भारत में अक्सर यह गलतफहमी बनी रहती है कि परिवार के मुखिया की मृत्यु के बाद उनकी सारी चल-अचल संपत्ति पर केवल बेटों का अधिकार होता है। हालांकि, कानूनी दृष्टिकोण से स्थिति बिल्कुल अलग है। जब कोई व्यक्ति बिना किसी वसीयत के इस दुनिया से चला जाता है, तो देश के पारिवारिक कानूनों के तहत उसकी संपत्ति का बंटवारा होता है। इन कानूनों का मूल उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि मृतक पर निर्भर रहने वाले प्राथमिक वारिसों को उनका उचित हिस्सा मिले और भविष्य में कोई विवाद न उत्पन्न हो।
भारत एक विविधतापूर्ण देश है, इसलिए यहाँ संपत्ति के बंटवारे का कोई एक साझा कानून नहीं है। मृतक जिस धर्म से ताल्लुक रखता था, उसी के आधार पर उत्तराधिकार के नियम तय होते हैं। इसमें केवल बेटों को ही नहीं, बल्कि पत्नी, बेटी और मां को भी बराबर का हकदार माना जाता है। संपत्ति का मालिकाना हक किसी के नाम करने से पहले धर्म आधारित नियमों को समझना अनिवार्य है।
विभिन्न धर्मों के अनुसार उत्तराधिकार के नियम
हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 के तहत हिंदू, सिख, जैन और बौद्ध समुदाय आते हैं। इन धर्मों में यदि कोई व्यक्ति बिना वसीयत छोड़े मरता है, तो उसकी संपत्ति 'क्लास-1' के वारिसों में समान रूप से विभाजित की जाती है। इसमें मृतक की मां, पत्नी और सभी बेटे-बेटियां शामिल हैं। यदि परिवार में मां, एक बेटा और एक बेटी है, तो सभी को बराबर हिस्सा मिलता है। यदि कोई बेटा पहले ही दिवंगत हो चुका हो, तो उसका हिस्सा उसकी पत्नी और बच्चों के पास चला जाता है।
मुस्लिम पर्सनल लॉ शरिया के सिद्धांतों पर आधारित है। यहाँ पहले मृतक के कर्ज और अंतिम संस्कार का खर्च निकाला जाता है। इसके बाद, यदि बच्चे जीवित हैं, तो पत्नी को कुल संपत्ति का 1/8 हिस्सा यानी 12.5 प्रतिशत मिलता है। बची हुई संपत्ति में बेटे और बेटी का अनुपात 2:1 रखा गया है, जिसका मतलब है कि बेटे को बेटी के मुकाबले दोगुना हिस्सा प्राप्त होता है। यदि मृतक की केवल बेटियां ही हैं, तो नियम बदल जाते हैं, और यदि केवल बेटे हैं, तो पत्नी का हिस्सा अलग करने के बाद शेष संपत्ति बराबर बांट दी जाती है।
ईसाई और पारसी समुदाय के लिए भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 प्रभावी है। यहाँ यदि मृतक अपने पीछे पत्नी और बच्चे छोड़ता है, तो पत्नी को कुल संपत्ति का 1/3 हिस्सा मिलता है। शेष 2/3 हिस्सा सभी बच्चों में बराबर बांटा जाता है। इस कानून की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें बेटा हो या बेटी, सबको समान अधिकार दिए गए हैं, और कोई भेदभाव नहीं किया जाता है।
मालिकाना हक पाने के तीन महत्वपूर्ण रास्ते
जब परिवार में यह स्पष्ट हो जाता है कि किसे कितना हिस्सा मिलना है, तो संपत्ति को आधिकारिक तौर पर अपने नाम करवाने के लिए निम्नलिखित तीन विकल्पों का उपयोग किया जा सकता है:
पहला विकल्प लीगल हेयर सर्टिफिकेट प्राप्त करना है। इसमें सभी वारिसों को मिलकर स्थानीय राजस्व प्राधिकारी जैसे तहसीलदार या जिला न्यायालय में आवेदन करना होता है। यह प्रमाण पत्र यह सिद्ध करता है कि मृतक के असली उत्तराधिकारी कौन हैं। इसे प्राप्त करने के बाद, आपसी सहमति से सरकारी रिकॉर्ड में संपत्ति का म्यूटेशन यानी दाखिल-खारिज करवाना संभव होता है।
दूसरा तरीका पार्टीशन डीड है। यदि परिवार के सभी सदस्यों के बीच कोई विवाद नहीं है और सब आपसी रजामंदी से बंटवारा कर रहे हैं, तो एक पार्टीशन डीड तैयार की जाती है। इसमें स्पष्ट रूप से लिखा जाता है कि किस सदस्य को संपत्ति का कौन सा हिस्सा मिला है। इस दस्तावेज को सब-रजिस्ट्रार के कार्यालय में पंजीकृत करना अनिवार्य होता है, जिसके बाद प्रत्येक व्यक्ति अपने हिस्से का स्वतंत्र मालिक बन जाता है।
तीसरा विकल्प बंटवारे का मुकदमा या पार्टीशन सूट है। यदि आपसी सहमति नहीं बन पा रही है या कोई वारिस संपत्ति साझा करने से इनकार कर देता है, तो पीड़ित पक्ष को सिविल कोर्ट में पार्टीशन सूट दायर करना पड़ता है। अदालत दोनों पक्षों के साक्ष्यों और दस्तावेजों की जांच करती है। कानूनी प्रक्रिया पूरी होने के बाद, अदालत धर्म के अनुसार सबका हिस्सा तय करती है और अंतिम बंटवारे का आदेश पारित करती है, जिसे मानना सभी पक्षकारों के लिए बाध्यकारी होता है।













