बहराइच की संगीता देवी की कहानी: बेरोजगारी से निकलकर घर बैठे दाल की बड़ी से बनीं आत्मनिर्भरव्यापार
2 घंटे पहले· 0

बहराइच की संगीता देवी की कहानी: बेरोजगारी से निकलकर घर बैठे दाल की बड़ी से बनीं आत्मनिर्भर

बहराइच के ताजपुर गांव की संगीता देवी ने स्वयं सहायता समूह से ट्रेनिंग लेकर घर से ही दाल की बड़ी बनाने का कारोबार खड़ा किया और आज अच्छी कमाई के साथ दूसरी महिलाओं की प्रेरणा बन गई हैं।

बेरोजगारी और पैसों की तंगी जब किसी के सामने दीवार बनकर खड़ी हो जाए, तो उससे बाहर निकलने का रास्ता अक्सर सबसे साधारण से हुनर में छिपा होता है। बहराइच जिले के छोटे से गांव ताजपुर की संगीता देवी की कहानी ठीक यही बात साबित करती है। कभी आर्थिक संकट से जूझ रही इस महिला ने स्वयं सहायता समूह का हाथ थामा और घर की चारदीवारी में रहते हुए ही अपने लिए कमाई का जरिया तैयार कर लिया।

समूह से मिली नई दिशा

संगीता देवी बताती हैं कि जब वह पहली बार समूह से जुड़ीं, तब उनके सामने सबसे बड़ा सवाल यही था कि आखिर किस काम से शुरुआत की जाए। यहीं पर समूह की दीदियों और अधिकारियों ने आगे बढ़कर उनका मार्गदर्शन किया। उन्हें रोजगार से जुड़ी ट्रेनिंग दी गई और कारोबार चलाने के व्यावहारिक तरीके समझाए गए। इसी सीख और हौसले के दम पर उन्होंने कई कामों के बीच दाल की बड़ी बनाने का काम चुना। आज वह खबहा और धोई उड़द दाल की बड़ी तैयार करके बेचती हैं और इससे अच्छा मुनाफा कमा रही हैं।

पूरे प्रदेश में स्वयं सहायता समूहों से जुड़कर महिलाएं अपने हुनर को निखारने के साथ-साथ आत्मनिर्भर बनने की नई मिसालें गढ़ रही हैं। संगीता देवी इसी बदलाव की एक जीती-जागती तस्वीर हैं — एक समूह सदस्य से अपना रोजगार चलाने वाली महिला बनने तक का उनका सफर अब दूसरी महिलाओं के लिए प्रेरणा है।

कैसे बनती है दाल की बड़ी

संगीता देवी का मानना है कि बड़ी बनाना कोई कठिन काम नहीं है, इसे बस सही ढंग से सीखने भर की जरूरत होती है — और यही हुनर उन्होंने समूह के जरिए हासिल किया। उनका कहना है कि कोई भी इसे आसानी से सीख सकता है। इसकी पूरी प्रक्रिया वह सिलसिलेवार तरीके से समझाती हैं:

  • सबसे पहले खबहा मंगाया जाता है और उसका ऊपरी छिलका उतार लिया जाता है।
  • इसके बाद उसे कद्दूकस किया जाता है।
  • फिर बाजार से लाई गई या घर पर भीगी हुई उड़द धोई दाल को पीसकर इसमें मिलाया जाता है।
  • इस मिश्रण में स्वादानुसार मसाला, मिर्च और नमक डालकर अच्छी तरह तैयार किया जाता है।
  • तैयार मिश्रण को एक पन्नी पर छोटे-छोटे आकार में चुआ दिया जाता है और धूप में सूखने के लिए छोड़ दिया जाता है।
  • धूप में अच्छी तरह सूख जाने के बाद इनकी पैकिंग कर बिक्री के लिए भेज दिया जाता है।

छोटे पैकेट से बड़ी कमाई तक

संगीता देवी छोटे पैकेट के साथ-साथ बड़े आकार की बड़ी भी बनाती हैं। वह बताती हैं कि बड़े आकार की एक बड़ी पर लगभग 2 रुपये का खर्च आता है, जबकि बाजार में यही आसानी से 5 रुपये में बिक जाती है। यही फर्क उन्हें अच्छी आमदनी दे जाता है। इस कमाई से घर का खर्च आराम से चल जाता है और रोजगार के लिए कहीं बाहर भटकने की जरूरत भी नहीं पड़ती।

इस कारोबार की एक बड़ी खूबी यह भी है कि बड़ी को लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है और सालों तक इस्तेमाल किया जा सकता है — यही वजह है कि संगीता देवी की बनाई बड़ी की मांग अब दूर-दूर तक पहुंच चुकी है।

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