देश में मानसूनी बारिश के कमजोर पड़ने से आने वाले दिनों में सूखे और अनाज के गंभीर संकट की आशंका गहराने लगी है। मौसम विभाग की तरफ से जारी ताजा आंकड़ों के मुताबिक खरीफ की फसलें खेतों में लहलहा रही हैं, लेकिन पर्याप्त पानी न मिलने की वजह से धान जैसी प्रमुख फसलों को भारी नुकसान पहुंच सकता है। इस स्थिति का सीधा असर देश की कृषि व्यवस्था और अंततः पूरी अर्थव्यवस्था पर पड़ने की पूरी संभावना है, क्योंकि समय पर बारिश न होना खेती-किसानी के लिए बड़ा झटका साबित होता है।
कमजोर मानसून का दौर और आगामी दो हफ्तों का अनुमान
सामान्य तौर पर जब मानसून अपने चरम सक्रिय दौर में होता है, ठीक उसी समय देश के कई हिस्सों में बारिश का ग्राफ नीचे गिर रहा है। भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के पूर्वानुमान के अनुसार आगामी कम से कम दो सप्ताह यानी 2 सितंबर तक देश भर में मानसूनी बारिश सामान्य स्तर से काफी नीचे दर्ज की जाएगी। शनिवार तक के आंकड़ों पर नजर डालें तो देश में कुल मानसूनी बारिश अपने दीर्घकालिक औसत यानी एलपीए से 14 प्रतिशत कम आंकी गई थी, और आने वाले दिनों में इस आंकड़े में और अधिक गिरावट आने की आशंका जताई जा रही है।
मानसून ट्रफ की स्थिति और क्षेत्रीय असमानता
मौसम विभाग का यह भी कहना है कि मानसून ट्रफ के अपनी सामान्य जगह से खिसककर हिमालय की तलहटी के पास टिके रहने की वजह से मध्य भारत में बारिश की गतिविधियां बेहद सुस्त बनी हुई हैं। मानसून की इस अनिश्चित चाल ने रबी फसलों की बुआई को लेकर भी चिंता बढ़ा दी है। पिछले कुछ हफ्तों के दौरान देश के तमाम इलाकों में सर्दियों की फसलों की बुआई का काम शुरू हो चुका है, ऐसे में बारिश की कमी के कारण मिट्टी की नमी और फसल के शुरुआती विकास पर बुरा असर पड़ सकता है। मौसम प्रणालियों के सक्रिय होने के बावजूद विभाग ने स्पष्ट किया है कि पूर्वानुमान अवधि के दोनों हफ्तों में पूरे देश में बारिश सामान्य से कम ही रिकॉर्ड की जाएगी।
पूर्वोत्तर और प्रायद्वीपीय भारत का विरोधाभास
एक तरफ जहां हिमालयी क्षेत्र के साथ-साथ पूर्वोत्तर और पूर्वी भारत के कुछ हिस्सों में भारी से बहुत भारी बारिश होने की संभावना लगातार बनी हुई है, वहीं दूसरी तरफ प्रायद्वीपीय भारत में आने वाले सप्ताह के दौरान भी बारिश की गतिविधियां कमजोर रहने का ही अनुमान है। उत्तर बंगाल की खाड़ी में पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश के तटीय इलाकों के पास अगले 24 घंटों के भीतर एक कम दबाव का नया क्षेत्र बनने के पूरे आसार हैं। इस मौसमी हलचल के प्रभाव से ओडिशा और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में 26 अगस्त तक भारी से बहुत भारी बारिश हो सकती है, जबकि देश के बाकी हिस्सों में हालात इसके विपरीत बने रहेंगे।
मौसम विशेषज्ञों का मानना है कि मानसून ट्रफ का मौजूदा स्थान इस समय सबसे बड़ी चिंता का विषय बना हुआ है। ट्रफ के हिमालयी क्षेत्र और पूर्वोत्तर तक ही सीमित रह जाने की वजह से देश के बाकी बचे हिस्सों में होने वाली बारिश बुरी तरह प्रभावित हो रही है। जानकारों के अनुसार इस ट्रफ के कम से कम एक सप्ताह तक हिमालय की तलहटी के आसपास ही टिके रहने की प्रबल संभावना है, जिससे राहत की उम्मीद फिलहाल दूर नजर आ रही है।
मध्य भारत में बारिश की कमी और स्काईमेट के आंकड़े
विशेष तौर पर अगस्त के महीने में मानसून ट्रफ का दक्षिण दिशा की तरफ खिसकना मध्य भारत में व्यापक और समान बारिश के लिए बेहद जरूरी माना जाता है। इस बार ट्रफ के मध्य भारत की तरफ न बढ़ पाने के कारण वे इलाके सबसे ज्यादा संकट का सामना कर रहे हैं, जहां खेती के लिए पानी की सबसे ज्यादा आवश्यकता होती है। इसी बीच निजी मौसम पूर्वानुमान एजेंसी स्काईमेट वेदर ने सोमवार को अपने पूरे सीजन के मानसूनी अनुमान में काफी बड़ी कटौती कर डाली है। एजेंसी ने अब देश भर में पूरे मानसूनी सीजन के दौरान बारिश का स्तर एलपीए का केवल 85 प्रतिशत रहने की बात कही है, जबकि बीते अप्रैल के महीने में उनका यह अनुमान 94 प्रतिशत तक जताया गया था।
