बॉलीवुड में लंबे समय से यह धारणा बनी हुई थी कि किसी भी फिल्म की सफलता के लिए बड़े सुपरस्टार्स, महंगे सेट, भव्य लोकेशन और धमाकेदार गानों का होना बेहद जरूरी है। हालांकि, पिछले कुछ वर्षों के दौरान इस धारणा को उन फिल्मों ने पूरी तरह से बदल कर रख दिया है जिनका कुल खर्च किसी बड़े कलाकार की एक दिन की वैनिटी वैन या सुरक्षा पर होने वाले खर्च से भी काफी कम होता है। विवेक अग्निहोत्री की फिल्म ‘द कश्मीर फाइल्स’ (2022) और सुदीप्तो सेन की फिल्म ‘द केरल स्टोरी’ (2023) इस बदलाव के सबसे बड़े और सटीक उदाहरण माने जाते हैं।
रूढ़ियों को तोड़ती फिल्मों का दौर
इन फिल्मों ने यह स्पष्ट रूप से साबित कर दिया है कि भारतीय दर्शक केवल मनोरंजन के नाम पर परोसे जाने वाले सतही और ऊपरी कंटेंट से अब पूरी तरह ऊब चुके हैं। जब पर्दे पर कोई ऐसी सच्चाई या गंभीर सामाजिक मुद्दा दिखाया जाता है जो सीधे दर्शक के दिल को छू जाता है, तो बजट और मार्केटिंग के पारंपरिक नियम पूरी तरह से बेमानी हो जाते हैं। इन दोनों ही फिल्मों ने यह दिखा दिया कि सीमित संसाधनों में भी अगर मजबूत इरादे और दमदार स्क्रिप्ट के साथ काम किया जाए, तो बॉक्स ऑफिस के पुराने आंकड़े पीछे छूट जाते हैं।
‘द कश्मीर फाइल्स’ का ऐतिहासिक सफर
जब मार्च 2022 के महीने में ‘द कश्मीर फाइल्स’ सिनेमाघरों में रिलीज हुई थी, तब शुरुआत में इसे बहुत कम संख्या में शो और स्क्रीन्स मिले थे। लेकिन जैसा कि कहा जाता है कि एक सच्ची और अच्छी कहानी को ज्यादा समय तक रोका नहीं जा सकता, इस फिल्म ने ठीक वैसा ही करिश्मा कर दिखाया। इस फिल्म ने 1990 के दशक के दौरान कश्मीरी पंडितों पर हुए अमानवीय अत्याचारों, उनके दर्दनाक पलायन और संघर्ष के उस काले दौर को देश के सामने लाकर रखा, जिसे मुख्यधारा का सिनेमा दशकों से नजरअंदाज करता आ रहा था। फिल्म में अनुपम खेर, मिथुन चक्रवर्ती, पल्लवी जोशी और दर्शन कुमार की बेहतरीन और प्रभावशाली अदाकारी ने देखने वालों के रोंगटे खड़े कर दिए थे।
शानदार कमाई और सामाजिक असर
महज 15 से 20 करोड़ रुपये के छोटे से बजट में तैयार की गई इस फिल्म ने अकेले भारतीय बाजार में 250 करोड़ रुपये से अधिक का कारोबार किया और पूरी दुनिया में 340 करोड़ रुपये से ज्यादा की कमाई करते हुए सबको हैरान कर दिया। यह फिल्म केवल व्यावसायिक रूप से ही सुपरहिट नहीं रही, बल्कि समाज में एक बड़ी वैचारिक बातचीत का मुख्य केंद्र भी बन गई। इसके ठीक एक साल बाद, मई 2023 में आई ‘द केरल स्टोरी’ ने भी बॉक्स ऑफिस पर इसी सफलता को दोहराया और फिल्म इंडस्ट्री के बड़े दिग्गजों के लिए एक नया उदाहरण पेश किया। विपुल अमृतलाल शाह द्वारा निर्मित और सुदीप्तो सेन द्वारा निर्देशित इस फिल्म को अपनी रिलीज से पहले ही इसके संवेदनशील विषय के कारण कड़े विरोध और भारी बहसों का सामना करना पड़ा था।
