बिहार के किसान अब धान और गेहूं जैसी परंपरागत फसलों के दायरे से बाहर निकलकर ऐसे फलों की ओर बढ़ रहे हैं, जिनका नाम सूबे की खेती में अब तक कम ही सुना गया था। इसी बदलाव की एक मिसाल पश्चिम चम्पारण जिले के नौतन प्रखंड स्थित बैकुंठवा गांव में देखने को मिल रही है, जहां किसान शिशिर दूबे ने मौसंबी की बागवानी कर एक नया रास्ता खोल दिया है। खास बात यह है कि बिहार में अब तक गिने-चुने किसानों ने ही इस फल की खेती की हिम्मत जुटाई है, और जिन्होंने की है, उन्हें मुनाफा उम्मीद से कहीं ज्यादा मिलता दिख रहा है।
छह साल पहले रखी थी नींव, अब चरम पर है फलन
शिशिर के मुताबिक उन्होंने करीब 6 साल पहले मौसंबी का बगीचा लगाने की शुरुआत की थी। पेड़ों पर फल आने की प्रक्रिया पिछले वर्ष से शुरू हुई और इस साल यह अपने चरम पर पहुंच चुकी है। दिलचस्प पहलू यह है कि मौसंबी असल में उपोष्णकटिबंधीय फल है, यानी ऐसी जलवायु का जहां बहुत तेज गर्मी नहीं पड़ती। इसके बावजूद बिहार जैसी उष्णकटिबंधीय यानी अधिक गर्मी वाली जलवायु में भी इसकी फसल बेहद अच्छी तरह तैयार हुई है।
नींबू कुल का होने का फायदा
मौसंबी नींबू के परिवार से ताल्लुक रखती है और यही बात इसकी खेती को आसान बना देती है। शिशिर बताते हैं कि उनके बगीचे पर न तो कीटों ने हमला किया और न ही किसी मवेशी ने पौधों को चरकर नुकसान पहुंचाया। इस वजह से फसल की देखभाल का जोखिम काफी कम रहा।
तीन एकड़, 750 पौधे और 12 टन की उम्मीद
शिशिर ने कुल 3 एकड़ जमीन पर यह बागवानी की है, जिसमें करीब 750 पौधे लगाए गए थे। बीते 6 वर्षों में ये सभी पौधे अब पेड़ का रूप ले चुके हैं और हर पेड़ पर 40 किलो तक मौसंबी फली है। उनका अनुमान है कि इस बार पूरे बगीचे से वे करीब 12 टन तक मौसंबी की हार्वेस्टिंग कर लेंगे। चूंकि बिहार में यह फल अब भी दुर्लभ है, इसलिए फल और जूस के कारोबारी इसे सीधे खेत से ही 80 रुपये प्रति किलो तक की दर पर खरीद ले जाते हैं।
आगे और बढ़ेगी कमाई
शिशिर का कहना है कि पेड़ जैसे-जैसे और बड़े होते जाएंगे, उन पर फल की मात्रा भी उतनी ही बढ़ेगी और एक पेड़ की उपज प्रति पेड़ एक क्विंटल तक पहुंच सकती है। ऐसे में अंदाजा लगाया जा सकता है कि किसी भी परंपरागत फसल के मुकाबले मौसंबी की बागवानी किसान के लिए कितनी फायदेमंद साबित हो सकती है।
पौधा चुनते समय रखें यह ध्यान
शिशिर एक अहम सलाह भी देते हैं। उनका कहना है कि पौधा खरीदते वक्त इस बात का खास ध्यान रखें कि वैरायटी थाईलैंड की हो। उन्होंने खुद थाईलैंड वैरायटी की मौसंबी ही लगाई है। उनके अनुसार इस किस्म का स्वाद देसी मौसंबी की तुलना में कहीं अधिक मीठा होता है, जिससे बाजार में इसकी मांग और दाम दोनों बेहतर मिलते हैं।













