रक्षाबंधन का पावन पर्व भाई और बहन के बीच अपार स्नेह, अटूट विश्वास और सुरक्षा के पवित्र बंधन का प्रतीक है। इस साल रक्षाबंधन का त्योहार 28 अगस्त, शुक्रवार को मनाया जाएगा। इस खास दिन बहनें अपने भाई की कलाई पर रक्षासूत्र सजाकर उनकी दीर्घायु, अच्छे स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की प्रार्थना करती हैं, जबकि भाई उनकी आजीवन रक्षा करने का संकल्प लेते हैं। जैसे-जैसे समय बदल रहा है, बाजारों में डिजाइनर, फैंसी और महंगी राखियों की लंबी कतारें देखने को मिलती हैं। हालांकि सनातन धर्म के धार्मिक ग्रंथों और परंपराओं में राखी की भौतिक कीमत या उसकी चमक-धमक को कोई खास तवज्जो नहीं दी गई है, बल्कि इसके पीछे छिपे पवित्र भाव को ही सबसे बड़ा माना गया है। आइए विस्तार से जानते हैं कि शास्त्रों में राखी को लेकर क्या नियम और मान्यताएं तय की गई हैं।
भाई-बहन के प्रेम का अमूल्य और पवित्र धागा
रक्षाबंधन के दिन केवल भाई की कलाई को सजाना ही इस उत्सव का उद्देश्य नहीं होता है। रक्षासूत्र का सीधा संबंध भाई की मंगलकामना और बहन की सुरक्षा के संकल्प से जुड़ा होता है। आज के बाजारवादी दौर में लोग त्योहारों की चमक में उनके मूल आध्यात्मिक अर्थों को पीछे छोड़ते जा रहे हैं, और बाजार में मिलने वाली राखियां भी इस बदलाव से अछूती नहीं रही हैं। ऐसे समय में हमारे शास्त्रों में मौजूद दिशा-निर्देश आम जनमानस को सही और सार्थक मार्ग दिखाते हैं। यही वजह है कि राखी चाहे जितनी अधिक महंगी या बेहद आकर्षक क्यों न हो, यह कतई जरूरी नहीं कि धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से भी वह उतनी ही अधिक महत्वपूर्ण हो।
रक्षासूत्र में तीन रंगों और चंदन का खास महत्व
सनातन धर्म के शास्त्रों के मुताबिक रेशम या फिर सूती धागे से तैयार किया गया रक्षासूत्र सबसे ज्यादा शुभ और फलदायी माना जाता है। पारंपरिक रूप से इस पवित्र धागे में लाल, पीले और सफेद रंग के प्रयोग की परंपरा रही है। इन तीनों ही रंगों को क्रमशः ब्रह्मा, विष्णु और महेश यानी त्रिदेवों से जोड़ा जाता है। यदि तीनों रंग एक साथ उपलब्ध न हो सकें, तो केवल लाल और पीले रंग के धागों से भी रक्षासूत्र तैयार कर बांधने की पुरानी परंपरा चली आ रही है। इसके अलावा, राखी में चंदन के छोटे टुकड़ों या लेप का इस्तेमाल करना भी बेहद शुभ माना गया है। चंदन को हमेशा से पवित्रता, शीतलता और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक माना गया है। यही कारण है कि चंदनयुक्त रक्षासूत्र भाई के जीवन के लिए बेहद मंगलकारी और कल्याणकारी माना जाता है।
रुद्राक्ष, तुलसी और सोने-चांदी की राखियों के नियम
बाजार में मिलने वाली आधुनिक राखियों के अलावा रुद्राक्ष और तुलसी से निर्मित राखियां भी सीधे तौर पर हमारी धार्मिक भावनाओं से जुड़ी हुई मानी जाती हैं। रुद्राक्ष का गहरा संबंध भगवान शिव से और तुलसी का सीधा जुड़ाव भगवान विष्णु से माना जाता है, इसलिए ऐसे पवित्र रक्षासूत्र पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ भाई को बांधे जा सकते हैं। वहीं बात अगर महंगी धातुओं की करें तो यदि कोई अपनी सामर्थ्य के अनुसार सोने या चांदी की राखी बांधना चाहता है, तो पहले पारंपरिक सूती या रेशम का रक्षासूत्र बांधने की पुरानी परंपरा को अपनाना चाहिए। इसके बाद यदि आप सोने या चांदी जैसी कीमती धातुओं से बनी राखी या कोई अन्य उपहार लाई हैं, तो उसे पहनाया जा सकता है। ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार सोने का सीधा संबंध सूर्य ग्रह से और चांदी का संबंध चंद्रमा से माना गया है।
किन चीजों से बनी राखियों का इस्तेमाल करने से बचना चाहिए
त्योहार के दौरान राखी का चुनाव करते समय इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि उसमें प्लास्टिक या फिर ऐसी किसी भी सामग्री का प्रयोग न किया गया हो जिसे धार्मिक दृष्टि से अशुद्ध या वर्जित माना जाता है। खासतौर पर किसी भी ऐसी राखी को खरीदने से बचना चाहिए जिसमें चमड़े या उससे मिलती-जुलती सामग्री का उपयोग किया गया हो, क्योंकि इससे त्योहार की पवित्रता प्रभावित होती है। बाजार में मिलने वाली साधारण मौली या सामान्य कलावा को भी अगर पूरी श्रद्धा और सच्चे मन के साथ भाई की कलाई पर बांधा जाए, तो वह भी उतनी ही फलदायी होती है। शास्त्रों में बार-बार यही समझाया गया है कि राखी के बाजार मूल्य से कहीं ज्यादा उसके पीछे जुड़ी हुई भावना और पवित्र संकल्प का मोल होता है।


















