किसानों के लिए पारंपरिक फसलों के दायरे से बाहर निकलकर नए विकल्पों को अपनाना अब मुनाफे का सौदा साबित हो रहा है। मध्य प्रदेश के खंडवा क्षेत्र में अन्नदाता अब लीक से हटकर खेती की तरफ कदम बढ़ा रहे हैं, जिससे उनकी आमदनी में उल्लेखनीय इजाफा हो रहा है। खासकर सूरजमुखी की फसल इन दिनों ग्रामीण इलाकों में खासी लोकप्रिय हो रही है। इसकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसे बहुत अधिक उपजाऊ या पानी से भरपूर खेतों की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि यह कमजोड़ और बंजर भूमि में भी बेहतरीन पैदावार देने की क्षमता रखती है। न्यूनतम लागत और बेहतरीन बाजार भाव के चलते यह किसानों के लिए आय का एक मजबूत जरिया बनती जा रही है।
सालभर बनी रहती है मांग
बाजार विशेषज्ञों के मुताबिक सूरजमुखी को एक प्रमुख नकदी फसल का दर्जा प्राप्त है जिसकी मांग बाजार में बारह महीने बनी रहती है। इससे तैयार होने वाला खाद्य तेल ऊंचे दामों पर बिकता है और इसके बीज भी किसानों के लिए अतिरिक्त कमाई का जरिया बनते हैं। यही वजह है कि पारंपरिक फसलों की अनिश्चितता से परेशान होकर अब कई किसान इस लाभकारी तिलहन की तरफ आकर्षित हो रहे हैं। कृषि सलाहकार नरेंद्र पटेल का कहना है कि यदि किसान वैज्ञानिक तरीकों और आधुनिक तकनीकों को अपनाएं, तो वे बहुत कम खर्च में अपनी उपज को कई गुना बढ़ा सकते हैं।
खेती के मौसम और तैयारी के चरण
यह बहुपयोगी फसल गर्मी और वर्षा ऋतु दोनों समय में उगाई जा सकती है, जबकि देश के कुछ हिस्सों में इसकी खेती सर्दियों के सीजन में भी सफलतापूर्वक की जाती है। कम अवधि में पककर तैयार हो जाने वाली यह फसल किसानों के हाथों में जल्दी नकदी सौंपती है। इसकी सफलता का मुख्य आधार खेत की सही तैयारी पर टिका होता है। बुवाई से पहले खेत की मिट्टी को पूरी तरह भुरभुरी और पोली करना जरूरी होता है ताकि पौधों की जड़ों का फैलाव बेहतर ढंग से हो सके। इसके अलावा खेतों में जल निकासी का पुख्ता इंतजाम होना अनिवार्य है क्योंकि जरा सा भी पानी जमा होने पर फसल को भारी नुकसान पहुंच सकता है। जलभराव की समस्या से निपटने के लिए खेतों में छोटी नालियां तैयार की जानी चाहिए।
जुताई और बीज चयन के नियम
मिट्टी की सेहत सुधारने के लिए जुताई पर विशेष जोर देना चाहिए। जमीन की कम से कम दो बार गहरी जुताई करने से मिट्टी के भीतर छिपे हानिकारक कीट और खरपतवार स्वतः समाप्त हो जाते हैं तथा मिट्टी के कणों के बीच हवा का आवागमन सुगम हो जाता है। इसके पश्चात पाटा फेरकर खेत को पूरी तरह समतल कर लिया जाता है जिससे बीजों की बुवाई सुगम हो जाती है। बात करें बीज की मात्रा की तो एक हेक्टेयर रकबे के लिए लगभग 10 से 15 किलोग्राम बीज पर्याप्त माने जाते हैं। खेत में डालने से पहले बीजों का बीजोपचार करना बेहद आवश्यक है ताकि फसल को शुरुआती अवस्था में लगने वाली विभिन्न बीमारियों से सुरक्षित रखा जा सके। हमेशा उच्च गुणवत्ता वाले प्रमाणित और उन्नत किस्म के बीजों का ही चयन करना चाहिए।
दूरी प्रबंधन और सिंचाई तकनीक
फसल की बंपर पैदावार के लिए पौधों के बीच उचित फासला रखना अनिवार्य है। कतार से कतार के बीच 45 से 60 सेंटीमीटर की दूरी और पौधे से पौधे के बीच लगभग 15 सेंटीमीटर का अंतर रखा जाना चाहिए। इससे प्रत्येक पौधे को भरपूर धूप और ताजी हवा मिलती है जिससे फूलों का आकार बड़ा और स्वस्थ बनता है। इसके साथ ही किसान इन खाली जगहों पर अन्य सहायक फसलें उगाकर अतिरिक्त मुनाफा भी कमा सकते हैं। सिंचाई के मोर्चे पर सूरजमुखी को बहुत अधिक पानी की दरकार नहीं होती, बशर्ते मिट्टी के भीतर पर्याप्त नमी बरकरार रहे। बुवाई के तुरंत बाद पहली सिंचाई करना जरूरी होता है। यदि खेतों की सिंचाई स्प्रिंकलर पद्धति से की जाए तो पानी की भारी बचत होती है और खेत के हर हिस्से में एक समान नमी बनी रहती है।
खरपतवार नियंत्रण और अंतिम लाभ
फसल के समुचित विकास के लिए समय-समय पर निराई-गुड़ाई करना और खरपतवारों पर नियंत्रण रखना भी उतना ही अहम है। इससे पौधों को उनकी जरूरत के मुताबिक पूरा पोषण हासिल होता है और कुल पैदावार में बढ़ोतरी दर्ज होती है। यदि कीटों या रोगों का प्रकोप बढ़े तो कृषि विशेषज्ञों से परामर्श लेकर उचित कीटनाशकों का प्रयोग किया जा सकता है। निष्कर्ष के तौर पर उन किसानों के लिए यह फसल अचूक विकल्प है जो कम पूंजी निवेश के साथ अधिकतम रिटर्न हासिल करना चाहते हैं। अगर सही दिशा और नियमों के तहत इसकी देखभाल की जाए, तो पथरीली और बंजर भूमि भी सोना उगलने लगती है और किसानों की आर्थिक स्थिति मजबूत हो जाती है।



















