काशी की अलसुबह का नजारा दुनिया के किसी भी दूसरे शहर से बिल्कुल जुदा होता है। एक तरफ मंदिरों में गूंजती घंटियां और गंगा घाटों पर सुबह की आरती की तैयारियां चल रही होती हैं, तो दूसरी तरफ तंग गलियों से बहती गर्म तेल में छनती कचौड़ियों की महक लोगों को अपनी ओर खींचने लगती है। बनारस में सुबह की शुरुआत सिर्फ दर्शन-पूजन से नहीं, बल्कि कुल्हड़ वाली गर्म चाय, खस्ता कचौड़ी और तीखी आलू की सब्जी के चटकारे के साथ होती है। काशी आने वाले पर्यटकों के लिए गंगा आरती देखने और बाबा विश्वनाथ के दर्शन करने जितना ही जरूरी बनारसी नाश्ते का स्वाद लेना भी माना जाता है।
खस्ता परत और मसालेदार पिट्ठी का खास कॉम्बिनेशन
बनारसी कचौड़ी की असली जान उसकी मसालेदार पिट्ठी में बसी होती है। इसे तैयार करने के लिए मुख्य रूप से उड़द की दाल या मूंग की दाल का इस्तेमाल किया जाता है। दाल को अच्छी तरह भिगोने के बाद दरदरा पीसा जाता है। इसके बाद इसमें हींग, जीरा, खड़ा धनिया और अन्य पारंपरिक मसाले मिलाए जाते हैं। इसमें हींग का इस्तेमाल बहुत ही खास होता है, जिसकी तेज और मनभावन खुशबू कचौड़ी को एक अनोखा जायका प्रदान करती है।
कचौड़ी का आटा गूंथते समय विशेष सावधानी बरती जाती है। आटा न तो बहुत अधिक सख्त होना चाहिए और न ही इतना ढीला कि तलते समय कचौड़ी अपना आकार खो दे। आटे की लोई में दाल की पिट्ठी भरकर उसे सावधानी से बेला जाता है। हलवाई इसे तलने के लिए जल्दबाजी नहीं करते। तेज आंच पर पकाने के बजाय कचौड़ियों को मध्यम या धीमी आंच पर धीरे-धीरे तला जाता है। धीमी आंच पर पकने के कारण कचौड़ी की बाहरी परत एकदम सुनहरी और खस्ता बनती है, जबकि अंदर भरी हुई दाल की पिट्ठी पूरी तरह से पक जाती है। गर्म कचौड़ी को तोड़ते ही उससे निकलने वाली मसालों की भाप और सुगंध किसी के भी मुंह में पानी ला देती है।
बिना प्याज-लहसुन के बनती है तीखी रसेदार आलू सब्जी
बनारस में कचौड़ी को कभी भी अकेला नहीं परोसा जाता। इसका असली स्वाद इसके साथ मिलने वाली तीखी और रसेदार आलू की सब्जी से पूरा होता है। इस सब्जी की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसे पूरी तरह से सात्विक अंदाज में यानी बिना प्याज और लहसुन के तैयार किया जाता है।
रसेदार आलू की सब्जी में उबले हुए आलू के साथ साबुत जीरा, धनिया पाउडर, लाल मिर्च और गरम मसालों का बेहतरीन संतुलन रखा जाता है। कई पुरानी दुकानों पर इस सब्जी का स्वाद और गाढ़ापन बढ़ाने के लिए इसमें उबले हुए चने भी मिलाए जाते हैं। प्याज और लहसुन के बिना बनी यह चटपटी सब्जी कचौड़ी के मसालेदार स्वाद के साथ एकदम सटीक तालमेल बिठाती है। खस्ता कचौड़ी का टुकड़ा तोड़कर उसे इस तीखी रसेदार सब्जी में डुबोकर खाना ही काशी का सबसे लोकप्रिय तरीका माना जाता है।
गरम कचौड़ी के साथ जलेबी और कुल्हड़ वाली चाय का मज़ा
बनारसी नाश्ते की परंपरा तब तक अधूरी मानी जाती है जब तक कि तीखे स्वाद के बाद कुछ मीठा न खाया जाए। कचौड़ी और आलू की सब्जी के बाद गरमागरम जलेबी खाने का रिवाज यहां सालों पुराना है। तीखी सब्जी और मसालेदार कचौड़ी के बाद करारी जलेबी का मीठा रस जुबान पर एक अद्भुत संतुलन बनाता है।
काशी की गलियों में सुबह-सुबह कचौड़ी की दुकानों पर लोगों का तांता लग जाता है। यहां दफ्तर जाने वाले लोग जहां जल्दी-जल्दी नाश्ते की प्लेट खत्म करते नजर आते हैं, वहीं दूर-दराज से आए पर्यटक और स्थानीय परिवार फुर्सत से बैठकर इस जायके का आनंद लेते हैं। बनारस में भोजन केवल भूख मिटाने का जरिया नहीं है, बल्कि यह आपस में मिलने-जुलने और शहर की जीवंत संस्कृति को महसूस करने का एक सशक्त माध्यम है। गंगा घाटों और प्राचीन मंदिरों की छांव में मिलने वाली यह साधारण सी नाश्ते की प्लेट बनारस की विश्व प्रसिद्ध पहचान बन चुकी है।
घर पर बनारसी अंदाज की कचौड़ी बनाते समय ध्यान रखने योग्य बातें
यदि आप अपने घर पर ही बनारस की गलियों जैसा स्वाद पाना चाहते हैं, तो कुछ महत्वपूर्ण बातों का ध्यान रखना बेहद जरूरी है। सबसे पहले दाल की पिट्ठी तैयार करते समय हींग और मसालों का संतुलन सही रखें ताकि कचौड़ी में पारंपरिक महक आए। आटा गूंथते समय पानी की मात्रा पर नियंत्रण रखें, आटा अधिक गीला नहीं होना चाहिए।
कचौड़ी को तलते समय आंच का खास ध्यान रखें। कचौड़ियों को कभी भी अत्यधिक तेज आंच पर न तलें। तेज आंच पर तलने से कचौड़ी की बाहरी परत बहुत जल्दी भूरी हो जाएगी, लेकिन अंदर की पिट्ठी कच्ची रह जाएगी और कचौड़ी खस्ता बनने के बजाय मुलायम पड़ जाएगी। कचौड़ी को हमेशा धीमी से मध्यम आंच पर ही तलें ताकि वह बाहर से एकदम कुरकुरी और अंदर से अच्छी तरह पकी हुई बने।



















