नागरिक अधिकार संगठन सीजेपी के दो प्रमुख नेताओं सौरव दास और आशुतोष रांका को तिहाड़ जेल में एक सप्ताह बिताने के बाद बुधवार को रिहाई मिल गई। नई दिल्ली स्थित विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट (एसईएम) की अदालत में दोनों नेताओं द्वारा औपचारिक शपथ पत्र और वचनबद्धता प्रस्तुत करने के बाद यह रिहाई संभव हुई। अदालत ने दोनों को पचास-पचास हजार रुपये के व्यक्तिगत बांड और जमानती बांड जमा करने का निर्देश देकर जमानत मंजूर की, हालांकि उनके खिलाफ चल रही आधिकारिक जांच पूरी तरह जारी रहेगी और इस प्रकरण की अगली अदालती सुनवाई शुक्रवार को तय की गई है।
अदालत के समक्ष दिए गए लिखित वादे
जमानत की औपचारिक शर्तों के तहत सीजेपी के दोनों पदाधिकारियों ने विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट के समक्ष विस्तृत कानूनी हलफनामा दाखिल किया। इस दस्तावेज में दोनों कार्यकर्ताओं ने स्पष्ट रूप से कहा कि वे राष्ट्रीय राजधानी में किसी भी प्रकार से सार्वजनिक शांति भंग नहीं होने देंगे। उन्होंने लिखित रूप में दर्ज कराया कि उन्हें भारतीय न्यायपालिका, उसकी पूरी कार्यप्रणाली और संबंधित मजिस्ट्रेट अदालत की अधिकारिता पर अटूट विश्वास है।
हलफनामे की दूसरी सबसे अहम शर्त धरना स्थल से जुड़ी थी। दोनों नेताओं ने दोहराया कि जब तक सक्षम कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से जंतर-मंतर को दोबारा आधिकारिक प्रदर्शन स्थल के रूप में विज्ञापित या अधिसूचित नहीं किया जाता, तब तक वे उस परिसर में किसी भी नए धरने या विरोध प्रदर्शन का आह्वान नहीं करेंगे। इसके अलावा उन्होंने यह भी वचन दिया कि भविष्य में यदि कोई भी सार्वजनिक विरोध कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा, तो वह पूरी तरह से देश के संविधान और विधि-सम्मत सीमाओं के भीतर ही संचालित होगा।
जेल भेजने की पूरी पृष्ठभूमि
सौरव दास और आशुतोष रांका को 14 अक्टूबर के दिन न्यायिक हिरासत में भेजा गया था। इस कार्रवाई की शुरुआत 13 अक्टूबर की एक घटना से हुई थी, जब दोनों नेताओं ने जंतर-मंतर के बंद प्रवेश द्वार को फांदकर अंदर प्रवेश किया और राष्ट्रीय ध्वज फहरा दिया था। उनका यह कदम जंतर-मंतर को धरना स्थलों की आधिकारिक सूची से हटाए जाने के प्रशासनिक फैसले के विरोध में था।
सरकारी अभियोजन का मुख्य तर्क यह था कि दोनों नेताओं ने पूर्व में दिए गए शांति बांड का सीधा उल्लंघन किया है। इससे पहले चुनावी धांधली के आरोपों को लेकर एक प्रदर्शन के सिलसिले में उन्हें 10 अक्टूबर को हिरासत में लिया गया था, जिसके बाद उन्होंने शांति बनाए रखने वाले बांड पर हस्ताक्षर किए थे। अभियोजन ने आरोप लगाया कि बंद गेट लांघना उसी शांति समझौते की सीधी अवहेलना थी।
रिहाई पर अभिजीत दिपके का सार्वजनिक संदेश
दोनों नेताओं के जेल से बाहर आने के तत्काल बाद संगठन से जुड़े अभिजीत दिपके ने सार्वजनिक रूप से अपनी प्रतिक्रिया साझा की। उन्होंने सोशल मीडिया मंच एक्स पर लिखा कि सौरव और आशुतोष न केवल उनसे बेहतर हैं, बल्कि काफी बड़े कद के नेता हैं। उन्होंने कहा कि अपने इन साथियों के निर्देशों का पालन करना उनके लिए गर्व की बात है, साथ ही हल्के-फुल्के अंदाज में जोड़ा कि भविष्य में उनके बिना कोई भी अकेला उद्यान में नहीं घूमेगा।



















