उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले सहित विभिन्न ग्रामीण क्षेत्रों में किसान और पशुपालक मुर्गी पालन को अपनी अतिरिक्त आय का एक प्रमुख साधन बना रहे हैं। कम लागत, सीमित जगह और न्यूनतम संसाधनों में शुरू होने वाले इस व्यवसाय से बेहतर मुनाफा कमाया जा सकता है। हालांकि, मुर्गी पालन में थोड़ी सी भी लापरवाही पोल्ट्री फार्म में भयंकर बीमारियां फैला सकती है, जिससे पशुपालकों को भारी आर्थिक नुकसान का सामना करना पड़ता है। फ्लॉक को बीमारियों से सुरक्षित रखने और उनका बेहतर विकास सुनिश्चित करने के लिए साफ-सफाई, शेड का सही ढांचा, पौष्टिक आहार तथा स्वच्छ पेयजल की निरंतर उपलब्धता बेहद आवश्यक होती है। इस संदर्भ में गोंडा के उप मुख्य पशु चिकित्सा अधिकारी डॉ. राकेश कुमार तिवारी ने मुर्गियों को पूरी तरह स्वस्थ रखने और पोल्ट्री व्यवसाय को सफल बनाने के लिए 5 बेहद महत्वपूर्ण उपाय साझा किए हैं।
मुर्गी घर की सही दिशा और जमीन से ऊंचाई
मुर्गी पालन की सफलता में उनके रहने के स्थान यानी मुर्गी घर की बनावट की प्राथमिक भूमिका होती है। यदि शेड के भीतर लगातार नमी बनी रहे, गंदगी एकत्र हो या ताजी हवा का प्रवाह कम हो, तो मुर्गियों में संक्रामक बीमारियों का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। उप मुख्य पशु चिकित्सा अधिकारी डॉ. राकेश कुमार तिवारी के अनुसार, मुर्गी घर का निर्माण हमेशा जमीन की सतह से लगभग 2 फीट की ऊंचाई पर किया जाना चाहिए। जमीन से ऊपर शेड बनाने से मिट्टी की नमी और धरातल की गंदगी मुर्गियों के सीधे संपर्क में नहीं आती है। इसके अलावा, मुर्गी घर को पूर्व से पश्चिम दिशा में निर्मित करना चाहिए। इस दिशा में शेड बनाने से हवा का प्राकृतिक आवागमन सुगम रहता है, जिससे अंदर का तापमान संतुलित रहता है और हानिकारक गैसें बाहर निकल जाती हैं।
दैनिक स्वच्छता और सूखी बिछावन का प्रबंधन
पोल्ट्री फार्म में संक्रामक जीवाणुओं और विषाणुओं के फैलाव को रोकने के लिए दैनिक आधार पर साफ-सफाई करना अनिवार्य है। मुर्गी घर के फर्श पर जमा होने वाली बीट, झड़े हुए पंख और अन्य अवशिष्ट पदार्थों को प्रतिदिन बाहर निकाल देना चाहिए। मुर्गियों के बैठने और रहने के लिए बिछाई जाने वाली बिछावन की स्थिति पर हर समय नजर रखना जरूरी है। यदि बिछावन में किसी भी कारण से नमी या गीलापन आ जाए, तो उसे तुरंत हटाकर सूखी बिछावन डालनी चाहिए। गीली सतह पर लंबे समय तक रहने से मुर्गियों के पैरों, त्वचा और श्वसन तंत्र में गंभीर संक्रमण पनपने का जोखिम रहता है। स्वच्छता बनाए रखकर मुर्गियों की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बनाए रखा जा सकता है।
पौष्टिक दाना और शुद्ध पेयजल की व्यवस्था
मुर्गियों के तेजी से विकास और उनकी शारीरिक सुरक्षा के लिए हमेशा ताजा तथा संतुलित आहार ही देना चाहिए। बासी, सड़ा-गला या फफूंद युक्त दाना मुर्गियों के पाचन तंत्र को बुरी तरह प्रभावित कर सकता है और इससे पूरे फार्म में विषाक्तता फैल सकती है। दाने को हमेशा नमी से मुक्त, पूरी तरह सूखी और साफ जगह पर संग्रहित करना चाहिए। इसके साथ ही, मुर्गियों की उम्र और उनकी शारीरिक जरूरतों के अनुसार ही संतुलित पोषक तत्वों से युक्त आहार देना चाहिए। फार्म में यह भी सुनिश्चित करें कि सभी पक्षियों को भोजन करने के लिए पर्याप्त जगह और दाना मिले। पानी की व्यवस्था के मामले में, मुर्गियों को चौबीसों घंटे साफ और ताजा पानी उपलब्ध होना चाहिए। पानी के बर्तनों की नियमित रूप से धुलाई और सफाई होनी चाहिए। भीषण गर्मी के दिनों में पानी की आपूर्ति में किसी भी तरह की कमी मुर्गियों के स्वास्थ्य पर विपरीत असर डाल सकती है।
मौसम के अनुसार शेड प्रबंधन और अलगाव की रणनीति
विभिन्न मौसमों के दौरान मुर्गियों की शारीरिक आवश्यकताएं बदल जाती हैं, इसलिए मौसम के बदलाव के साथ शेड के प्रबंधन में बदलाव करना आवश्यक होता है। ग्रीष्म ऋतु के दौरान मुर्गी घर में पर्याप्त हवा के संचार का उचित प्रबंध होना चाहिए ताकि मुर्गियों को गर्मी के तनाव से बचाया जा सके। इसके विपरीत, शीत ऋतु में फार्म को ठंडी हवा के सीधे झोंकों से बचाने के लिए पर्दे या अन्य सुरक्षात्मक इंतजाम किए जाने चाहिए। यदि मौसम में अचानक कोई बड़ा बदलाव आता है, तो मुर्गियों के व्यवहार और सेहत का गहन निरीक्षण करना चाहिए।
बीमारियों के लक्षण और पशु चिकित्सक की सलाह
यदि फार्म में कोई मुर्गी अचानक सुस्त दिखने लगे, चलना-फिरना बंद कर दे, दाना-पानी छोड़ दे या उसमें किसी भी बीमारी के लक्षण दिखाई दें, तो उसे बिना कोई समय गंवाए तुरंत स्वस्थ मुर्गियों से अलग कर देना चाहिए। सुस्त मुर्गी को आइसोलेट करने से अन्य पक्षियों में संक्रमण फैलने की संभावना काफी हद तक खत्म हो जाती है। वहीं, अगर फार्म में एक साथ कई मुर्गियां बीमार पड़ने लगें या मुर्गियों की अचानक मृत्यु होने लगे, तो स्थिति को स्वयं संभालने की बजाय तत्काल किसी योग्य पशु चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए। डॉ. राकेश कुमार तिवारी का स्पष्ट मानना है कि सही आवास, सख्त स्वच्छता, संतुलित आहार, ताजा पानी और मौसमी देखभाल के नियमों का पालन करके पशुपालक अपने फार्म को नुकसान से बचा सकते हैं।



















