बरसात का मौसम यूं तो खेती के लिए वरदान माना जाता है, लेकिन समस्तीपुर जिले के किसानों के लिए इस बार की बारिश अपने साथ एक बड़ा और गंभीर खतरा लेकर आई है। जिले के खेतों में रेगिस्तानी टिड्डों का प्रकोप अप्रत्याशित रूप से बढ़ रहा है। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए कृषि विभाग और डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा ने स्थानीय किसानों के लिए एक विशेष अलर्ट जारी किया है। अधिकारियों का कहना है कि यह कीट विशेष रूप से बारिश के मौसम में बहुत तेजी से अपनी संख्या बढ़ाता है, जिससे खेतों की उपजाऊ मिट्टी और लहलहाती फसलों दोनों को भारी नुकसान पहुंचने की आशंका है। यदि समय रहते इस खतरे को नहीं रोका गया, तो किसानों को भयानक आर्थिक नुकसान का सामना करना पड़ सकता है।
ग्रामीण क्षेत्रों का 'रामजी के घोड़ा' और उसकी पहचान
समस्तीपुर और इसके आसपास के ग्रामीण इलाकों में इस विनाशकारी रेगिस्तानी टिड्डे को आम बोलचाल की भाषा में 'रामजी के घोड़ा' के नाम से जाना जाता है। कृषि पदाधिकारी ऋषभ सिंह ने इस कीट की पहचान को लेकर कई अहम जानकारियां साझा की हैं। उनका कहना है कि इस टिड्डे की शारीरिक संरचना काफी विशेष होती है। आमतौर पर इसका शरीर पांच से आठ सेंटीमीटर तक लंबा होता है। आकार में यह काफी संकरा और बेलनाकार दिखाई देता है। आस-पास के वातावरण और उम्र के हिसाब से इसका रंग हरा, पीला या फिर भूरा भी हो सकता है। किसानों के लिए सबसे पहली और अहम जरूरत यही है कि वे खेतों में इस कीट की सही पहचान करना सीखें।
प्रजनन का चक्र और अंडों की पहचान
इस कीट का जीवन चक्र मुख्य रूप से तीन अवस्थाओं से होकर गुजरता है, जिसमें अंडा, शिशु और वयस्क अवस्था शामिल है। मादा टिड्डी प्रजनन के लिए हमेशा खेत की नम मिट्टी की तलाश करती है। एक बार में वह मिट्टी के भीतर दो से तीन अंडों के गुच्छे देती है। चौंकाने वाली बात यह है कि हर गुच्छे में 60 से 80 तक अंडे होते हैं। इसका सीधा मतलब यह है कि इनकी आबादी कुछ ही दिनों में भयानक रूप ले सकती है।
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, इन अंडों से शिशु टिड्डे मात्र 10 से 12 दिनों के भीतर बाहर निकल आते हैं और अगले 30 दिनों के अंदर वे पूरी तरह से वयस्क बनकर फसल को बर्बाद करने के लिए तैयार हो जाते हैं। खेतों में इन अंडों की पहचान करना बहुत मुश्किल नहीं है। अधिकारी बताते हैं कि जहां भी मादा टिड्डी अंडे देती है, वहां मिट्टी में छोटे-छोटे सुराख बन जाते हैं और आस-पास सफेद झाग जैसे निशान साफ तौर पर दिखाई देते हैं।
पौधों का विकास रोक देता है यह कीट
यह रेगिस्तानी टिड्डा फसलों के लिए किसी महामारी से कम नहीं है। खेतों में पहुंचकर यह कीट सबसे पहले पौधों की हरी पत्तियों को अपना भोजन बनाता है। जब पत्तियां ही नहीं बचतीं, तो पौधे के भीतर प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया पूरी तरह से बाधित हो जाती है। भोजन न बना पाने के कारण पौधे का विकास वहीं रुक जाता है और फसल बर्बाद होने लगती है।
यह खतरा सिर्फ खड़ी फसल तक ही सीमित नहीं है। कृषि विभाग का कहना है कि अगर खेत में बीज बोने से पहले ही इन कीटों का हमला हो जाए, तो ये जमीन के अंदर पड़े बीजों को भी अपना निशाना बना लेते हैं। बीज को नुकसान पहुंचने से उनका अंकुरण बेहद कमजोर हो जाता है, जिससे पूरी की पूरी फसल शुरुआत में ही चौपट हो जाती है।
रोकथाम के पारंपरिक तरीके और कीटनाशक का प्रयोग
विशेषज्ञों का मानना है कि इस संकट से निपटने का सबसे कारगर उपाय शुरुआती अवस्था में ही रोकथाम करना है। ऋषभ सिंह ने सलाह दी, "यदि शुरुआती अवस्था में ही अंडों को नष्ट कर दिया जाए तो बिना अधिक रासायनिक दवा के भी इसके प्रकोप को काफी हद तक रोका जा सकता है।" अंडा या शिशु अवस्था में इन्हें खत्म करने से भविष्य में पैदा होने वाले अनियंत्रित झुंडों को रोका जा सकता है।
प्रशासन ने किसानों से अपील की है कि वे रसायनों पर निर्भर रहने के बजाय सबसे पहले सामूहिक और पारंपरिक उपायों को अपनाएं। यदि खेतों के आसपास टिड्डियों का कोई बड़ा झुंड दिखाई दे, तो किसानों को तुरंत ढोल, नगाड़े या खाली टिन के डिब्बे बजाकर भारी शोर मचाना चाहिए। तेज आवाज के कारण कीट खेतों में बैठ नहीं पाते और आगे बढ़ जाते हैं।
रसायनों के अंधाधुंध इस्तेमाल को लेकर भी विभाग ने कड़ी चेतावनी दी है। अत्यधिक केमिकल का छिड़काव न सिर्फ फसल की गुणवत्ता को खराब करता है, बल्कि इंसानों की सेहत पर भी इसका गहरा दुष्प्रभाव पड़ता है। इसलिए रासायनिक कीटनाशकों का इस्तेमाल केवल तब किया जाना चाहिए, जब स्थिति हाथ से निकलने लगे और वह भी कृषि विशेषज्ञों की सख्त सलाह पर। यदि दवा का छिड़काव करना बेहद जरूरी हो जाए, तो विभाग द्वारा बताए गए कीटनाशकों का इस्तेमाल रात के समय से लेकर सूर्योदय होने के बीच ही करना चाहिए, क्योंकि इस दौरान कीटों की सक्रियता सबसे कम होती है।



















