झारखंड के बोकारो जिले के पेटरवार प्रखंड स्थित बांगा गांव के प्रगतिशील किसान पोरेश्वर महतो आज के समय में कृषि क्षेत्र में एक अनूठी मिसाल कायम कर रहे हैं। उन्होंने अपनी मेहनत और आधुनिक तौर-तरीकों के दम पर खेती को मुनाफे का सौदा बना लिया है। अपनी 50 डिसमिल जमीन पर उन्होंने ड्रिप इरीगेशन और मचान विधि का सफलतापूर्व उपयोग करते हुए बींस की खेती शुरू की है। सीमित संसाधनों और कम पानी के बावजूद उनका यह प्रयोग न केवल खुद उनके लिए वरदान साबित हो रहा है, बल्कि आसपास के अन्य किसानों को भी नगदी फसलों की ओर आकर्षित कर रहा है।
ओडिशा से लिया प्रशिक्षण और खेती को बनाया रोजगार
एक साधारण किसान परिवार में जन्मे पोरेश्वर महतो के लिए जीवन का रास्ता तय करना आसान नहीं था। जब उन्हें नौकरी की तलाश में सफलता नहीं मिली, तो उन्होंने हताश होने के बजाय खेती को ही अपना मुख्य करियर बनाने का पक्का इरादा कर लिया। अपनी इस सोच को अमली जामा पहनाने के लिए उन्होंने ओडिशा का रुख किया और वहां कृषि से जुड़ी आधुनिक तकनीकों का बारीकी से प्रशिक्षण लिया। वहां से लौटने के बाद उन्होंने अपने खेतों में मचान विधि और ड्रिप सिंचाई प्रणाली को लागू किया। इस आधुनिक बदलाव का सीधा असर उनकी फसल पर दिखा, जिससे उन्हें बींस और अन्य सब्जियों के बंपर उत्पादन के साथ-साथ शानदार कमाई भी होने लगी।
फसल चक्र और बंपर कमाई का गणित
पोरेश्वर महतो ने अपनी खेती के अनुभव को साझा करते हुए बताया कि उन्होंने जून महीने के अंतिम सप्ताह में बींस की बुआई की थी। इस फसल की सबसे बड़ी खूबी यह है कि रोपाई के महज 40 दिनों के भीतर ही यह पहली तुड़ाई के लिए पूरी तरह तैयार हो जाती है। इसके बाद किसान लगातार दो महीनों तक बींस की तुड़ाई करके बाजार में बेच सकते हैं। इस वैज्ञानिक और व्यवस्थित तरीके से खेती करने के कारण फसल एकमुश्त बेचने की मजबूरी खत्म हो जाती है और एक लंबे समय तक लगातार नियमित आमदनी होती रहती है, जिससे घर का खर्च और खेती का बजट दोनों संभल जाते हैं।
लागत, उत्पादन और मुनाफे का पूरा हिसाब
आधुनिक खेती के वित्तीय पहलुओं पर बात करते हुए पोरेश्वर महतो ने बताया कि 50 डिसमिल के प्लॉट में बींस उगाने के लिए कुल मिलाकर लगभग 40 हजार रुपये की लागत आती है। इस पूरे सीजन के दौरान इतनी ही जमीन से करीब 50 क्विंटल तक की शानदार पैदावार मिल जाती है। स्थानीय बाजारों में बींस का सामान्य थोक या खुदरा मूल्य 50 से 60 रुपये प्रति किलोग्राम के आसपास बना रहता है। इस तरह से यदि पैदावार अच्छी हो और बाजार में सही भाव मिल जाए, तो कुल बिक्री का आंकड़ा ढाई लाख रुपये तक पहुंच जाता है। ढुलाई, कीटनाशक और अन्य कृषि खर्चों को अलग करने के बाद भी किसान आसानी से 2 लाख रुपये तक का शुद्ध मुनाफा अपनी जेब में डाल सकते हैं।
कीट प्रबंधन और किसानों के लिए जरूरी सलाह
सफल पैदावार के साथ-साथ फसलों की सुरक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। पोरेश्वर महतो ने अन्य किसान भाइयों को यह खास सलाह दी है कि बींस की फसल पर कई बार लाल मकड़ी जैसे हानिकारक कीटों का हमला हो जाता है, जिससे पौधे को नुकसान पहुंचता है। इसके अलावा पत्तियों के सिकुड़ने जैसी समस्याएं भी देखने को मिल सकती हैं, जो पैदावार को घटा सकती हैं। ऐसी किसी भी आपात स्थिति से निपटने के लिए स्थानीय कृषि विशेषज्ञों से तुरंत संपर्क करना चाहिए और उनकी सलाह के अनुसार ही सही कीटनाशक दवाओं का छिड़काव करना चाहिए। यदि समय रहते फसल की निगरानी की जाए और सही बचाव के उपाय अपनाए जाएं, तो किसान किसी भी बड़े नुकसान से बच सकते हैं और बंपर पैदावार लेकर मालामाल हो सकते हैं।



















