हरियाणा के फरीदाबाद जिले में स्थित कोट गांव की अरावली पहाड़ियों में प्रागैतिहासिक काल से जुड़ी कई महत्वपूर्ण पुरातात्विक संरचनाएं और निशान सामने आए हैं। इस पहाड़ी क्षेत्र में आदिमानव कालीन गतिविधियों से जुड़े हाथ और पैरों के निशान मिले हैं, जो प्राचीन समय में यहां रहने वाले इंसानों के दैनिक जीवन और उनके परिवेश पर रोशनी डालते हैं। पत्थरों और चट्टानों पर उकेरी गई विभिन्न आकृतियां इस भूभाग के हजारों साल पुराने इतिहास को दर्शाती हैं, जिसके चलते इस क्षेत्र को पुरातत्व और इतिहास के शोधकर्ताओं द्वारा बेहद अहम माना जा रहा है।
पाषाण युगीन जीवनशैली और प्राकृतिक आश्रय
पुरातत्व विभाग से जुड़े शोधकर्ता तेजवीर मावी के अनुसार, पाषाण काल के दौरान मानव जीवन पूरी तरह से प्राकृतिक पत्थरों और चट्टानों पर आश्रित था। उस समय जंगली जानवरों के शिकार और भोजन जुटाने के लिए पत्थरों को तराशकर विभिन्न प्रकार के नुकीले औजार तैयार किए जाते थे। प्राकृतिक गुफाएं और विशाल चट्टानी संरचनाएं आदिमानवों के लिए प्राकृतिक आश्रय स्थल के रूप में काम करती थीं। अरावली क्षेत्र में मिले साक्ष्यों से यह स्पष्ट होता है कि यहां आदिमानवों की मौजूदगी लंबे समय तक रही थी। पत्थरों पर की गई नक्काशी और मानव निर्मित कलाकृतियां उस दौर की सामाजिक और रचनात्मक गतिविधियों को उजागर करती हैं।
जमीन में दबे पत्थर और पशु-पक्षियों की नक्काशी
कोट गांव की पहाड़ियों में कई ऐसे भारी-भरकम पत्थर पाए गए हैं, जो लगभग 4 से 5 फीट तक जमीन के भीतर दबे हुए हैं। राजस्थान के इलाकों में 15 फीट तक ऊंचे मेनहिर भी पाए गए हैं। कोट गांव के इन विशाल पत्थरों पर विभिन्न प्रकार के जीव-जंतुओं की नक्काशी की गई है। इनमें पक्षियों, जंगली जानवरों और कुत्तों की स्पष्ट आकृतियां शामिल हैं। इन आकृतियों की मौजूदगी से संकेत मिलता है कि उस काल में मानव समुदाय यहां स्थायी अथवा लंबे समय तक निवास करता था और अपने आस-पास के वन्यजीवों को कला के माध्यम से अभिव्यक्त करता था।
मेगालिथिक घेरे और पदचिह्नों की बनावट
इस पहाड़ी क्षेत्र में कुछ मेगालिथिक संरचनाएं गोलाकार घेरे के रूप में व्यवस्थित दिखाई देती हैं। इन गोलाकार घेरों के केंद्र में रखी गई भारी चट्टानों पर कई तरह के पदचिह्न उकेरे गए हैं। इन पदचिह्नों में वयस्क पुरुषों, महिलाओं, बच्चों के साथ-साथ विभिन्न जानवरों के पैरों के निशान शामिल हैं। चट्टानों पर सुरक्षित ये पदचिह्न उस प्राचीन समुदाय की बसावट और गतिविधियों के तौर-तरीकों को समझने में मदद करते हैं, जिससे यह इलाका एक साधारण पहाड़ी से अलग एक समृद्ध ऐतिहासिक स्थल के रूप में उभरता है।
हाथों के निशानों के आकार में बड़ा अंतर
पत्थरों पर मिले हाथों के निशानों के अध्ययन से दिलचस्प तथ्य सामने आ रहे हैं। शोधकर्ता तेजवीर मावी ने बताया कि शुरुआत में इस क्षेत्र से लगभग 23 सेंटीमीटर आकार के हाथ के निशान मिले थे, जबकि अधिकांश निशान 19 से 22 सेंटीमीटर के बीच दर्ज किए गए थे। हाल ही में 27 सेंटीमीटर आकार का एक अपेक्षाकृत बड़ा हाथ का निशान भी सामने आया है। हाथों के निशानों के आकार में दिखने वाला यह अंतर यह संभावना पैदा करता है कि विभिन्न कालखंडों में इन निशानों को उकेरने या बनाने की पद्धतियों और तकनीक में बदलाव आया होगा, जिस पर आगे विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन की आवश्यकता है।
औजारों की खोज और शोधार्थियों के लिए शैक्षणिक केंद्र
कोट गांव की पहाड़ियों में पदचिह्नों के अतिरिक्त पाषाण काल के प्राचीन औजार और अन्य पुरावशेष भी प्रकाश में आए हैं। ये उपकरण यह समझने में सहायक सिद्ध हो रहे हैं कि उस समय लोग शिकार कैसे करते थे और किन प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करते थे। वर्तमान में यह स्थल इतिहास और पुरातत्व का अध्ययन करने वाले विद्यार्थियों के लिए एक व्यावहारिक अध्ययन केंद्र बन गया है। किताबों में पढ़ाए जाने वाले पाषाण काल के विषयों को छात्र यहां आकर प्रत्यक्ष रूप से देख रहे हैं।
संरक्षण और पुरातात्विक अध्ययन की जरूरत
अरावली पर्वतमाला में मौजूद ये प्राचीन शिलाएं, नक्काशी, पदचिह्न और औजार मानव विकास की ऐतिहासिक कड़ी को समझने के लिए अमूल्य धरोहर हैं। तेजवीर मावी का मानना है कि पुरातत्व विभाग और सरकार को इस क्षेत्र के ऐतिहासिक महत्व को पहचानते हुए इसके संरक्षण के लिए ठोस उपाय करने चाहिए। यदि इन प्राचीन धरोहरों को सुरक्षित रखा जाता है, तो भविष्य में होने वाले वैज्ञानिक अध्ययनों के माध्यम से अरावली की प्राचीन मानव सभ्यता के कई अनसुलझे रहस्य सामने आ सकेंगे।



















