नई दिल्ली। भारत के साथ व्यापारिक संबंधों को लेकर अमेरिका की नीतियों पर भारतीय पक्ष ने कड़ा रुख अपनाया है। भारत ने अमेरिकी प्रशासन पर अपने निजी आर्थिक हितों को साधने के लिए नियमों में मनमाने बदलाव करने का आरोप लगाया है। इसके साथ ही, भारत ने अपने ऊपर लगे बंधुआ मजदूरी के आरोपों को पूरी तरह खारिज करते हुए अमेरिका को इन्हें साबित करने की चुनौती दी है। संयुक्त राज्य व्यापार प्रतिनिधि (USTR) द्वारा बंधुआ मजदूरी से जुड़े सामानों पर अतिरिक्त आयात शुल्क लगाने के प्रस्ताव पर आयोजित एक सार्वजनिक सुनवाई के दौरान भारतीय पक्ष ने अमेरिकी रुख में मौजूद कई गंभीर विसंगतियों को सबके सामने रखा। इस सुनवाई में वाणिज्य मंत्रालय के संयुक्त सचिव बृज मोहन मिश्रा ने USTR समिति को अवगत कराया कि अमेरिका अपने देश में करीब 1,600 ऐसे उत्पादों को बंधुआ मजदूरी संबंधी जांच और प्रतिबंधों से पूरी तरह छूट देता है, जिनका उत्पादन या खेती अमेरिकी धरती पर संभव नहीं है।
नीतिगत विसंगतियों और दोहरे मानदंडों पर भारत का प्रहार
वाणिज्य मंत्रालय के संयुक्त सचिव बृज मोहन मिश्रा ने USTR समिति द्वारा पूछे गए तीखे सवालों के जवाब में भारतीय पक्ष को मजबूती से पेश किया। उन्होंने तर्क दिया कि अमेरिका द्वारा दी जा रही इस प्रकार की व्यापक छूट न केवल वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला से बंधुआ मजदूरी के खात्मे की नीतियों को कमजोर करती है, बल्कि यह उन प्रवृत्तियों को भी बढ़ावा देती है जिनसे नियमों से बचने का रास्ता साफ होता है। भारतीय पक्ष ने स्पष्ट किया कि अमेरिकी कपास और उससे तैयार होने वाले उत्पादों का इस्तेमाल कर बनाए गए कपड़ा उत्पादों के आयात पर अमेरिका खुद ही बेहद रियायती और कम शुल्क दरें लागू करता है। यह व्यवस्था पूरी तरह से अमेरिका के अपने आर्थिक लाभ को ध्यान में रखकर बनाई गई है। वहीं दूसरी तरफ, अन्य विकासशील देशों की वस्तुओं पर बंधुआ मजदूरी का मनगढ़ंत आरोप लगाकर भारी टैरिफ थोपने का प्रयास किया जा रहा है, जो सरासर अनुचित है।
मनमाने नियम और व्यापारिक वार्ता का प्रस्ताव
बृज मोहन मिश्रा ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि अमेरिका कच्चे माल के रूप में वस्त्र संबंधी उत्पादों के आयात पर तो बेहद कम शुल्क दरें रखता है, लेकिन विनिर्मित सामानों पर कड़े प्रतिबंध लगाने की कोशिश करता है। वस्त्र उद्योग से जुड़ी यह नीति एकतरफा और मनमानी शर्त की तरह काम करती है। यह वैश्विक स्तर पर काम करने वाले विदेशी विनिर्माताओं के निर्णय लेने की क्षमता को सीमित करती है और उन्हें अपने स्रोतों का निर्धारण करने के लिए मजबूर करती है। इससे बंधुआ मजदूरी जैसी वैश्विक चिंताओं का कोई वास्तविक समाधान नहीं निकलता है। भारत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि वह किसी भी प्रकार की चिंता पर खुली बातचीत के लिए हमेशा तैयार है। हालांकि, भारतीय पक्ष का यह भी मानना है कि इस तरह के संवेदनशील मुद्दों का समाधान भारत-अमेरिका द्विपक्षीय व्यापार वार्ता के मंच पर किया जाना चाहिए, न कि धारा 301 के तहत अमेरिकी प्रशासन द्वारा अपनाई जा रही किसी एकतरफा जांच प्रक्रिया के जरिए।
धारा 301 के तहत जांच और प्रस्तावित शुल्कों का ब्योरा
अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि ने 11 और 12 मार्च 2026 को वैश्विक स्तर पर बंधुआ मजदूरी और जरूरत से अधिक औद्योगिक क्षमता से जुड़ी चिंताओं को लेकर दुनिया के 60 देशों के खिलाफ धारा 301 के तहत दो अलग-अलग जांच शुरू की थीं। इसके बाद, USTR ने 3 जून को अपनी जांच रिपोर्ट सार्वजनिक की और 54 देशों से होने वाले आयात पर अतिरिक्त सीमा शुल्क लगाने की सिफारिश की। इस विवादित प्रस्ताव में कनाडा, इक्वाडोर, यूरोपीय संघ (EU), इंडोनेशिया, मैक्सिको और पाकिस्तान से अमेरिका में आयात होने वाले सामानों पर 10 प्रतिशत का अतिरिक्त शुल्क लगाने की बात कही गई है। वहीं दूसरी ओर, भारत और चीन सहित 48 अन्य देशों से होने वाले आयातों पर 12.5 प्रतिशत का भारी अतिरिक्त शुल्क लगाने का प्रस्ताव रखा गया है। भारतीय प्रतिनिधियों ने इस पूरी प्रक्रिया को भेदभावपूर्ण और नियमों के खिलाफ बताया है।
भारतीय उद्योग संगठनों ने जताई कड़ी आपत्ति
इस सार्वजनिक सुनवाई के दौरान देश के शीर्ष व्यापारिक और उद्योग संगठनों, जैसे फेडरेशन ऑफ इंडियन चैम्बर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (FICCI) और भारतीय उद्योग परिसंघ (CII) के प्रतिनिधियों ने भी USTR समिति के समक्ष भारतीय उद्योगों का पक्ष मजबूती से रखा। अमेरिका में FICCI की प्रतिनिधि पूर्णिमा शेनॉय ने चेतावनी दी कि यदि इन अतिरिक्त शुल्कों को लागू किया गया, तो इसका नुकसान केवल भारतीय निर्यातकों को ही नहीं उठाना पड़ेगा। उन्होंने कहा कि इस कदम से अमेरिकी विनिर्माता, आयातक, खुदरा विक्रेता और खुद अमेरिकी उपभोक्ता भी बुरी तरह प्रभावित होंगे क्योंकि उनके लिए वस्तुओं की लागत बढ़ जाएगी। वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर इस तरह के अतिरिक्त कर लादने से उन ईमानदार व्यवसायों पर बोझ बढ़ेगा जो पहले से ही सभी अंतरराष्ट्रीय श्रम मानकों का पूरी तरह पालन कर रहे हैं। इससे अवैध बंधुआ मजदूरी से बने सामानों की पहचान करने में कोई मदद नहीं मिलेगी, बल्कि बाजार में महंगाई बढ़ेगी।
मजबूत कानूनी ढांचा और अमेरिकी दावों में सबूतों की कमी
उद्योग जगत की प्रतिनिधि सोनालिका ने समिति के समक्ष भारत के मजबूत कानूनी पक्ष को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि भारत में एक अत्यंत सुदृढ़ संवैधानिक और वैधानिक ढांचा मौजूद है जो पूरी तरह से यह सुनिश्चित करता है कि कोई भी भारतीय कंपनी किसी भी स्तर पर बंधुआ मजदूरी का सहारा न ले सके। भारतीय कानूनों के तहत बंधुआ मजदूरी पूरी तरह से प्रतिबंधित और दंडनीय अपराध है। भारतीय पक्ष ने यह भी दलील दी कि USTR इस बात को साबित करने के लिए कोई ठोस या पर्याप्त साक्ष्य पेश करने में पूरी तरह नाकाम रहा है कि बंधुआ मजदूरी से जुड़े आयातों पर प्रतिबंध न होने से अमेरिकी बाजार प्रभावित हो रहा है या अमेरिकी उद्योगों को कोई नुकसान पहुंच रहा है। भारत का यह स्पष्ट आरोप है कि USTR ने इस जांच के दायरे में शामिल सभी 60 देशों की परिस्थितियों का अलग-अलग मूल्यांकन करने के बजाय एक ही चश्मे से सबको देखा और एकतरफा निष्कर्ष निकाल लिया। अमेरिकी प्रशासन भारत के प्रमुख निर्यात क्षेत्रों के खिलाफ बंधुआ मजदूरी का एक भी ठोस सबूत पेश नहीं कर सका है।











