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डॉलर से दूरी बना रहे दुनिया के केंद्रीय बैंक, नए सर्वे में सामने आया बड़ा रुझानव्यापार
2 घंटे पहले· 2

डॉलर से दूरी बना रहे दुनिया के केंद्रीय बैंक, नए सर्वे में सामने आया बड़ा रुझान

10 ट्रिलियन डॉलर की संपत्ति संभालने वाले 90 संस्थानों के एक सर्वे में पता चला है कि केंद्रीय बैंक पहले से ज़्यादा तेज़ी से अमेरिकी डॉलर से हटकर यूरो, युआन और सोने जैसी दूसरी संपत्तियों की ओर जा रहे हैं।

अमित पटेलअमित पटेलबिज़नेस संवाददाता 2 मिनट पढ़ें AI के लिए
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दुनिया भर के केंद्रीय बैंक अब पहले से कहीं ज़्यादा संख्या में अमेरिकी डॉलर से किनारा करने लगे हैं, और इससे 'डी-डॉलराइज़ेशन' यानी डॉलर पर घटती निर्भरता की चर्चा एक बार फिर तेज़ हो गई है। आधिकारिक मौद्रिक एवं वित्तीय संस्थान मंच (OMFIF) की एक ताज़ा रिपोर्ट में यह तस्वीर साफ़ हुई है। इस रिपोर्ट के लिए 90 केंद्रीय बैंकों, सॉवरेन वेल्थ फंड और पेंशन फंड से बात की गई, जो मिलकर करीब 10 ट्रिलियन डॉलर की संपत्ति संभालते हैं। सर्वे में शुद्ध रूप से डॉलर से पैसा हटने का रुझान दिखा। ये बैंक अब यूरो, युआन, ब्रिटिश पाउंड, नॉर्वेजियन क्रोना और न्यूज़ीलैंड डॉलर की तरफ़ ज़्यादा दिलचस्पी दिखा रहे हैं।

आख़िर डॉलर से मुंह क्यों मोड़ रहे हैं केंद्रीय बैंक?

रिपोर्ट के मुताबिक 82 फ़ीसदी केंद्रीय बैंकों के पास पहले से सोना मौजूद है, और इनमें से 30 फ़ीसदी अपने सोने के भंडार को और बढ़ाने की योजना बना रहे हैं। इसकी बड़ी वजह भू-राजनीतिक तनाव के इस दौर में अपने निवेश को बिखेरना यानी पोर्टफोलियो डायवर्सिफिकेशन बताया गया है। इसके अलावा बैंकों ने अमेरिकी नीतियों की अनिश्चितता, संभावित प्रतिबंधों और डॉलर को हथियार की तरह इस्तेमाल किए जाने को भी अपने इस फ़ैसले के पीछे की वजह बताया है।

चिंता की एक और बड़ी वजह अमेरिका का लगातार बढ़ता कर्ज़ है, जो अब 40 ट्रिलियन डॉलर के आंकड़े के करीब पहुंच रहा है। अमेरिका के भारी-भरकम घाटे और उधारी का यह पैमाना डॉलर की एक रिज़र्व संपत्ति के तौर पर लंबे समय की स्थिरता पर सवाल खड़े कर सकता है।

ब्लैकरॉक ने भी दी चेतावनी

दुनिया की सबसे बड़ी एसेट मैनेजमेंट कंपनी ब्लैकरॉक ने भी ऐसी ही राय दोहराई है। शेयरधारकों को लिखे एक पत्र में ब्लैकरॉक के CEO लैरी फिंक ने कहा कि हो सकता है कि आगे चलकर अमेरिकी डॉलर दुनिया की सबसे दबदबे वाली मुद्रा न रहे। फिंक ने ख़ासतौर पर अमेरिकी कर्ज़ को इसकी एक बड़ी वजह बताया। उन्होंने यह भी कहा कि बिटकॉइन (BTC) जैसी डिजिटल मुद्राएं आने वाले समय में दुनिया की अगली रिज़र्व करेंसी बन सकती हैं।

पुरानी है डॉलर से दूरी की यह मुहिम

डॉलर से किनारा करने का यह चलन कोई नई बात नहीं है। ज़्यादा से ज़्यादा देश अब अमेरिकी डॉलर और अमेरिकी दबदबे पर भरोसा खोते जा रहे हैं। प्रतिबंधों और डॉलर को हथियार की तरह इस्तेमाल करने की वजह से कई देश इस मुद्रा में निवेश करने से कतराने लगे हैं। चीन, ईरान, रूस और दक्षिण कोरिया जैसे देश तो पहले ही युआन और क्रिप्टोकरेंसी के सहारे डॉलर से बाहर का एक अलग सिस्टम खड़ा कर चुके हैं। अब ऐसा लग रहा है कि दुनिया भर के केंद्रीय बैंक भी धीरे-धीरे डॉलर से आगे बढ़ रहे हैं।

