भारतीय सिनेमा के इतिहास में कमाल अमरोही की 'पाकीजा' एक ऐसी शाहकार फिल्म है जिसकी चमक 54 सालों के बाद भी धुंधली नहीं पड़ी है। जब यह फिल्म पहली बार मुंबई के मराठा मंदिर सिनेमाघर में रिलीज हुई थी, तो इसकी रीलें एक शाही पालकी में रखकर थिएटर तक लाई गई थीं। उस ऐतिहासिक प्रीमियर पर खुद निर्देशक कमाल अमरोही, मुख्य अभिनेत्री मीना कुमारी और हिंदी फिल्म उद्योग की तमाम मशहूर हस्तियां मौजूद थीं। पर्दे पर एक नफासत भरी जादुई दुनिया रचने वाली इस क्लासिक फिल्म को दर्शकों तक पहुंचने में करीब 15 साल का लंबा वक्त लगा था। अब पांच दशकों से भी अधिक समय बीत जाने के बाद इस अमर कलाकृति को एक बार फिर नया जीवन मिलने जा रहा है।
ल्यूमियर फेस्टिवल में वर्ल्ड प्रीमियर और भव्य प्रदर्शन
फिल्म हेरिटेज फाउंडेशन (FHF) ने करीब दो वर्षों की अथक मेहनत और बारीक तकनीकों की मदद से 'पाकीजा' का 4K रेस्टोरेशन सफलतापूर्वक पूरा कर लिया है। समय की मार और देखभाल के अभाव में खराब हो चुके ओरिजिनल कैमरा नेगेटिव्स और पुराने प्रिंट्स से फिल्म के दृश्यों, रोशनी और रंगों को दोबारा सहेजा गया है। इस भव्य 4K रेस्टोरेशन का वर्ल्ड प्रीमियर आगामी अक्टूबर महीने में फ्रांस के बेहद प्रतिष्ठित 'ल्यूमियर फेस्टिवल' में किया जाएगा। इसके बाद ब्रिटेन की राजधानी लंदन में भी इस क्लासिक फिल्म की एक विशेष अंतरराष्ट्रीय स्क्रीनिंग रखी जाएगी, ताकि वैश्विक स्तर पर सिनेमा प्रेमी इसे इसके मूल रूप में देख सकें।
15 साल का लंबा सफर, रिश्ते में दरार और बनने की कहानी
'पाकीजा' का परदे पर आना जितना खूबसूरत अनुभव था, इसे बनाने की कहानी उतनी ही मुश्किलों और चुनौतियों से भरी रही। इस फिल्म की पहली कल्पना 1950 के दशक के मध्य में की गई थी। कमाल अमरोही ने इसे अपनी पत्नी और अपनी मुख्य अदाकारा मीना कुमारी की बेमिसाल खूबसूरती को समर्पित एक श्रद्धांजलि के रूप में गढ़ना शुरू किया था। लखनऊ की नवाबी संस्कृति और तहजीब की पृष्ठभूमि पर आधारित इस म्यूजिकल रोमांटिक ड्रामा में मीना कुमारी ने तवायफ साहिबजान का कालजयी किरदार निभाया था, जबकि अभिनेता राज कुमार उनके साथ मुख्य भूमिका में नजर आए थे।
फिल्म का निर्माण कार्य 1956 में ब्लैक एंड व्हाइट प्रारूप में शुरू किया गया था, लेकिन तकनीकों के बदलने पर 1958 में इसे ईस्टमैनकलर में शूट करने का फैसला लिया गया। कास्टिंग में लगातार बदलावों, पटकथा में संशोधनों, बजट के भारी संकट और कमाल अमरोही के काम करने के बेहद बारीक व सख्त अंदाज की वजह से फिल्म की गति धीमी होती गई। साल 1964 में कमाल अमरोही और मीना कुमारी के निजी रिश्तों में आए तनाव और दूरी के कारण फिल्म की शूटिंग पूरी तरह ठप हो गई। इसके बाद 1968 में मीना कुमारी को लिवर सिरोसिस जैसी गंभीर बीमारी का पता चला। जब प्रोजेक्ट पूरी तरह अधर में लटका हुआ था, तब सुनील दत्त और नरगिस ने फिल्म का पुराना शूट किया हुआ फुटेज देखा। उस फुटेज की खूबसूरती से प्रभावित होकर उन दोनों ने मीना कुमारी को फिल्म पूरी करने के लिए प्रेरित किया, जिसके बाद ठप पड़ा काम दोबारा शुरू हो सका।
