बॉम्बे उच्च न्यायालय ने पूर्व सेलिब्रिटी मैनेजर दिशा सालियान की संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मौत के मामले में एक बड़ा और महत्वपूर्ण आदेश दिया है। अदालत ने इस पूरे प्रकरण की विस्तृत और निष्पक्ष पड़ताल की जिम्मेदारी केंद्रीय जांच ब्यूरो को सौंपने का निर्देश दिया है। न्यायमूर्ति सारंग कोटवाल और न्यायमूर्ति रंजीतसिंह राजा भोसले की दो सदस्यीय पीठ ने याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्रीय जांच एजेंसी को नियमानुसार एफआईआर दर्ज कर नए सिरे से जांच शुरू करने का स्पष्ट निर्देश जारी किया। इस फैसले के बाद चार साल पुराने इस बहुचर्चित मामले में कानूनी पड़ताल की दिशा पूरी तरह बदल गई है।
बॉम्बे हाईकोर्ट का निर्देश और सीबीआई की नई जांच प्रक्रिया
उच्च न्यायालय द्वारा जारी किए गए विस्तृत निर्देशों के तहत सीबीआई को सबसे पहले मृतका के पिता सतीश सालियान का आधिकारिक बयान दर्ज करना होगा। इसके साथ ही दो सदस्यीय पीठ ने पीड़ित परिवार को यह विधिक अधिकार और छूट प्रदान की है कि यदि वे भविष्य में जांच एजेंसी द्वारा सौंपी जाने वाली अंतिम रिपोर्ट या जांच निष्कर्षों से संतुष्ट नहीं होते हैं, तो वे उसे दोबारा अदालत के समक्ष चुनौती दे सकेंगे। अदालत के इस रुख को मृतका के परिजनों के लिए एक बड़ी न्यायसंगत राहत के रूप में देखा जा रहा है।
8 जून 2020 की घटना और शुरुआती पुलिस कार्रवाई
यह पूरा मामला 8 जून 2020 का है, जब मुंबई के मालाड क्षेत्र में स्थित एक बहुमंजिला रिहायशी इमारत की 14वीं मंजिल से संदिग्ध परिस्थितियों में नीचे गिरने के कारण दिशा सालियान की असमय मृत्यु हो गई थी। घटना के तुरंत बाद स्थानीय पुलिस ने मामले में एक्सीडेंटल डेथ रिपोर्ट दर्ज कर शुरुआती छानबीन शुरू की थी। प्राथमिक जांच और पूछताछ के आधार पर पुलिस इस निष्कर्ष पर पहुंची थी कि यह एक खुदकुशी का मामला है और तदनुसार फाइल बंद करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई थी।
पिता की याचिका, नीलेश ओझा के तर्क और आदित्य ठाकरे पर आरोप
मृतका के पिता सतीश सालियान ने स्थानीय पुलिस की आत्महत्या वाली थ्योरी को पूरी तरह से खारिज करते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट में याचिका दायर की। उनके अधिवक्ता नीलेश ओझा ने पुलिसिया पड़ताल की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल उठाए और अदालत के सामने दलील रखी कि दिशा सालियान की मौत सामान्य दुर्घटना या आत्महत्या नहीं थी। याचिका में आरोप लगाया गया कि मृतका के साथ जघन्य अपराध अंजाम देने के बाद उसकी हत्या की गई थी। इसके साथ ही याचिकाकर्ता ने दावा किया कि जून 2020 में हुई इस घटना के बाद राजनीतिक प्रभाव का इस्तेमाल करके मामले को दबाने और साक्ष्यों को नष्ट करने की कोशिश की गई थी। पिता ने अपनी याचिका में शिवसेना नेता आदित्य ठाकरे के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग की थी और पूरे मामले को सीबीआई के सुपुर्द करने की अपील की थी।
न्यायिक राहत और पीड़ित परिवार के लिए आगे की राह
चार साल की लंबी कानूनी लड़ाई के बाद हाईकोर्ट के इस फैसले ने मामले में नए तथ्य सामने आने की उम्मीद जगाई है। केंद्रीय जांच ब्यूरो द्वारा दर्ज की जाने वाली एफआईआर के माध्यम से अब घटना से जुड़े सभी पहलुओं, प्रत्यक्षदर्शियों के बयानों और फॉरेंसिक साक्ष्यों का नए सिरे से विश्लेषण किया जाएगा। निष्पक्ष जांच का दायरा सुनिश्चित होने से मृतका के परिजनों को न्याय मिलने की संभावना सुदृढ़ हुई है।



















