सिनेमा प्रेमियों के लिए फिल्म न्यूटन रिव्यू (2017) इस बात की मिसाल है कि बिना किसी भारी भरकम स्टारडम या नाच-गाने के भी एक शानदार कहानी दर्शकों को किस कदर बांध सकती है। बड़े पर्दे पर 22 सितंबर 2017 को दस्तक देने वाली यह फिल्म लोकतंत्र, चुनावी तंत्र और अपने कर्तव्य के प्रति एक आम इंसान के समर्पण की सच्ची पड़ताल करती है। नक्सल प्रभावित इलाके के जंगलों में चुनाव कराने निकले एक मामूली सरकारी कर्मचारी के जरिए यह कहानी हमारे प्रशासनिक तंत्र और लोकतांत्रिक मूल्यों के बीच के अंतर को बहुत बेबाकी से उजागर करती है।
चुस्त पटकथा और बांधकर रखने वाला रोमांच
इस फिल्म की सबसे बड़ी खूबी इसका बेहद सधा हुआ स्क्रीनप्ले है, जो दर्शक को एक पल के लिए भी भटकने का मौका नहीं देता। बिना किसी गैर-जरूरी मेलोड्रामा या व्यावसायिक ड्रामे के, यह फिल्म सीधे अपनी मुख्य बात पर आती है। पूरी कहानी केवल 106 मिनट की अवधि में सिमटी हुई है। छत्तीसगढ़ के बीहड़ जंगलों में जाकर एक अस्थाई मतदान केंद्र स्थापित करने से लेकर वोटिंग की जटिल प्रक्रिया संपन्न कराने तक, हर दृश्य एक स्वाभाविक सस्पेंस और जिज्ञासा पैदा करता है। दर्शक लगातार यह जानने के लिए उत्सुक रहता है कि गोलियों और बारूद के साए में क्या लोकतंत्र का यह पहिया सच में घूम पाएगा।
सीमित लागत और बॉक्स ऑफिस पर बड़ी सफलता
सिनेमा जगत में इस बात की अक्सर चर्चा होती है कि दमदार विषयवस्तु बड़ी से बड़ी बजट वाली फिल्मों पर भारी पड़ सकती है। इस प्रोजेक्ट का कुल प्रोडक्शन बजट लगभग 9 करोड़ रुपये था। सीमित संसाधनों में तैयार होने के बावजूद, दर्शकों की सकारात्मक प्रतिक्रिया और मजबूत माउथ पब्लिसिटी के दम पर इसने घरेलू बॉक्स ऑफिस पर 22.80 करोड़ रुपये का नेट कलेक्शन किया। वहीं दुनियाभर के सिनेमाघरों में इसका कुल कारोबार 29 करोड़ रुपये से अधिक रहा। अपने निर्माण बजट से तीन गुना कमाई दर्ज करते हुए यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर सेमी-हिट साबित हुई।
राजकुमार राव और पंकज त्रिपाठी का शानदार अभिनय टकराव
कहानी के केंद्र में राजकुमार राव द्वारा निभाया गया न्यूटन कुमार का किरदार है, जो अपने उसूलों पर चलने वाला एक बेहद जिद्दी, नियमनिष्ठ और ईमानदार सरकारी क्लर्क है। वहीं दूसरी तरफ पंकज त्रिपाठी ने आत्मा सिंह नाम के एक सीआरपीएफ कमांडेंट की भूमिका निभाई है, जो बेहद व्यावहारिक, दुनियादार और कठोर वास्तविकताओं से अच्छी तरह वाकिफ है। एक तरफ संविधान के नियमों को अक्षरशः लागू करने की जिद है, तो दूसरी तरफ जंगल के जमीनी खतरों से जूझता एक थका हुआ सुरक्षाकर्मी। इन दोनों अलग-अलग सोच और मिजाज वाले इंसानों के बीच की नोकझोंक इस फिल्म की असली जान है, जिसमें संजीदगी और व्यंग्य का बेहतरीन संतुलन देखने को मिलता है।
जमीनी हकीकत, प्रशासनिक लाचारी और कागजी लोकतंत्र
यह केवल एक मतदान अधिकारी के एक दिन की दास्तान नहीं है, बल्कि हमारे देश की प्रशासनिक विवशता और व्यवस्था की खामियों पर किया गया एक गहरा कटाक्ष है। कहानी आदिवासियों की चुनावी प्रक्रिया से अनभिज्ञता, उनकी उपेक्षा और सिर्फ कागजों पर चलने वाले लोकतांत्रिक दिखावे की कड़वी सच्चाई को बहुत संवेदनशीलता के साथ पेश करती है। यह दिखाती है कि कैसे फाइलों और आंकड़ों में चुनाव सफल घोषित कर दिए जाते हैं, जबकि उन मतों के असली मायने उन लोगों के लिए शून्य रहते हैं जो सदियों से उपेक्षित हैं।
ऑस्कर एंट्री से लेकर राष्ट्रीय पुरस्कारों तक सम्मान
फिल्म की गुणवत्ता को वैश्विक स्तर पर भी खूब सराहा गया। अपनी रिलीज के दिन ही इसे 90वें एकेडमी अवॉर्ड्स यानी ऑस्कर 2018 में बेस्ट फॉरेन लैंग्वेज फिल्म वर्ग के लिए भारत की आधिकारिक प्रविष्टि के रूप में चुना गया था। यद्यपि यह अंतिम नामांकन सूची में स्थान नहीं बना पाई, लेकिन इस अंतरराष्ट्रीय चर्चा ने घरेलू स्तर पर इसके प्रभाव और टिकट खिड़की के संग्रह को काफी रफ्तार दी। बाद में 65वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में इसे बेस्ट हिंदी फिल्म के खिताब से नवाजा गया। इसके साथ ही पंकज त्रिपाठी को उनके संतुलित और प्रभावशाली अभिनय के लिए विशेष उल्लेख पुरस्कार प्रदान किया गया। फिल्म ने बर्लिन इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल समेत कई अन्य अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी पुरस्कार अपनी झोली में डाले। बिना किसी तड़क-भड़क के शानदार क्लाइमैक्स और सधे हुए अभिनय के कारण यह फिल्म एक कल्ट क्लासिक के रूप में याद की जाती है।


