इसका आप पर असर

  • निवेशकों के लिए: केंद्रीय बैंकों का डॉलर से हटना लंबे समय में डॉलर को कमज़ोर और सोने की मांग को मज़बूत कर सकता है, इसलिए सोने और दूसरी मुद्राओं वाले पोर्टफोलियो पर असर पड़ सकता है।
  • आम पाठक के लिए: डॉलर पर घटता भरोसा वैश्विक मुद्रा बाज़ार में उतार-चढ़ाव बढ़ा सकता है, जिसका असर आयात-निर्यात और तेल जैसी चीज़ों की कीमतों पर पड़ सकता है।

सवाल-जवाब

OMFIF के सर्वे में कितने संस्थानों को शामिल किया गया?
इस सर्वे में 90 केंद्रीय बैंक, सॉवरेन वेल्थ फंड और पेंशन फंड शामिल थे, जो मिलकर करीब 10 ट्रिलियन डॉलर की संपत्ति संभालते हैं।
केंद्रीय बैंक अब किन मुद्राओं की ओर जा रहे हैं?
रिपोर्ट के मुताबिक बैंक यूरो, युआन, ब्रिटिश पाउंड, नॉर्वेजियन क्रोना और न्यूज़ीलैंड डॉलर की ओर ज़्यादा रुझान दिखा रहे हैं।
कितने केंद्रीय बैंकों के पास सोना है और कितने इसे बढ़ाना चाहते हैं?
82 फ़ीसदी केंद्रीय बैंकों के पास पहले से सोना है, और इनमें से 30 फ़ीसदी अपने सोने के भंडार को और बढ़ाने की योजना बना रहे हैं।
अमेरिका का कर्ज़ इस मामले में क्यों अहम है?
अमेरिका का कर्ज़ 40 ट्रिलियन डॉलर के करीब पहुंच रहा है, और इतना बड़ा घाटा व उधारी डॉलर की रिज़र्व संपत्ति के तौर पर स्थिरता पर सवाल खड़े करते हैं।
लैरी फिंक ने डॉलर को लेकर क्या कहा?
ब्लैकरॉक के CEO लैरी फिंक ने कहा कि डॉलर शायद दुनिया की सबसे दबदबे वाली मुद्रा न रहे, और बिटकॉइन जैसी डिजिटल मुद्राएं अगली रिज़र्व करेंसी बन सकती हैं।
किन देशों ने पहले से डॉलर से बाहर सिस्टम बना लिया है?
चीन, ईरान, रूस और दक्षिण कोरिया जैसे देश युआन और क्रिप्टोकरेंसी के सहारे डॉलर से बाहर का सिस्टम पहले ही खड़ा कर चुके हैं।
अमित पटेल
लेखक के बारे मेंअमित पटेलबिज़नेस संवाददाता दिल्ली
विशेषज्ञताबिज़नेस समाचार, वित्तीय बाज़ार, शेयर बाज़ार विश्लेषण, कॉर्पोरेट मामले, स्टार्टअप, उद्यमिता, आर्थिक रुझान, टेक्नोलॉजी बिज़नेस, निवेश, वैश्विक अर्थव्यवस्था

अमित पटेल एक बिज़नेस संवाददाता हैं जो वैश्विक बाज़ार, वित्त, स्टार्टअप, तकनीक और आर्थिक रुझानों को कवर करते हैं। वे आधुनिक अर्थव्यवस्था को आकार देने वाले कारोबार और उद्योगों की ख़बरें, बाज़ार विश्लेषण और अंतर्दृष्टि देते हैं।

अमित पटेल एक बिज़नेस संवाददाता हैं जो वैश्विक बाज़ार, वित्त, उद्यमिता, तकनीक और आर्थिक घटनाक्रमों को कवर करते हैं। वे ब्रेकिंग बिज़नेस न्यूज़, कॉर्पोरेट रणनीतियों, शेयर बाज़ार के रुझानों, स्टार्टअप इकोसिस्टम और वैश्विक अर्थव्यवस्था को आकार देने वाले औद्योगिक नवाचारों पर रिपोर्ट करते हैं। सटीकता, स्पष्टता और गहन विश्लेषण पर ज़ोर देते हुए अमित पाठकों को जटिल कारोबारी विषयों और उनके वास्तविक असर को समझने में मदद करते हैं। उनकी कवरेज वित्तीय बाज़ार, बहुराष्ट्रीय कंपनियों, उभरते उद्योगों, आर्थिक नीति, निवेश रुझानों और डिजिटल बदलाव तक फैली है।

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