गोविंद नामदेव की गिनती भारतीय सिनेमा के उन अभिनेताओं में होती है जिन्होंने अपनी आंखों और आवाज के बल पर पर्दे पर खलनायकी को एक नई परिभाषा दी। मध्य प्रदेश के सागर जिले के एक छोटे से कस्बे से निकलकर मुंबई के फिल्म उद्योग तक का उनका यह सफर किसी भी नए कलाकार के लिए प्रेरणादायक है। साधारण पृष्ठभूमि से आने के बावजूद उन्होंने रंगमंच से शुरुआत की और सिनेमा जगत में खलनायक के रूप में अपनी अलग पहचान बनाई।
रंगमंच से सिनेमा तक का सफर
गोविंद नामदेव के पिता चाहते थे कि उनका बेटा पढ़ाई पूरी करके कोई सरकारी या निजी नौकरी कर ले। हालांकि उनका मन अभिनय की दुनिया में लगता था। अपने इसी जुनून को पूरा करने के लिए उन्होंने राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) में प्रवेश लिया और वर्ष 1977 में वहां से स्नातक की डिग्री हासिल की। पढ़ाई पूरी होने के बाद भी उन्हें फिल्मों में काम पाने के लिए लंबा इंतजार करना पड़ा। उन्होंने दिल्ली के रंगमंच पर लगातार 12 से 15 वर्षों तक विभिन्न नाटकों में अभिनय किया। इसी दौरान उनकी मुलाकात केतन मेहता और डेविड धवन जैसे नामचीन निर्देशकों से हुई, लेकिन फिल्मों का ब्रेक आसानी से नहीं मिला।
42 वर्ष की उम्र में मिला पहला बड़ा ब्रेक
लगभग 40 वर्ष की आयु तक गोविंद नामदेव ने फिल्मों में जाने का विचार नहीं किया था क्योंकि वे थिएटर की दुनिया में ही संतुष्ट थे। आखिरकार वर्ष 1992 में 42 वर्ष की आयु में निर्देशक डेविड धवन ने उन्हें फिल्म 'शोला और शबनम' के जरिए पहला मुख्य अवसर दिया। इस फिल्म में उनके काम पर लोगों का ध्यान गया। इसके बाद वर्ष 1994 में आई शेखर कपूर की चर्चित फिल्म 'बैंडिट क्वीन' ने उनके करियर को बड़ा मोड़ दिया। फिल्म में ठाकुर के क्रूर किरदार को उन्होंने जिस शिद्वत से निभाया, उससे दर्शकों के बीच उनकी मजबूत पहचान बन गई।
बॉलीवुड में खौफनाक किरदार और सफलता
'बैंडिट क्वीन' की सफलता के बाद गोविंद नामदेव के पास नकारात्मक भूमिकाओं की पेशकश बढ़ने लगी। वर्ष 1997 में रिलीज हुई 'विरासत', 1998 की फिल्म 'सत्या', 'सरफरोश', 'पुकार', 'लज्जा' और 'कसम' जैसी फिल्मों में उन्होंने अपनी अभिनय क्षमता का परिचय दिया। फिल्म 'सरफरोश' में आमिर खान के सामने सुल्तान की भूमिका में उनकी आंखों का डर आज भी दर्शकों को याद है। एक बातचीत के दौरान उन्होंने स्पष्ट किया था कि वे कभी हीरो बनने का सपना लेकर नहीं आए थे, बल्कि वे एक सशक्त अभिनेता बनना चाहते थे। उनका मानना रहा है कि कोई भी भूमिका छोटी या बड़ी नहीं होती, बल्कि किरदार का प्रभाव मायने रखता है।
पुरस्कार और ओटीटी पर नया अध्याय
फिल्म 'सत्या' में भाऊ के किरदार और 'विरासत' में उनके काम के लिए उन्हें कई पुरस्कारों और नामांकन से सम्मानित किया गया। वर्ष 1999 में रिलीज हुई फिल्म 'समर' में उनकी शानदार भूमिका के लिए उन्हें बेस्ट विलेन का स्क्रीन अवॉर्ड भी प्राप्त हुआ। 70 वर्ष की आयु पार करने के बावजूद गोविंद नामदेव अभिनय क्षेत्र में पूरी तरह सक्रिय हैं। बड़े पर्दे के साथ-साथ उन्होंने डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भी काम किया है। 'अभय' और 'द कश्मीर फाइल्स' जैसी परियोजनाओं में उनके अभिनय की सराहना हुई है। सागर से शुरू होकर एनएसडी और फिर बॉलीवुड तक का उनका यह सफर इस बात का सबूत है कि लगन हो तो उम्र कोई बाधा नहीं बनती।


















