बिहार के ग्रामीण और शहरी इलाकों में पशुपालन का दायरा तेजी से फैल रहा है। केवल दूध ही नहीं बल्कि गोबर की बिक्री से भी लोगों को अतिरिक्त मुनाफा हो रहा है। राज्य के जहानाबाद जिले में कई ऐसे प्रगतिशील लोग हैं जो बड़े पैमाने पर पशुपालन कर रहे हैं और आर्थिक रूप से मजबूत हो रहे हैं। कुछ लोग इस क्षेत्र में अकेले उतरते हैं तो कुछ भाई मिलकर इस कारोबार को संभालते हैं। ऐसे ही मेहनती लोगों में जहानाबाद जिले के घोसी प्रखंड के अंतर्गत आने वाले ज्ञानगढ़ मठ के रहने वाले दो सगे भाई कपिल देव यादव और बीरेंद्र यादव शामिल हैं, जिन्होंने अपनी मेहनत के दम पर इस व्यवसाय को एक नई ऊंचाई दी है।
महज दो पशुओं से रखी गई थी डेयरी की नींव
इस सफर की शुरुआत साल 1971 में हुई थी। उस समय कपिल देव यादव ने अपनी 10वीं कक्षा की पढ़ाई पूरी की थी और रोजगार की तलाश में थे। आजीविका चलाने के लिए उन्होंने अपने ही गांव में एक निजी विद्यालय का संचालन शुरू किया। हालांकि, इस स्कूल से उन्हें उतनी आमदनी नहीं हो पा रही थी जितनी की उम्मीद थी। दूसरी तरफ, बीरेंद्र यादव ने पहले ही मन बना लिया था कि उन्हें पशुपालन के क्षेत्र में ही आगे बढ़ना है। शुरुआती दौर में पूंजी की भारी कमी थी, जिसके कारण वे केवल दो गाय और भैंस खरीदकर ला पाए। बीरेंद्र यादव ने ज्ञानगढ़ मठ स्थित अपने घर पर ही रहकर इन दो मवेशियों के साथ डेयरी फार्मिंग की शुरुआत की थी।
दो गायों से बढ़कर 32 तक पहुंचा मवेशियों का कुनबा
एक तरफ कपिल देव यादव अपने प्राइवेट स्कूल को चलाने में जुटे थे, लेकिन जब उन्हें वहां मनमुताबिक सफलता नहीं मिली तो दोनों भाइयों ने मिलकर डेयरी के व्यवसाय को ही आगे बढ़ाने का पक्का इरादा कर लिया। कारोबार की शुरुआत में दूध का दाम महज 3 रुपये प्रति किलो हुआ करता था। दोनों भाइयों ने दिन-रात कड़ी मेहनत की और कभी हिम्मत नहीं हारी। इस दौरान उन्होंने कई सरकारी योजनाओं का भी पूरा लाभ उठाया, जिससे उनके इस काम को गति मिली। नतीजा यह हुआ कि मवेशियों की संख्या धीरे-धीरे बढ़ती चली गई और देखते ही देखते दो पशुओं से शुरू हुआ यह सफर बढ़कर 32 पशुओं तक पहुंच गया।
हर महीने हो रही है एक लाख रुपये से अधिक की कमाई
इस पूरे सफर के बारे में जानकारी देते हुए कपिल देव यादव बताते हैं कि उन्होंने सिर्फ 2 गायों से इस कारोबार की शुरुआत की थी जो अब बढ़कर 32 पशुओं का बड़ा कुनबा बन चुका है। वर्तमान में उनके पास गाय और भैंस दोनों शामिल हैं। इन मवेशियों में साहीवाल, मुर्रा, जर्सी और गिर जैसी बेहतरीन नस्लें मौजूद हैं। उन्होंने बताया कि इस डेयरी को चलाने में हर महीने लगभग 50000 रुपये का खर्च आता है, जबकि इसके मुकाबले उन्हें हर महीने 1 लाख 10 हजार से 1 लाख 15 हजार रुपये तक की शानदार आमदनी हो जाती है। इस डेयरी व्यवसाय की बदौलत ही उन्होंने अपना पक्का घर बनवाया, परिवार में शादियां कराईं और अन्य सभी जरूरी काम पूरे किए। आज भी उनका पूरा परिवार इसी काम से चल रहा है। वह युवाओं को संदेश देते हुए कहते हैं कि खाली बैठने के बजाय कुछ न कुछ जरूर करें, मेहनत करने पर सफलता निश्चित तौर पर मिलती है।


















