भारतीय सिनेमा के इतिहास में कुछ ऐसे चेहरे दर्ज हैं जिनके बिना हिंदी फिल्मों की कहानियां अधूरी लगती हैं। अवतार किशन हंगल, जिन्हें पूरा देश ए.के. हंगल के नाम से जानता है, एक ऐसे ही बहुआयामी व्यक्तित्व थे। 52 वर्ष की परिपक्व उम्र में कैमरे के सामने कदम रखने वाले हंगल साहब ने करीब 200 से ज्यादा फिल्मों में अभिनय किया। हालांकि, बड़े पर्दे पर अपनी एक अलग पहचान बनाने से पहले उनका जीवन संघर्षों, देशप्रेम और सामाजिक सरोकारों से भरा रहा था। एक दर्जी और स्वतंत्रता सेनानी से लेकर भारतीय थियेटर के दिग्गज और दादाजी के किरदारों के रूप में स्थापित होने तक की उनकी यात्रा सिनेमा प्रेमियों के लिए प्रेरणादायी है।
शुरुआती जीवन, स्वतंत्रता संग्राम और मजदूर आंदोलन का दौर
ए.के. हंगल का जन्म 1 फरवरी 1914 को अविभाजित भारत के सियालकोट शहर में हुआ था, जो वर्तमान में पाकिस्तान का हिस्सा है। उनका बचपन और शुरुआती युवावस्था पेशावर में बीती। उनके पिता सरकारी सेवा में कार्यरत थे और चाहते थे कि उनका बेटा भी किसी सुरक्षित सरकारी नौकरी को अपना करियर बनाए। इसके बावजूद, हंगल साहब ने अपने पिता की सोच से अलग रास्ता चुनने का फैसला किया। वह कम उम्र में ही देश की आजादी के आंदोलनों की तरफ आकर्षित हो गए। साल 1929 से लेकर 1947 तक उन्होंने भारत के स्वतंत्रता संग्राम में बेहद सक्रिय भूमिका निभाई और इस दौरान उन्हें जेल भी जाना पड़ा।
सरकारी नौकरी की ओर जाने के बजाय उन्होंने पेशावर में दर्जी का काम सीखा और टेलर के तौर पर अपनी आजीविका चलाने लगे। हंगल साहब के लिए दर्जी का काम केवल आजीविका का माध्यम नहीं था। उन्होंने कपड़े सिलने के दौरान ही अपने साथी दर्जियों और मजदूरों के दर्द को गहराई से समझा। उन्होंने श्रमिकों के अधिकारों के लिए आवाज उठाई और मजदूरों को एकजुट कर उनके लिए ट्रेड यूनियन बनाने के प्रयासों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
रंगमंच से जुड़ाव, मुंबई आगमन और आईपीटीए की यात्रा
दर्जी की दुकान चलाने और राजनीतिक गतिविधियों में भाग लेने के दौरान ही उनका झुकाव अभिनय की दुनिया की तरफ हुआ। वर्ष 1936 में वह पेशावर के एक स्थानीय थियेटर समूह से जुड़े, जिसके बाद रंगमंच के प्रति उनका लगाव गहरा होता चला गया। आजादी और देश के विभाजन के बाद वह मुंबई आ गए और उन्होंने थियेटर को अपने जीवन का मुख्य आधार बना लिया। मुंबई में वह इंडियन पीपुल्स थिएटर एसोसिएशन यानी आईपीटीए के सक्रिय सदस्य बन गए।
आईपीटीए से जुड़ने के बाद उन्हें बलराज साहनी और कैफी आजमी जैसी महान शख्सियतों के साथ काम करने का अवसर मिला। हंगल साहब ने लगभग 15 वर्षों तक रंगमंच पर काम किया और अपने अभिनय कौशल को निधारा। थियेटर में लंबे अनुभव और कला की गहरी समझ हासिल करने के बाद ही उन्होंने रूपहले पर्दे की तरफ कदम बढ़ाया।
52 वर्ष की उम्र में सिनेमा पदार्पण और स्मरणीय भूमिकाएं
52 साल की आयु में जब आमतौर पर लोग अपने करियर के अंतिम पड़ाव के बारे में सोचते हैं, तब हंगल साहब ने हिंदी फिल्मों में अपना पदार्पण किया। उम्र के इस पड़ाव पर नई शुरुआत करना बेहद चुनौतीपूर्ण था, लेकिन उन्होंने अपनी अभिनय प्रतिभा के बल पर अपनी राह बनाई। वर्ष 1966 में बसु भट्टाचार्य द्वारा निर्देशित फिल्म 'तीसरी कसम' से उन्होंने सिनेमा की दुनिया में कदम रखा।
पहली फिल्म के बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा और लगातार एक से बढ़कर एक यादगार फिल्में दीं। उन्होंने 'गुड्डी', 'बावरची', 'अभिमान', 'नमक हराम', 'चुपके चुपके', 'आंधी', 'तपस्या', 'शौकीन', 'अवतार' और 'अर्जुन' जैसी कई प्रसिद्ध फिल्मों में अहम भूमिकाएं निभाईं। इसके अलावा, सुपरहिट फिल्म 'सत्यम शिवम सुंदरम' में उन्होंने अभिनेत्री जीनत अमान के चाचा का किरदार निभाकर दर्शकों की खूब सराहना बटोरी।
शोले का रहीम चाचा, लगान और करियर का विस्तार
वर्ष 1975 में प्रदर्शित हुई ब्लॉकबस्टर फिल्म 'शोले' ने ए.के. हंगल की पहचान को भारतीय सिनेमा के इतिहास में अजर-अमर कर दिया। इस फिल्म में उन्होंने रहीम चाचा का बेहद भावुक और यादगार किरदार निभाया था। फिल्म में उनका बोला गया संवाद "इतना सन्नाटा क्यों है भाई" हिंदी सिनेमा का सबसे प्रसिद्ध और अमर संवाद बन गया। अपने लंबे और समृद्ध करियर के दौरान उन्होंने 200 से अधिक फिल्मों में काम किया।
वर्ष 2001 में आई ऑस्कर नामांकित फिल्म 'लगान' में उनके द्वारा निभाया गया शंभू काका का किरदार भी दर्शकों के बीच अत्यधिक लोकप्रिय रहा। फिल्मों के साथ-साथ हंगल साहब ने छोटे पर्दे यानी टीवी धारावाहिकों में भी अपनी अदाकारी दिखाई। अपने जीवन के अंतिम दौर में उन्होंने मशहूर टीवी धारावाहिक 'मधुबाला-एक इश्क एक जुनून' में अभिनय कर दर्शकों का दिल जीता।
पद्म भूषण सम्मान, अंतिम समय और कालजयी विरासत
भारतीय कला और सिनेमा के क्षेत्र में दिए गए उनके अतुलनीय योगदान को सम्मानित करते हुए भारत सरकार ने वर्ष 2006 में उन्हें देश के तीसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म भूषण से अलंकृत किया। जीवन के अंतिम पड़ाव में वर्ष 2012 में उनकी तबीयत बिगड़ने लगी, जिसके बाद उन्हें इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती कराया गया। 26 अगस्त 2012 को मुंबई में 98 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया। यद्यपि ए.के. हंगल आज हमारे बीच मौजूद नहीं हैं, लेकिन उनकी फिल्में और उनके द्वारा जीवंत किए गए किरदार आज भी देशवासियों के दिलों में बसे हुए हैं।


















