मानसून का आगमन गोंडा जिले के मत्स्य पालकों के लिए नए अवसर लाने के साथ कई तरह की चुनौतियां भी खड़ी करता है। इस मौसम में बारिश के कारण तालाबों में पानी का स्तर तेजी से बढ़ता है। यद्यपि बढ़ा हुआ जल स्तर मछली पालन के लिए अनुकूल दिखता है, लेकिन यदि तालाब की उचित देखभाल न की जाए तो जल की गुणवत्ता बिगड़ने लगती है। समय पर उचित कदम न उठाने पर मछलियों में विभिन्न रोग पनप सकते हैं या बड़ी संख्या में उनकी मृत्यु हो सकती है। इस स्थिति से किसानों को गंभीर आर्थिक क्षति झेलनी पड़ सकती है, इसलिए बारिश के दिनों में तालाब और मछलियों की दैनिक आधार पर निगरानी करना अत्यंत आवश्यक है।
ऑक्सीजन की कमी और जल प्रबंधन की आवश्यकता
लगातार तेज वर्षा होने से तालाब के पानी की गुणवत्ता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। वर्षा जल के सीधे मिलने से कई बार तालाब में घुलित ऑक्सीजन का स्तर अचानक गिर जाता है। जब पानी में ऑक्सीजन की कमी होने लगती है, तो मछलियां सांस लेने के लिए बार-बार पानी की ऊपरी सतह पर आकर मुंह चलाने लगती हैं। मत्स्य पालक गुरुचरन निषाद के अनुसार, यदि इस स्थिति को देखकर तुरंत आवश्यक व्यवस्था न की जाए तो मछलियों का दम घुट सकता है और वे मर सकती हैं। इस समस्या के समाधान के लिए तालाब में त्वरित रूप से ऑक्सीजन टैबलेट का छिड़काव किया जा सकता है। इसके साथ ही तालाब में पानी के प्रवाह और उसके सही स्तर का संतुलन बनाए रखना बेहद जरूरी होता है।
अमोनिया के बढ़ते स्तर को चूने से करें नियंत्रित
बरसात के समय तालाब के पानी में अमोनिया गैस का स्तर बढ़ने की संभावना भी काफी अधिक हो जाती है। अमोनिया की मात्रा में वृद्धि होने से मछलियों के शारीरिक स्वास्थ्य पर सीधा बुरा असर पड़ता है, जिससे उनका स्वाभाविक विकास रुक जाता है। इस विषैली स्थिति से बचाव के लिए विशेषज्ञों की सलाह लेकर तालाब में निर्धारित मात्रा में चूने का छिड़काव करना चाहिए। चूना पानी के पीएच मान को संतुलित रखता है और अमोनिया के प्रभाव को निष्प्रभावी करता है, जिससे जल की शुद्धता बनी रहती है और मछलियां स्वस्थ वातावरण में तेजी से विकसित होती हैं।
मुसलाधार बारिश में चारा न डालने की सलाह
भारी बारिश के दौरान मछलियों को भोजन या पूरक आहार देने से बचना चाहिए। बरसात के दिनों में मछलियों की प्राकृतिक भोजन क्षमता और भूख सामान्य दिनों की तुलना में कम हो जाती है। ऐसे में यदि तालाब में कृत्रिम चारा डाला जाता है, तो मछलियां उसे पूरी तरह नहीं खाती हैं। यह बचा हुआ चारा तालाब की तलहटी में जमा हो जाता है और धीरे-धीरे सड़ने लगता है। चारे के सड़ने से पानी में कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य हानिकारक गैसों का निर्माण होता है, जो जल पारिस्थितिकी को दूषित कर मछलियों के लिए जानलेवा साबित हो सकती हैं।
सतत निगरानी से सुरक्षित रहेगी उपज और बढ़ेगा मुनाफा
मानसून की पूरी अवधि में तालाब की स्वच्छता, जल की स्थिति और मछलियों की हर गतिविधि पर बारीक नजर रखनी चाहिए। गुरुचरन निषाद का कहना है कि थोड़ी सी मुस्तैदी और सही जानकारी के साथ किए गए प्रबंधन से मछलियों को किसी भी प्रकार के नुकसान से बचाया जा सकता है। नियमित सफाई और संतुलित देखरेख से न केवल मछलियों की सुरक्षा सुनिश्चित होती है, बल्कि किसान अपनी उपज बढ़ाकर बाजार में बेहतर मुनाफा भी अर्जित कर सकते हैं।



















