हिंदी सिनेमा के कैनवास पर अब भारतीय लोक आस्था के महापर्व छठ की छटा प्रमुखता से बिखरने लगी है. हाल ही में सिद्धार्थ मल्होत्रा और तमन्ना भाटिया की आने वाली फिल्म ‘द वन: फोर्स ऑफ फॉरेस्ट’ अपने छठ गीत को लेकर जबरदस्त चर्चा बटोर रही है. इस फिल्म में पारंपरिक पर्व को जिस भव्य और व्यापक अंदाज में पेश किया गया है, उसने इंटरनेट पर दर्शकों का ध्यान तेजी से खींचा है. इस गाने ने रिलीज होते ही डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर काफी धूम मचाई. सिद्धार्थ मल्होत्रा और तमन्ना भाटिया पर फिल्माए गए ‘छठी मैया’ गीत को यूट्यूब पर 46 मिलियन व्यूज मिल चुके हैं, और महज 10 दिन के भीतर इस ट्रैक ने यह शानदार आंकड़ा छू लिया है.
सूरज बड़जात्या की फिल्म में शरवरी वाघ और आयुष्मान खुराना
सिद्धार्थ मल्होत्रा और तमन्ना भाटिया के इस भक्ति गीत को मिल रहे अपार प्यार के बाद अब शरवरी वाघ भी आस्था के इसी रंग में रंगी दिखाई दी हैं. शरवरी वाघ आने वाले दिनों में आयुष्मान खुराना के साथ फिल्म ‘ये प्रेम मोल लिया’ में मुख्य भूमिका निभाती दिखाई देंगी. पारिवारिक फिल्मों के निर्माण के लिए पहचाने जाने वाले निर्देशक सूरज बड़जात्या इस फिल्म की कमान संभाल रहे हैं. इस परियोजना को लेकर दर्शकों के बीच पहले से ही काफी उत्सुकता देखने को मिल रही है.
पारंपरिक बिहारी अंदाज में दिखीं शरवरी वाघ
फिल्म ‘ये प्रेम मोल लिया’ का नया गाना रिलीज किया गया है, जिसमें कहानी के कुछ अहम और खूबसूरत पलों की झलक देखने को मिलती है. इस ट्रैक में आयुष्मान खुराना और शरवरी वाघ की ऑन-स्क्रीन केमिस्ट्री तो दर्शकों को पसंद आ ही रही है, साथ ही निर्देशक सूरज बड़जात्या ने भी अपनी कहानी में छठ के पावन प्रसंग को शामिल किया है. फिल्म के टाइटल ट्रैक में शरवरी वाघ पारंपरिक परिधान में, नाक पर लंबा नारंगी सिंदूर लगाए और हाथों में सूप थामे छठी मैया को अर्घ्य और नमन करती दिख रही हैं. उनके इस ठेठ बिहारी रूप ने इंटरनेट पर काफी प्रशंसा बटोरी है. तमन्ना भाटिया के ट्रैक को मिली बड़ी कामयाबी के बीच सूरज बड़जात्या का यह रचनात्मक फैसला फिल्म और संगीत दोनों के जुड़ाव को और मजबूत बना सकता है.
सिनेमाई कहानियों में बदलता सांस्कृतिक दायरा
इन दोनों आगामी फिल्मों के गानों से यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि मुख्यधारा का बॉलीवुड अब पारंपरिक क्षेत्रीय त्योहारों को बड़े पैमाने पर मंच दे रहा है. बीते दशकों में हिंदी फिल्मों में अधिकांशतः पंजाब या पश्चिमी और उत्तरी क्षेत्रों के सांस्कृतिक ताने-बाने को ही अधिक जगह मिलती रही थी. लेकिन अब रचनाकार विविधता को अपनाते हुए देश के दूसरे समृद्ध और गहरे सांस्कृतिक लोकाचार को भी पर्दे पर पूरी संजीदगी और आदर के साथ प्रमुखता दे रहे हैं.


