परदे के पीछे के दिग्गजों को खोने का दर्द
'पाकीजा' के बनने के दौरान केवल मीना कुमारी की सेहत ही नहीं बिगड़ी, बल्कि कैमरे के पीछे काम करने वाले कई बड़े दिग्गजों का भी साथ छूट गया। साल 1967 में फिल्म के मुख्य और प्रख्यात सिनेमैटोग्राफर जोसेफ विर्सिंग का निधन हो गया। उनके अचानक चले जाने के बाद भारत के कई शीर्ष सिनेमैटोग्राफर्स ने बारी-बारी से कमान संभाली और यह सुनिश्चित किया कि फिल्म का विजुअल मिजाज और फ्रेमिंग हर दृश्य में एक समान बनी रहे।
ठीक इसी तरह, फिल्म के अमर और सदाबहार गीतों की धुन तैयार करने वाले मशहूर संगीतकार गुलाम मोहम्मद का 1968 में देहांत हो गया। उन्होंने फिल्म के सभी गानों को तो तैयार कर दिया था, लेकिन उनके जाने के बाद फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर अधूरा रह गया था। इस चुनौती से निपटने के लिए दिग्गज संगीतकार नौशाद ने बैकग्राउंड स्कोर का जिम्मा अपने हाथों में लिया और फिल्म को संगीत के स्तर पर पूर्णता प्रदान की।
पिघले हुए नेगेटिव से 4K रेस्टोरेशन तक की चुनौतियां
फिल्म हेरिटेज फाउंडेशन के अनुसार, 'पाकीजा' 4 फरवरी 1972 को सिनेमाघरों में प्रदर्शित हुई थी। यह वह दौर था जब भारतीय सिनेमा उर्दू मेलोड्रामा वाले दौर से निकलकर तेज रफ्तार एक्शन ब्लॉकबस्टर फिल्मों की ओर रुख कर रहा था। फिल्म रिलीज के कुछ ही हफ्तों बाद 31 मार्च 1972 को मीना कुमारी का दुखद निधन हो गया। उनकी विदाई के बाद दर्शकों ने इस फिल्म को हाथों-हाथ लिया और यह बॉक्स ऑफिस पर ऑल-टाइम ब्लॉकबस्टर साबित हुई।
इस ऐतिहासिक फिल्म को डिजिटाइज करने की प्रक्रिया आसान नहीं थी। एफएचएफ के निदेशक शिवेंद्र सिंह डूंगरपुर ने बताया कि जब उन्होंने पहली बार ओरिजिनल कैमरा नेगेटिव का निरीक्षण किया, तो वह लगभग पिघल चुका था। इसके अलावा जो अन्य रीलें उपलब्ध थीं, उन पर गहरे खरोंच, फफूंद और रंगों का धुंधलापन था। गहन शोध के दौरान टीम को मूल शूटिंग के दौरान खींची गई तस्वीरें मिलीं, जिससे सही रंगों को पहचानने में मदद मिली। टीम ने रामनॉर्ड लैब से मिले इंटरपॉजिटिव (IP) और सिनेमास्कोप प्रिंट्स के साथ-साथ एनएफडीसी-एनएफएआई (NFDC-NFAI) द्वारा सहेजे गए कलर रिवर्सल इंटरनेगेटिव का इस्तेमाल करके आखिरकार इस सिनेमाई धरोहर को उसका खोया हुआ वैभव वापस लौटाया है।



















