हिंदी सिनेमा के सबसे प्रतिष्ठित और पसंदीदा गीतकारों में गिने जाने वाले शैलेंद्र का जीवन संघर्षों और नए अवसरों से भरा रहा। उनका जन्म 30 अगस्त 1923 को रावलपिंडी में हुआ था, जो अब पाकिस्तान का हिस्सा है। शैलेंद्र का मूल परिवार बिहार के आरा जिले से ताल्लुक रखता था। हालांकि, घर के बिगड़े आर्थिक हालात की वजह से उनके परिवार को रावलपिंडी छोड़ मथुरा आना पड़ा, जहां शैलेंद्र ने अपनी शुरुआती पढ़ाई पूरी की।
रावलपिंडी से बंबई तक का शुरुआती जीवन और कठिन संघर्ष
बचपन के दिनों में ही शैलेंद्र पर दुखों का भारी पहाड़ टूट पड़ा था, जब उन्होंने बहुत कम उम्र में अपनी मां और बहन को खो दिया। इन मुश्किलों के बीच भी उनका झुकाव कविता की दुनिया की ओर हमेशा बना रहा। वह घंटों अकेले बैठकर कविताएं लिखा करते थे। पढ़ाई पूरी करने के बाद, साल 1947 में वह बंबई चले आए। बंबई आने पर उन्होंने भारतीय रेलवे के माटुंगा वर्कशॉप में एक प्रशिक्षु यानी अप्रेंटिस के रूप में काम करना शुरू किया। रेलवे की नौकरी की व्यस्त दिनचर्या के बावजूद उन्होंने अपने अंदर छिपे कवि को कभी मरने नहीं दिया।
राज कपूर का पहला प्रस्ताव और स्वाभिमानी इनकार
शैलेंद्र अपनी ड्यूटी खत्म करने के बाद जब भी फुर्सत पाते, कविताएं लिखते और विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों, कवि सम्मेलनों और मुशायरों में हिस्सा लेकर अपनी रचनाएं सुनाते थे। ऐसे ही एक कार्यक्रम के दौरान वह अपनी एक बेहद लोकप्रिय कविता 'जलता है पंजाब' का पाठ कर रहे थे। उस मुशायरे में अभिनेता और निर्देशक राज कपूर भी मौजूद थे। राज कपूर शैलेंद्र की कविता से इतने ज्यादा प्रभावित हुए कि उन्होंने तुरंत उस कविता को अपनी आगामी फिल्म 'आग' (1948) में इस्तेमाल करने के लिए खरीदने की पेशकश कर दी। हालांकि, उस समय शैलेंद्र ने अपने सिद्धांतों और स्वाभिमान के चलते राज कपूर के इस प्रस्ताव को साफ मना कर दिया था।
आर्थिक तंगी और 500 रुपये में लिखे दो कालजयी गाने
स्वाभिमान के साथ जीवन जीने वाले शैलेंद्र के सामने परिस्थितियां तब बदलीं जब उनकी पत्नी गर्भवती हुईं। घर में आने वाले नए मेहमान और बढ़ते खर्चों के कारण शैलेंद्र गहरे आर्थिक संकट में घिर गए। इस वित्तीय तंगी से उबरने के लिए उन्होंने आखिरकार राज कपूर से दोबारा संपर्क करने का फैसला किया। उस समय राज कपूर अपनी नई फिल्म 'बरसात' (1949) के निर्माण में व्यस्त थे और उस फिल्म के दो गानों के बोल लिखे जाने बाकी थे। राज कपूर ने शैलेंद्र की स्थिति को समझते हुए उन्हें 500 रुपये के मेहनताने पर दो गाने लिखने का काम सौंपा। शैलेंद्र ने इस फिल्म के लिए 'पतली कमर है' और 'बरसात में' जैसे शानदार गाने लिखे। इन गानों की धुनें प्रसिद्ध संगीतकार जोड़ी शंकर-जयकिशन ने तैयार की थीं। इसी मोड़ से एक साधारण कवि के हिंदी सिनेमा का महान गीतकार बनने के ऐतिहासिक सफर की शुरुआत हुई।
'आवारा' से 'श्री 420' तक, दुनिया भर में गूंजे शैलेंद्र के गीत
राज कपूर, गीतकार शैलेंद्र और संगीतकार शंकर-जयकिशन की त्रिमूर्ति ने इसके बाद भारतीय सिनेमा को एक से बढ़कर एक सदाबहार गीत दिए। साल 1951 में आई फिल्म 'आवारा' का शैलेंद्र द्वारा लिखा गया गीत 'आवारा हूं' न केवल भारत में बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी बेहद लोकप्रिय हुआ और देश के बाहर सबसे ज्यादा पसंद किए जाने वाले भारतीय गानों में शामिल हो गया। इसके बाद उन्होंने राज कपूर की कई ब्लॉकबस्टर फिल्मों के लिए गीत लिखे, जिनमें साल 1955 में रिलीज हुई फिल्म 'श्री 420' भी शामिल है। इस फिल्म के सभी गानों को दर्शकों ने हाथों-हाथ लिया और वे आज दशकों बाद भी उतने ही चाव से सुने और पसंद किए जाते हैं।


















