हिंदी सिनेमा के पारंपरिक ढांचे में एक बड़ा और स्पष्ट बदलाव देखने को मिल रहा है, जहां कहानियां अब केवल पुरुष नायकों के कंधों पर टिकी नहीं हैं। एक लंबा दौर ऐसा रहा जब फिल्मों में महिला कलाकारों की उपस्थिति महज मुख्य अभिनेता के इर्द-गिर्द घूमने, प्रेम प्रसंग रचने या गानों में नृत्य करने तक सीमित मानी जाती थी। वर्तमान दौर में यह स्थापित धारणा तेजी से टूट रही है और अभिनेत्रियां अपनी सशक्त मौजूदगी से दर्शकों को सिनेमाघरों तक लाने में पूरी तरह सक्षम साबित हो रही हैं। हालिया दौर में इसका सबसे ताजा प्रमाण बनकर उभरी है यामी गौतम की फिल्म नई नवेली, जिसे देखने के लिए बड़ी संख्या में दर्शक टिकट खिड़की का रुख कर रहे हैं। इस फिल्म ने साफ कर दिया है कि अगर किसी कहानी की रीढ़ कोई महिला किरदार हो, तो भी वह मुख्यधारा के मनोरंजन का केंद्र बन सकती है।
स्त्री और मुंज्या से शुरू हुआ यह नया सिलसिला
सिनेमाई परिदृश्य में आए इस बदलाव को समझने के लिए पिछले कुछ समय की लोकप्रिय प्रस्तुतियों पर नजर डालना जरूरी है। जब स्त्री रिलीज हुई थी, तब पूरी कहानी में श्रद्धा कपूर के किरदार के इर्द-गिर्द बुना गया रहस्य दर्शकों के लिए सबसे बड़ा कौतूहल बना रहा। दर्शक पूरी फिल्म के दौरान यह जानने के लिए उत्सुक रहे कि आखिर उस किरदार के पीछे की असली सच्चाई क्या है, जिसने पूरी कहानी को आगे बढ़ाया। इसके बाद अलौकिक और लोककथाओं से प्रेरित फिल्म मुंज्या में शरवरी की भूमिका ने भी महत्वपूर्ण मोड़ दिए। इस फिल्म में शरवरी के किरदार ने रहस्य और रोमांच को एक नई दिशा दी, जिससे दर्शक अंत तक स्क्रीन से जुड़े रहे। अब इसी कड़ी को नई नवेली आगे बढ़ा रही है, जहां यामी गौतम का किरदार दर्शकों के बीच गहरी दिलचस्पी और चर्चा का विषय बना हुआ है।
शोपीस की भूमिका से बाहर निकलकर बनीं कहानी की धुरी
इन तमाम सफल परियोजनाओं की सबसे उल्लेखनीय विशेषता यह है कि इनमें महिला पात्रों को सिर्फ नायक को सहारा देने या स्क्रीन पर भावुकता जोड़ने के साधन के तौर पर पेश नहीं किया गया है। ये पात्र कथानक के भीतर मौजूद जटिल रहस्यों, तनावपूर्ण पलों और अप्रत्याशित मोड़ों के प्रमुख सूत्रधार बनकर सामने आए हैं। पहले यह आम मान्यता थी कि दर्शक मुख्य रूप से पुरुष सितारे को भारी-भरकम एक्शन करते या दुश्मनों से मुकाबला करते देखने के लिए टिकट खरीदते हैं। हालांकि, नई नवेली जैसी फिल्मों की स्वीकार्यता यह प्रमाणित करती है कि आज के दर्शकों की प्राथमिकता बदल चुकी है। दर्शक अब ऐसी कथाओं में ज्यादा रुचि दिखा रहे हैं, जिनकी धुरी किसी मजबूत महिला पात्र के निर्णयों और उसके इर्द-गिर्द घूमती परिस्थितियों से तय होती है।
हॉरर और सुपरनैचुरल जॉनर में नया प्रयोग
हिंदी फिल्म उद्योग में लंबे अरसे तक यह धारणा हावी रही कि महिला प्रधान कहानियां सिर्फ एक सीमित या गंभीर वर्ग के दर्शकों को ही आकर्षित कर सकती हैं। इस सोच को हॉरर, सुपरनैचुरल और सस्पेंस जॉनर ने पूरी तरह ध्वस्त कर दिया है। जब अलौकिक शक्तियों या जटिल पहेलियों से जुड़ी कथाओं में किसी महिला किरदार को केंद्रीय भूमिका में रखा जाता है, तो वह आम दर्शकों के बीच कहीं अधिक उत्सुकता पैदा कर रहा है। नई नवेली ने भी इसी फॉर्मूले को सही ठहराया है, जहां मनोरंजन के साथ-साथ एक सुगठित चरित्र को कहानी के केंद्र में स्थापित किया गया। इससे यह स्पष्ट होता है कि दर्शक केवल बड़े और स्थापित सितारों के नाम पर सिनेमाघरों में नहीं आते, बल्कि उन्हें बांधकर रखने वाली कहानी और स्क्रीन पर जीवंत लगने वाले किरदारों की तलाश होती है।
बॉक्स ऑफिस पर आंकड़ों ने लगाई मोहर
सिर्फ विषयवस्तु ही नहीं, बल्कि व्यावसायिक आंकड़ों ने भी इस प्रवृत्ति को मजबूती प्रदान की है। नई नवेली ने टिकट खिड़की पर अब तक 25.2 करोड़ रुपये की उल्लेखनीय कमाई दर्ज कर ली है। यह आंकड़ा इस बात का ठोस संकेत देता है कि सिनेमाघरों में लीक से हटकर बनाई जा रही फिल्मों के लिए एक मजबूत और समर्पित दर्शक वर्ग मौजूद है। किसी फिल्म की पूरी कहानी को एक महिला किरदार पर आधारित करना अब केवल एक कलात्मक जोखिम या सामान्य प्रयोग नहीं रह गया है, बल्कि यह व्यावसायिक दृष्टि से भी एक व्यावहारिक और सफल रास्ता बनता जा रहा है। टिकट खिड़की पर हुई 25.2 करोड़ रुपये की यह कमाई दर्शाती है कि दर्शक नए मिजाज की पटकथाओं का खुलकर स्वागत कर रहे हैं।
कहानी कहने के पारंपरिक तरीके में व्यापक बदलाव
स्त्री और मुंज्या से लेकर नई नवेली तक का यह सफर हिंदी सिनेमा में महिला किरदारों के बढ़ते कद को रेखांकित करता है। किसी भी फिल्म की पहचान अब इस बात से तय नहीं हो रही कि उसका हीरो कौन है, बल्कि इस बात से तय हो रही है कि कथानक कितना सम्मोहक है और उसके पात्र दर्शकों पर कितना गहरा प्रभाव छोड़ते हैं। जब अभिनेत्रियां अपने बूते फिल्मों को बॉक्स ऑफिस पर सफलता दिला रही हैं, तो यह पटकथा लेखकों और निर्देशकों को भी नई संभावनाएं तलाशने का हौसला देता है। आने वाले समय में यह देखना काफी दिलचस्प रहेगा कि फिल्मकार इस बदलते रुख को और कितने प्रभावी ढंग से पर्दे पर उतारते हैं।



















