तेल का बढ़ता आयात और सब्सिडी का बोझ: इस साल राजकोषीय घाटा 4.8% तक जाने के आसार, सरकार की मुश्किलें बढ़ींव्यापार
4 घंटे पहले· 0

तेल का बढ़ता आयात और सब्सिडी का बोझ: इस साल राजकोषीय घाटा 4.8% तक जाने के आसार, सरकार की मुश्किलें बढ़ीं

ईरान युद्ध से ईंधन की लागत बढ़ने और भारी सब्सिडी के दबाव में भारत इस वित्त वर्ष राजकोषीय घाटे को 4.3% के लक्ष्य के मुकाबले 4.8% तक जाने देने को तैयार है।

देश की अर्थव्यवस्था के सामने एक नई चुनौती आकार ले रही है। एक तरफ बढ़ता आयात बिल और दूसरी तरफ रुपये की लगातार कमजोरी तथा भारी-भरकम सब्सिडी — इन सबने मिलकर सरकार के बजट का गणित बिगाड़ना शुरू कर दिया है। नतीजा यह है कि राजकोषीय घाटे को तय दायरे में रखना अब पहले जैसा आसान नहीं रह गया है।

घाटा तय लक्ष्य से ज्यादा रहने के आसार

Bloomberg ने एक वरिष्ठ अधिकारी के हवाले से बताया है कि सरकार इस साल अनुमान से कहीं बड़े बजट घाटे के लिए खुद को तैयार कर रही है। इसी रिपोर्ट का हवाला देते हुए समाचार एजेंसी Reuters ने भी कहा है कि दुनिया में तेल का तीसरा सबसे बड़ा आयातक और उपभोक्ता भारत, इस वित्त वर्ष राजकोषीय घाटे को 4.3% के लक्ष्य के मुकाबले बढ़कर 4.8% तक पहुंचने देने को तैयार है। यह घाटा 1 अप्रैल से शुरू हुए वित्त वर्ष से जुड़ा है। पिछले बजट में सरकार ने घाटे को जीडीपी के 4.3 फीसदी पर लाने का लक्ष्य रखा था, लेकिन अब इसे बढ़ाकर 4.8 फीसदी किया जा सकता है।

जड़ में ईरान युद्ध और तेल की महंगाई

इस पूरे दबाव की असली वजह बाहर है। ईरान में छिड़े युद्ध ने ईंधन सब्सिडी की लागत बढ़ा दी है और इसका सीधा असर सरकार की वित्तीय सेहत पर पड़ा है। कच्चे तेल की कीमतें ऊपर चढ़ीं और होरमुज जलडमरूमध्य बंद होने के बाद आपूर्ति में जो रुकावट आई, उसकी मार भारत पर भी पड़ी। यही वजह रही कि सरकारी रिटेलर्स को पेट्रोल और डीजल के दाम करीब 8% तक बढ़ाने पड़े। इतना ही नहीं, घरेलू रसोई गैस सिलेंडर पर मिलने वाली सब्सिडी भी सरकार ने घटा दी है।

भारत की कमजोरी यहीं उजागर होती है — देश अपनी जरूरत का करीब 90% तेल आयात करता है। यही कारण है कि भारत उन देशों में गिना जा रहा है, जिन्हें ईरान युद्ध की वजह से वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति में लंबे समय तक चलने वाली रुकावट सबसे ज्यादा चोट पहुंचा सकती है।

उर्वरक सब्सिडी में भी 20% उछाल का अंदेशा

दबाव सिर्फ ईंधन तक सीमित नहीं है। सरकार के एक अधिकारी पहले ही बता चुके हैं कि इस वित्त वर्ष में उर्वरक सब्सिडी 20% तक बढ़ सकती है। फिलहाल सरकार ने सभी विकल्प खुले रखे हैं और तय किया है कि साल के आखिर में, जब गैर-कर राजस्व और सब्सिडी की असल जरूरतों की तस्वीर साफ हो जाएगी, तब पूरी वित्तीय स्थिति की दोबारा समीक्षा की जाएगी।

खर्च में कटौती भी एक रास्ता

घाटे पर लगाम कसने के लिए सरकार सिर्फ आमदनी पर ही नहीं टिकी है। वह विभिन्न मंत्रालयों में खर्च घटाने के विकल्पों पर भी विचार कर रही है। यानी जरूरत पड़ने पर सरकारी खर्च में कटौती करके भी घाटे को काबू में लाने की कोशिश की जा सकती है।

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