भरतपुर जिले में पिछले कुछ दिनों से मौसम का मिजाज पूरी तरह बदल चुका है और लगातार हो रही बारिश की वजह से बाजरा उत्पादक किसानों की मुश्किलें काफी बढ़ गई हैं। खेतों में लंबे समय तक पानी रुकने और वातावरण में अधिक नमी बने रहने के कारण बाजरा की फसल पर तमाम तरह की बीमारियों का संकट तेजी से मंडराने लगा है। कई ग्रामीण क्षेत्रों में तो बाजरा के पौधों पर रोगों के शुरुआती लक्षण भी साफ तौर पर देखे जाने लगे हैं, जिससे अन्नदाताओं में फसल के बर्बाद होने और पैदावार में भारी कमी आने की आशंका गहराने लगी है। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह के बरसाती मौसम और खेतों में जमा पानी से फफूंद तथा अन्य रोगाणुओं को पनपने के लिए सबसे अनुकूल माहौल मिल जाता है।
कृषि विभाग के जानकारों ने इस बात की जानकारी दी है कि मौजूदा मौसमी हालात को देखते हुए बाजरा की फसल में हरित बाली रोग यानी ग्रीन ईयर डिजीज और अन्य फफूंद जनित संक्रमणों का खतरा सबसे अधिक बना हुआ है। हवा में नमी और आर्द्रता ज्यादा होने के कारण यह फंगस बहुत कम समय में पूरे खेत को अपनी गिरफ्त में ले सकती है। यही वजह है कि किसानों को यह सख्त हिदायत दी जा रही है कि वे नियमित रूप से अपने खेतों का मुआयना करें और पौधों की पत्तियों तथा बालियों की बहुत बारीकी से निगरानी करते रहें। यदि बीमारी की शुरुआत में ही इसके लक्षणों को भांप लिया जाए, तो समय रहते उचित कदम उठाकर फसल को बड़े नुकसान की चपेट में आने से आसानी से बचाया जा सकता है।
फसल की सुरक्षा के लिए कृषि विभाग की जरूरी गाइडलाइन
इस संकट से निपटने और बाजरा की फसल को सुरक्षित रखने के लिए कृषि विभाग ने किसानों से अपील की है कि वे बिना देर किए कुछ खास सुरक्षात्मक उपायों को अपनी खेती में तुरंत लागू करें।
खेतों से पानी बाहर निकालना: सबसे पहले खेतों में किसी भी सूरत में फालतू पानी जमा नहीं रहने देना चाहिए। जिन-जिन खेतों में जलभराव की समस्या बनी हुई है, वहां से तुरंत पानी की निकासी का पक्का इंतजाम किया जाए ताकि जड़ें सड़ न सकें।
बीमार पौधों को हटाना: खेत में जो पौधे अस्वस्थ या किसी रोग से ग्रस्त नजर आएं, उन्हें तुरंत पहचानकर उखाड़ बाहर फेंकना चाहिए। इन संक्रमित पौधों को स्वस्थ पौधों से दूर ले जाकर नष्ट करना बेहद जरूरी है ताकि संक्रमण आगे न फैले।
मैलाथियान का छिड़काव: यदि खेतों में बीमारी के लक्षण दिखाई दें, तो कृषि जानकारों की देखरेख में मैलाथियान की करीब 1 मिलीलीटर मात्रा को प्रति लीटर पानी के हिसाब से घोलकर उसका छिड़काव किया जाना चाहिए।
फफूंदनाशक का उपयोग: जरूरत पड़ने पर डाइथेन एम-45 जैसी फफूंदनाशक दवा का इस्तेमाल किया जा सकता है। हालांकि इस बात का विशेष ध्यान रखना होगा कि दवा की सही मात्रा और अनुपात की जानकारी केवल कृषि विभाग के अधिकारियों से सलाह लेकर ही तय की जाए।
मौसम को देखकर करें छिड़काव: तेज बारिश के वक्त या जब बारिश होने के पूरे आसार हों, तब खेतों में किसी भी तरह के रसायन का छिड़काव करने से बिल्कुल बचना चाहिए। बारिश के पानी के साथ दवा धुल कर बह जाती है, जिससे उसका असर खत्म हो जाता है और मेहनत बेकार हो जाती है।
विभाग की तरफ से किसानों को बार-बार यह समझाया गया है कि वे बिना विशेषज्ञ की सलाह के अपनी मर्जी से किसी भी रासायनिक कीटनाशक या दवा का इस्तेमाल बिल्कुल न करें और स्थानीय मौसम के मिजाज को देखते हुए ही अपनी फसल की सही देखभाल करें।



















