पिछले कुछ समय से पड़ोसी देश बांग्लादेश के रवैये में आए बदलाव के बाद अब दोनों मुल्कों के बीच आर्थिक रिश्तों को नई दिशा मिलने की उम्मीद बंध गई है। भारतीय हाई कमिश्नर दिनेश त्रिवेदी और बांग्लादेश के वाणिज्य, उद्योग, कपड़ा एवं जूट मंत्री खांडकर अब्दुल मुक्तादिर के बीच हुई उच्चस्तरीय बैठक में आपसी व्यापार को आगे बढ़ाने पर सहमति जताई गई है। राजनीति के मोर्चे पर दूरी बनाने की कोशिशों के बाद अब आर्थिक हकीकत ने ढाका को अपने कदम पीछे खींचने पर मजबूर कर दिया है, जिससे दोनों अर्थव्यवस्थाओं के बीच एक बार फिर से पुराने व्यावसायिक समीकरणों के लौटने के आसार बन गए हैं।
आर्थिक तंगी और पड़ोसी का बदलता रुख
भारत के खिलाफ लगातार तीखे तेवर दिखाने और पाकिस्तान के साथ नजदीकियां बढ़ाने के बाद से ही बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था पर भारी दबाव बनने लगा था। दोनों देशों की साझा सीमाएं होने के कारण वहां के बाजारों के लिए भारतीय सामानों की आवाजाही बेहद सुगम और किफायती रही है, लेकिन राजनीतिक कारणों से कई क्षेत्रों में आयात रोक दिया गया था। चीन और पाकिस्तान के प्रभाव में आकर उठाए गए इन कदमों का नतीजा यह निकला कि ग्लोबल मार्केट के बढ़ते दबाव के बीच बांग्लादेश भयंकर आर्थिक संकट में फंस गया। यही मुख्य वजह है कि जिन मुद्दों पर पहले बातचीत से मुंह मोड़ा जा रहा था, उन्हीं मामलों पर अब खुद बांग्लादेशी हुक्मरानों ने पहल करना बेहतर समझा है।
व्यापार संतुलन और निर्यात के आंकड़े
भारत और बांग्लादेश के बीच के व्यापारिक आंकड़ों पर नजर डालें तो हमेशा से भारतीय पक्ष का पलड़ा भारी रहा है। सब कुछ सामान्य रहने के दौरान वित्तवर्ष 2024-25 में दोनों देशों के बीच लगभग 13.7 अरब डॉलर यानी करीब 1.31 लाख करोड़ रुपये का कुल कारोबार दर्ज किया गया था। इस कुल आंकड़े में अकेले 11.38 अरब डॉलर का निर्यात भारत की तरफ से किया गया था, जबकि महज 2.33 अरब डॉलर का आयात हुआ था। इस तरह भारत के पक्ष में ट्रेड सरप्लस करीब 9 अरब डॉलर का रहा था। अगर दोनों पड़ोसी मुल्क अपने व्यापारिक रिश्तों को पूरी तरह सामान्य कर लेते हैं, तो इस भारी-भरकम फायदे का बड़ा हिस्सा सीधे तौर पर भारत की झोली में ही गिरेगा।
कच्चे माल की सप्लाई और भारतीय उत्पादों का दबदबा
क्षेत्रीय क्षेत्रफल के लिहाज से छोटा होने के बावजूद बांग्लादेश दक्षिण एशिया में भारत का सबसे बड़ा कमर्शियल पार्टनर बना हुआ है। भारतीय उत्पादों की खपतः केवल खुदरा उपभोक्ता बाजारों तक सीमित नहीं है, बल्कि वहां के बड़े निर्यात उद्योगों के लिए कच्चे माल का काम करती है। हमारे यहां से जाने वाली कपास, अलग-अलग तरह के रसायन, इंडस्ट्रियल मशीनरी और ईंधन का इस्तेमाल वहां की गारमेंट फैक्टरियों में फाइनल प्रोडक्ट तैयार करने में होता है। जानकारों का मानना है कि यदि कारोबार पुराने ट्रैक पर लौटता है तो भारत का कुल निर्यात आसानी से 12 से 14 अरब डॉलर के ऊंचे स्तर को छू सकता है।
व्यापार घाटे की चुनौती और गेहूं निर्यात पर राहत
बांग्लादेश के लिए भारत के साथ व्यापार घाटा हमेशा से एक बड़ी चुनौती रहा है, और वित्तवर्ष 2025 में उसे लगभग 9 अरब डॉलर का घाटा उठाना पड़ा था। इसके बावजूद रिश्तों की बहाली से उसे औद्योगिक कल-कारखानों के लिए जरूरी कच्चे माल, रोजमर्रा की खाद्य सामग्री और जरूरी उपभोक्ता वस्तुओं की आपूर्ति बिना किसी बाधा के मिलने लगेगी। हाल ही में भारत सरकार द्वारा 25 अगस्त को गेहूं और उससे जुड़े उत्पादों के निर्यात पर से पाबंदी हटाए जाने का कदम इस दिशा में बेहद अहम साबित हो सकता है, क्योंकि वहां इन अनाजों की हमेशा भारी मांग बनी रहती है।
जूट कारोबार और भारत की जरूरतें
जहां एक तरफ भारत अधिकांश औद्योगिक सामान बांग्लादेश को भेजता है, वहीं जूट के मामले में स्थिति बिल्कुल उलट है और भारत उसका बड़ा खरीदार बना हुआ है। भारत ने साल 2024 तक वहां से करीब 1.28 लाख टन जूट खरीदा था, जिसकी कुल वित्तीय कीमत करीब 87 करोड़ डॉलर बैठती है। देश के भीतर पश्चिम बंगाल, बिहार और असम जैसे राज्यों में भारी मात्रा में जूट का उत्पादन होने के बावजूद वह कुल मांग को पूरा करने के लिए नाकाफी साबित होता है। यही कारण है कि भारतीय जूट उद्योगों को मजबूरन महंगी दरों पर आयात करना पड़ता है, और यदि पड़ोसी देश के साथ सप्लाई चेन दुरुस्त होती है तो भारत का यह आयात बढ़कर 2 लाख टन तक पहुंच सकता है।



