इसके अलावा स्काईमेट ने देश के भीतर सूखे के हालात पैदा होने की 70 प्रतिशत तक संभावना जता दी है। एजेंसी का साफ कहना है कि अगस्त के बचे हुए दिनों में देश के चारों समरूप वर्षा क्षेत्रों के भीतर बारिश का वितरण बेहद असमान रह सकता है, और सितंबर के महीने में भी इस स्थिति के सुधरने के बजाय और अधिक बिगड़ने की आशंका है। इस पूरे संकट के पीछे मुख्य रूप से मजबूत होते अल नीनो और कमजोर भारतीय महासागर द्विध्रुव यानी आईओडी को जिम्मेदार ठहराया गया है। हालांकि एक सकारात्मक आईओडी आमतौर पर अल नीनो के बुरे असर को कुछ हद तक संभाल लेता है, लेकिन इस बार वह मानसून को बचाने के लिए पर्याप्त समर्थन प्रदान करने में नाकाम साबित हो रहा है।
देशभर में बारिश के आंकड़े और ऐतिहासिक कटौतियां
वर्षा की यह कमी पहले से ही देश के अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों में काफी असमान रूप से फैली हुई है। पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत के अंदर बारिश अपने सामान्य स्तर से 26 प्रतिशत कम दर्ज की गई है, जबकि दक्षिणी प्रायद्वीप में भी 23 प्रतिशत की भारी कमी रिकॉर्ड की जा चुकी है। उत्तर-पश्चिम भारत में बारिश का आंकड़ा 11 प्रतिशत कम है, वहीं मध्य भारत की स्थिति इन सभी के मुकाबले थोड़ी बेहतर जरूर है जहां कमी मात्र तीन प्रतिशत के आसपास है। स्काईमेट का यह नया अनुमान पिछले कुछेक वर्षों के दौरान मौसम के पूर्वानुमान में की गई सबसे बड़ी मध्य-मौसम कटौतियों में शुमार किया जा रहा है।
अप्रैल के 94 प्रतिशत वाले अनुमान से गिरकर यह सीधे नौ प्रतिशत अंक नीचे आ चुका है। दूसरी तरफ आईएमडी ने भी अपने अप्रैल के 92 प्रतिशत के अनुमान को घटाकर जून के महीने में 90 प्रतिशत एलपीए कर दिया था, हालांकि उसके बाद विभाग की तरफ से कोई आधिकारिक नया संशोधन जारी नहीं किया गया है। तमाम विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि बारिश की मौजूदा कमी और सितंबर की शुरुआत तक किसी भी राहत के न मिलने का अनुमान आईएमडी के 90 प्रतिशत वाले आंकड़े पर भी भारी दबाव बना सकता है।
कृषि क्षेत्र के लिहाज से देखा जाए तो इस स्थिति का सबसे बुरा असर उन फसलों पर पड़ेगा जो पूरी तरह से बारिश के पानी पर निर्भर करती हैं। जानकारों के मुताबिक मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, राजस्थान और गुजरात जैसे अहम वर्षा आधारित कृषि क्षेत्रों में 2026 का मानसून पहले ही काफी असमान रहा है। उनका यह भी मानना है कि बारिश की यह कमी आगे चलकर 15 प्रतिशत के आंकड़े को भी पार कर सकती है, जिसके चलते अरहर, सोयाबीन और मक्का जैसी प्रमुख फसलों पर विशेष निगरानी रखने और उनकी पैदावार का नए सिरे से आकलन करने की सख्त जरूरत आन पड़ी है।
विशेषज्ञों की यह चेतावनी साफ इशारा करती है कि मानसून की यह अनिश्चितता और बारिश की निरंतर कमी आने वाले दिनों में देश के अंदर खाद्य महंगाई को खतरनाक स्तर तक बढ़ा सकती है। इसके अलावा वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में रूस-यूक्रेन क्षेत्र से आने वाले कार्गो की भारी कमी और लॉजिस्टिक स्तर पर पेश आ रही बाधाएं कमजोर मानसून की इस स्थिति को और अधिक चुनौतीपूर्ण बना रही हैं। ऐसे समय में सरकार के सामने सप्लाई चेन को सुचारू और नियंत्रित बनाए रखना सबसे बड़ी प्राथमिकता होना चाहिए ताकि आम जनता को भारी मुसीबतों से बचाया जा सके।
अल नीनो का बढ़ता प्रकोप और वैश्विक तापमान
मानसून की सेहत पर सबसे ज्यादा दबाव बनाने वाला अल नीनो फैक्टर दिन-प्रतिदिन और अधिक मजबूत होता जा रहा है। ब्रिटेन के मौसम विभाग के द्वारा दी गई जानकारी के मुताबिक यह मौसमी घटना पिछले एक सदी से भी अधिक समय में सबसे शक्तिशाली अल नीनो के रूप में तब्दील होने की पूरी राह पर आगे बढ़ रही है। प्रशांत महासागर की समुद्री सतह का तापमान अपने सामान्य स्तर से तीन डिग्री सेल्सियस से भी ज्यादा ऊपर जाने की आशंका जताई जा रही है, जिसका सीधा और बड़ा असर पूरी दुनिया के तापमान पर पड़ना तय है।
इस भारी बदलाव के कारण आने वाले साल 2027 के अब तक के सबसे गर्म वर्षों में गिने जाने की संभावना काफी ज्यादा बढ़ गई है। यही वजह है कि कमजोर मानसून अब केवल देश में बारिश के कम होने तक सीमित कोई आम मामला नहीं रह गया है, बल्कि यह वैश्विक जलवायु परिवर्तन और भविष्य की बड़ी खाद्य सुरक्षा से जुड़ी एक बेहद डरावनी तस्वीर पेश कर रहा है।



















