झारखंड के पलामू जिले में ग्रामीण महिलाएं अब पारंपरिक खेती से आगे बढ़कर स्वरोजगार की नई मिसाल पेश कर रही हैं। चैनपुर प्रखंड के चेडाबार गांव की रहने वाली रीना देवी ने कृषि और जैविक उत्पादों के निर्माण को अपना जरिया बनाकर आर्थिक स्वतंत्रता हासिल की है। रासायनिक खादों के बढ़ते इस्तेमाल और उसके दुष्प्रभावों से दूर हटकर, आज के दौर में किसान जैविक खेती की तरफ कदम बढ़ा रहे हैं। इसी बदलाव को भुनाते हुए उन्होंने जैविक खाद का व्यवसाय शुरू किया और आज वह इलाके की अन्य महिलाओं के लिए एक प्रेरणा बन चुकी हैं। इस पूरे सफर में उद्यान विभाग की तरफ से उन्हें आवश्यक यूनिट भी उपलब्ध कराई गई, जिससे उनके इस छोटे से प्रयास ने एक बड़े कारोबार का रूप ले लिया।
प्रशिक्षण से लेकर वर्मी कंपोस्ट निर्माण तक की शुरुआत
रीना देवी पिछले करीब दो वर्षों से इस क्षेत्र में पूरी मेहनत के साथ सक्रिय हैं। अपने काम की शुरुआत करने से पहले उन्होंने कृषि विज्ञान केंद्र से जैविक खाद बनाने का विधिवत प्रशिक्षण प्राप्त किया था। इस ट्रेनिंग ने उन्हें खाद तैयार करने की बारीकियों को समझने में काफी मदद की। प्रशिक्षण पूरा होने के बाद उन्होंने नाडेप खाद के निर्माण की दिशा में भी अपने कदम बढ़ाए। वर्तमान समय में उनकी यूनिट में कुल पांच बेड संचालित हो रहे हैं, जिनमें केंचुआ खाद मुख्य रूप से तैयार की जाती है। इसके अलावा वह वर्मी कंपोस्ट के साथ-साथ पौधों की सुरक्षा और वृद्धि के लिए ब्रह्मास्त्र और निर्मास्त्र जैसे खास जैविक उत्पाद भी खुद तैयार करती हैं। इन सभी उत्पादों को वह स्थानीय किसानों को बाजार के मुकाबले काफी किफायती और कम दामों पर उपलब्ध कराती हैं, जिससे किसानों को भी खेती में बड़ी राहत मिलती है।
कम लागत में मोटी कमाई और खाद बनाने की आसान प्रक्रिया
जैविक खाद तैयार करने की पूरी प्रक्रिया काफी सरल और व्यवस्थित है। रीना देवी बताती हैं कि इस प्रक्रिया की शुरुआत में सबसे नीचे सागवान के सूखे पत्ते और पेड़-पौधों के अन्य अपशिष्ट पदार्थों की एक परत बिछाई जाती है। इसके बाद उसके ऊपर मिट्टी और गोबर की परत डाली जाती है। इसी क्रम को दोहराते हुए कुल छह परतें तैयार की जाती हैं, जिसमें पत्ते, मिट्टी और गोबर शामिल होते हैं। इसके बाद इसमें केंचुए छोड़े जाते हैं। सही मात्रा में नमी बनाए रखने और उचित देखभाल करने से लगभग 60 से 65 दिनों के भीतर केंचुआ खाद पूरी तरह तैयार हो जाती है। एक बार खाद बनकर तैयार होने में यह समय लगता है और वर्तमान में उनके पास चार बैग खाद पूरी तरह तैयार रखी हुई है।
बाजार से आधी कीमत पर बिक्री और मुनाफा
उत्पादन के बाद कमाई का गणित भी काफी मुनाफे वाला साबित हो रहा है। उनकी एक यूनिट में लगभग दो क्विंटल से अधिक केंचुआ खाद आसानी से तैयार हो जाती है। वह इस खाद को करीब 20 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से किसानों को बेचती हैं। इसके उलट खुले बाजार में इसी केंचुआ खाद की कीमत 50 से 60 रुपये प्रति किलोग्राम तक वसूली जाती है। किसानों को बहुत कम कीमत पर उच्च गुणवत्ता वाली खाद मिल जाती है और रीना देवी को भी एक सीजन में करीब 25 से 30 हजार रुपये तक की शानदार कमाई हो जाती है। इस प्रकार एक बार खाद तैयार होने पर उन्हें अच्छी और नियमित आमदनी प्राप्त हो जाती है।
ग्रामीण महिलाओं के लिए रोजगार का नया द्वार
रीना देवी का यह छोटा सा व्यवसाय अब ग्रामीण अंचल की अन्य महिलाओं के लिए भी आर्थिक स्वावलंबन का रास्ता खोल रहा है। उनका मानना है कि जैविक खाद के इस्तेमाल से जहां एक तरफ किसानों को कम लागत में खेती करने का बेहतरीन और रसायन-मुक्त विकल्प मिल रहा है, वहीं दूसरी तरफ महिलाओं के लिए रोजगार के नए अवसर भी पैदा हो रहे हैं। सरकारी योजनाओं के प्रशिक्षण और संबंधित विभागों के समय पर सहयोग ने उनके इस कारोबार को मजबूत आधार दिया है। आज वह अपने दम पर जैविक खाद का उत्पादन कर रही हैं, उसे जरूरतमंद किसानों तक पहुंचा रही हैं और खुद भी सम्मानजनक तरीके से अच्छी आय अर्जित कर रही हैं।



