सच्ची घटनाओं पर आधारित कथानक
यह फिल्म केरल की युवा लड़कियों का धर्म परिवर्तन कराने और फिर उन्हें कुख्यात आतंकवादी संगठन ISIS के खतरनाक जाल में धकेलने की वास्तविक घटनाओं पर आधारित थी। फिल्म में अदा शर्मा द्वारा निभाया गया शालिनी उन्नीकृष्णन का किरदार और पर्दे पर दिखाई गई डरावनी परिस्थितियों ने दर्शकों को अंदर तक झकझोर कर रख दिया। केवल 20 करोड़ रुपये के मामूली बजट में बनी इस फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर जबरदस्त धमाल मचाया। इसने भारत के भीतर 240 करोड़ रुपये से ज्यादा की कमाई दर्ज की और वैश्विक स्तर पर 300 करोड़ रुपये के आंकड़े को पार कर लिया, जिससे यह साल 2023 की सबसे अधिक कमाई करने वाली फिल्मों में शामिल हो गई।
वर्ड ऑफ माउथ की ताकत
इन दोनों फिल्मों की अपार सफलता के पीछे सबसे बड़ा कारण ‘वर्ड ऑफ माउथ’ यानी लोगों की आपस में हुई बातचीत साबित हुई। दोनों ही फिल्मों के पास करोड़ों डॉलर का भारी-भरकम प्रचार बजट या बड़े पैमाने पर टेलीविजन विज्ञापन उपलब्ध नहीं थे। इसके बावजूद, दर्शक जब सिनेमाघरों से बाहर निकलते थे, तो उनकी आंखों में आंसू होते थे और वे यही कहते नजर आते थे कि हर भारतीय को यह फिल्म देखनी चाहिए। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स, युवाओं द्वारा दिए गए पॉजिटिव रिव्यू और परिवार के बुजुर्गों की सलाह ने इन फिल्मों को लगातार आगे बढ़ाने का काम किया। नतीजा यह हुआ कि जिन फिल्मों के शो पहले दिन खाली पड़े थे, उनके लिए दूसरे और तीसरे दिन सिनेमाघरों के बाहर ‘हाउसफुल’ के बोर्ड टंग गए।
सिनेमाघरों में उमड़ी भारी भीड़
टिकट खिड़की पर दर्शकों की भारी भीड़ को देखते हुए थियेटर मालिकों को रात के साथ-साथ आधी रात के विशेष शो भी शुरू करने पड़े क्योंकि टिकट काउंटर पर कम होने का नाम ही नहीं ले रही थी। जब हम ‘हनुमान अंश’ (जिसने हाल ही में अपने नौवें हफ्ते में भी बॉक्स ऑफिस पर 10 करोड़ रुपये से अधिक की कमाई कर एक नया इतिहास रचा है) की तुलना इन दोनों फिल्मों यानी ‘द कश्मीर फाइल्स’ और ‘द केरल स्टोरी’ से करते हैं, तो एक बिल्कुल स्पष्ट और समान पैटर्न उभरकर सामने आता है।
आज का भारतीय दर्शक मजबूत और दमदार कंटेंट को ही अपना असली भगवान मानता है। जब फिल्में अपनी संस्कृति, अपनी मिट्टी, इतिहास के अनछुए पहलुओं या समाज की सच्ची कहानियों के साथ गहराई से जुड़ती हैं, तो वे केवल वीकेंड का मनोरंजन बनकर नहीं रह जातीं, बल्कि पूरे देश में एक बड़े सामाजिक आंदोलन का रूप ले लेती हैं। फिल्म निर्माताओं के लिए यह एक बहुत बड़ा और स्पष्ट सबक है कि उन्हें स्टारडम के पीछे अंधी दौड़ लगाने के बजाय बेहतरीन कहानियों और ईमानदार लेखन पर अपना पैसा और समय निवेश करना चाहिए।



















