मेवाड़ की ऐतिहासिक नगरी उदयपुर अपनी झीलों और भव्य महलों के अलावा समृद्ध हस्तकला के लिए भी मशहूर है। इसी परंपरा को आधुनिक दौर की पसंद से जोड़ते हुए शहर की एक मां और बेटी ने ऐसा मुकाम हासिल किया है, जिसकी गूंज अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुनाई दे रही है। गौरी पालीवाल ने अपनी माता वंदना पालीवाल के साथ मिलकर 'रंगौरी' नाम से एक शिल्प पहल की नींव रखी थी। हाल ही में नई दिल्ली स्थित नेशनल क्राफ्ट्स म्यूजियम एवं हस्तकला अकादमी में सजे एक बड़े अंतरराष्ट्रीय मंच पर इस स्थानीय उद्यम ने अपनी खास छाप छोड़ी, जहां दुनिया भर के 18 मुल्कों के दस्तकार अपनी कला का प्रदर्शन कर रहे थे।
ऑनलाइन कोचिंग से उद्यम तक का सफर
इस रचनात्मक पहल की शुरुआत लगभग डेढ़ वर्ष पूर्व हुई थी। उस दौरान गौरी ने अपनी मां वंदना के मार्गदर्शन और सहयोग से ऑनलाइन कोचिंग देने के साथ-साथ हाथों से तरह-तरह की वस्तुएं तैयार करना आरंभ किया था। धीरे-धीरे यह घरेलू प्रयास एक सुव्यवस्थित स्टार्टअप के रूप में विकसित हो गया। दोनों का मूल उद्देश्य सदियों पुरानी भारतीय दस्तकारी की विरासत को सुरक्षित रखते हुए उसे ऐसे समकालीन कलेवर में ढालना था, जो नई पीढ़ी के युवाओं को भी अपनी ओर आकर्षित कर सके। इसी दृष्टिकोण को आधार बनाकर रंगौरी के तहत पारंपरिक कारीगरी और आधुनिक डिजाइनों का अनूठा मेल तैयार किया गया।
क्रोशिया खिलौनों से लेकर कुंदन आभूषणों की चमक
राजधानी दिल्ली में आयोजित इस शिल्प समागम में रंगौरी की स्टॉल पर प्रदर्शित कई उत्पाद आगंतुकों के मुख्य आकर्षण बने रहे। इनमें सूती धागों से बुने क्रोशिया के प्यारे खिलौने, सजावटी फूल, बालों के खूबसूरत सामान और घर की सजावट की वस्तुएं प्रमुख रहीं। इसके अलावा पारंपरिक बंदनवार, दीवारों पर सजाए जाने वाले वॉल हैंगिंग, आसानी से बिछाई जाने वाली रेडीमेड रंगोलियां और मोतियों व कुंदन के बारीक काम से बने आभूषणों ने भी लोगों का ध्यान खींचा। इन कलाकृतियों में पारंपरिक जरी, बारीक कढ़ाई, मोती और कुंदन को वर्तमान दौर के फैशनेबल पैटर्न के साथ ढाला गया है।
रचनात्मक प्रक्रिया और गुणवत्ता पर जोर
अपनी कार्यप्रणाली के विषय में गौरी का कहना है कि किसी भी नए उत्पाद को आकार देने से पहले उसके मुख्य विचार, रंगों के संयोजन और डिजाइन पैटर्न पर बहुत बारीकी से योजना बनाई जाती है। डिजाइन तय होने के पश्चात उत्पाद की मजबूती, टिकाऊपन और अंतिम फिनिशिंग पर पूरा ध्यान केंद्रित किया जाता है। यही सावधानी उनके हाथों से बनी कलाकृतियों को पारंपरिक गरिमा के साथ-साथ एक प्रीमियम और आधुनिक स्वरूप प्रदान करती है, जिससे वे बाजार में बिल्कुल अलग नजर आती हैं।
अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनी में मेवाड़ की कला का परचम
नेशनल क्राफ्ट्स म्यूजियम एवं हस्तकला अकादमी के इस मेले में देश-विदेश के कई विशिष्ट उत्पाद एक छत के नीचे देखने को मिले। प्रदर्शनी में बिहार के सत्तू और मखाना, ओडिशा की कोरापुट कॉफी, राजस्थान की लाख की चूड़ियां व टेराकोटा कला के साथ कश्मीर की प्रसिद्ध पेपर-माशे कला शामिल थी। साथ ही बेलारूस, ईरान, रूस और दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों के शिल्पियों ने भी अपनी स्थानीय सांस्कृतिक कलाओं को पेश किया। इतने बड़े वैश्विक जमावड़े के बीच उदयपुर की इस मां-बेटी की जोड़ी ने मेवाड़ की समृद्ध विरासत को नए जमाने के अंदाज में पेश कर खूब सराहना अर्जित की। बेहद छोटे स्तर से शुरू हुआ यह सफर अब राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पहचान कायम कर चुका है।




















