के स्वर्णिम इतिहास और प्रशंसकों की दीवानगी की मिसाल बन चुका था। हालांकि, समय बीतने के साथ इस ऐतिहासिक संपत्ति को लेकर इंटरनेट पर तरह-तरह की अफवाहें और अनर्गल दावे प्रसारित किए जाने लगे, जिससे इसकी साख और वर्तमान निवासियों की निजता पर असर पड़ने लगा।
पुराने ढांचे का पुनर्निर्माण और नए मालिक की याचिका
कुछ वर्ष पूर्व इस ऐतिहासिक बंगले को बिजनेसमैन शशि शेट्टी ने खरीदा था। उन्होंने बंगले के पुराने और जर्जर ढांचे को पूरी तरह ध्वस्त करवाकर उसी स्थान पर एक नया आधुनिक तथा आलीशान मकान तैयार कराया। संपत्ति के साथ जुड़े भावनात्मक और ऐतिहासिक महत्व का सम्मान करते हुए उन्होंने नए घर का नाम भी आशीर्वाद ही रखा। हालांकि, इसके बावजूद इंटरनेट आर्टिकल्स, सोशल मीडिया पोस्ट्स और विभिन्न यूट्यूब वीडियोज में इस नए मकान को भी हॉन्टेड और कर्स्ड बताकर लगातार सनसनी फैलाई जाने लगी। इन खबरों से परेशान होकर बिजनेसमैन शशि शेट्टी ने बॉम्बे हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। अपनी याचिका में उन्होंने अदालत को बताया कि झूठे दावों और वीडियो के कारण उनके और उनके परिवार के सामाजिक जीवन तथा मानसिक शांति पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।
अदालत में वरिष्ठ अधिवक्ता बिरेन्द्र सराफ की दलीलें
शशि शेट्टी की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता बिरेन्द्र सराफ ने बॉम्बे हाईकोर्ट के समक्ष विस्तार से पक्ष रखा। उन्होंने अदालत को अवगत कराया कि याचिकाकर्ता ने पुरानी इमारत को गिराकर उसकी जगह एक नया घर बनाया है। हालांकि, नए घर का नाम पुराना ही रखा गया है, इसलिए अतीत के मिथकों, अफवाहों और अंधविश्वासों को इस नई इमारत से जोड़ना पूरी तरह अनुचित और गैरकानूनी है। अधिवक्ता ने तर्क दिया कि व्यूज और टीआरपी हासिल करने के लिए कई डिजिटल प्लेटफॉर्म्स और समाचार चैनल आधारहीन दावे कर रहे हैं, जिससे नए बने घर और उसके मालिक की साख को गंभीर नुकसान पहुंच रहा है।
जस्टिस आरिफ एस. डॉक्टर की टिप्पणी और अंतरिम आदेश
मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस आरिफ एस. डॉक्टर ने याचिकाकर्ता की चिंताओं को वाजिब माना। पीठ ने अपने आदेश में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया कि उपलब्ध रिकॉर्ड और साक्ष्यों के आधार पर प्रथम दृष्टया यह साबित होता है कि बंगले को भूतिया या श्रापित बताने वाली खबरें पूरी तरह मानहानिकारक हैं। अदालत ने कहा कि इस प्रकार की निराधार और सनसनीखेज रिपोर्टिंग याचिकाकर्ता के शांतिपूर्वक और सम्मान के साथ जीने के मौलिक अधिकार पर सीधा प्रहार करती है। हाईकोर्ट ने मीडिया और इंटरनेट प्लेटफॉर्म्स पर ऐसी सामग्री के प्रसारण पर अंतरिम रोक लगा दी है। यह राहत मामले की अगली सुनवाई 21 अगस्त 2026 तक प्रभावी रहेगी। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अंतिम फैसला भी इसी रुख के अनुरूप रहता है, तो यह मीडिया और डिजिटल कंटेंट क्रिएटर्स के लिए एक नजीर साबित होगा।



















