बागेश्वर जिले के फलटनिया गांव में लगातार हो रही मूसलाधार बारिश के दौरान 65 वर्षीय बुजुर्ग तारा सिंह के मकान का ऊपरी हिस्सा ढह गया। यह हादसा उस वक्त हुआ जब तारा सिंह घर के अंदर ही मौजूद थे। राहत की बात यह रही कि वह मलबे की चपेट में आने से बाल-बाल बच गए। हालांकि, इस प्राकृतिक हादसे ने एक अकेले और बीमार बुजुर्ग के सामने रहने और इलाज का बड़ा संकट खड़ा कर दिया है। पत्नी के निधन के बाद से घर में अकेले रह रहे तारा सिंह गंभीर रूप से पीलिया बीमारी से भी जूझ रहे हैं। आपदा की इस घड़ी में जब उनके अपने बच्चों ने दूरी बना ली, तब रेडक्रॉस की टीम ने मौके पर पहुंचकर उन्हें सहारा दिया और तत्काल जिला अस्पताल में भर्ती कराया।
बारिश के बीच अचानक जमींदोज हुआ मकान का ऊपरी हिस्सा
मकान ढहने की घटना के बारे में जानकारी देते हुए रेडक्रॉस सचिव आलोक पांडे ने बताया कि क्षेत्र में पिछले कई दिनों से मूसलाधार बारिश जारी थी। इसी दौरान तारा सिंह के मकान का ऊपरी ढांचा अचानक भरभराकर नीचे गिर गया। हादसे के समय बुजुर्ग तारा सिंह कमरे के भीतर ही थे। अगर मलबा सीधे उनके ऊपर गिरता तो बड़ा हादसा हो सकता था, लेकिन गनीमत रही कि उनकी जान बच गई। मकान क्षतिग्रस्त होने के कारण बारिश के बीच उनके सिर से छत छीन गई। पहले से ही शारीरिक कमजोरी और पीलिया जैसी बीमारी की मार झेल रहे बुजुर्ग के लिए यह घटना किसी बज्रपात से कम नहीं थी। सिर छिपाने की जगह न होने के कारण वह खुले में रहने को मजबूर हो गए थे।
बीमारी और अकेलेपन की दोहरी मार झेल रहे 65 वर्षीय बुजुर्ग
राजस्व उपनिरीक्षक महासंघ के प्रदेश अध्यक्ष विजयपाल मेहता ने तारा सिंह की स्थिति के बारे में विस्तार से बताया। उन्होंने कहा कि लगभग तीन वर्ष पूर्व तारा सिंह की पत्नी का देहांत हो गया था। पत्नी के चले जाने के बाद से ही वह गांव वाले इस घर में पूरी तरह अकेले रह रहे थे। पारिवारिक पृष्ठभूमि की बात करें तो तारा सिंह का एक भरा-पूरा परिवार है, जिसमें उनके दो बेटे और दो बेटियां हैं। हालांकि, सभी चारों बच्चे रोजगार और आजीविका की तलाश में गांव छोड़कर बाहर के बड़े शहरों में जा बसे हैं। बढ़ती उम्र और पीलिया रोग के कारण तारा सिंह का स्वास्थ्य लगातार गिर रहा था और उन्हें रोजमर्रा के कामों के लिए भी किसी न किसी सहारे की सख्त जरूरत थी, लेकिन घर पर कोई देखभाल करने वाला नहीं था।
रेडक्रॉस ने मौके पर पहुंचकर पहुंचाया अस्पताल, बच्चों ने मोड़ा मुंह
घटना की सूचना मिलते ही रेडक्रॉस की टीम तुरंत फलटनिया गांव पहुंची। बुजुर्ग की दयनीय हालत और उनकी खराब सेहत को देखते हुए टीम ने बिना किसी देरी के राहत कार्य शुरू किया। रेडक्रॉस कार्यकर्ताओं ने तारा सिंह को तुरंत सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया और इलाज के लिए जिला अस्पताल में भर्ती कराया। इस दौरान रेडक्रॉस के पदाधिकारियों ने उनके परिवार से संपर्क साधने की कोशिश की। रेडक्रॉस जिलाध्यक्ष इंद्र सिंह फर्स्वाण ने बताया कि तारा सिंह के चारों बच्चों से फोन पर संपर्क करके स्थिति की जानकारी दी गई और उनसे पिता की मदद के लिए आने का अनुरोध किया गया। हालांकि, बच्चों की तरफ से कोई सकारात्मक या अपेक्षित प्रतिक्रिया नहीं मिली। संतान की इस बेरुखी ने इस पूरी घटना को और अधिक दर्दनाक बना दिया है।
पहाड़ों में पलायन और अपनों के बिना तरसते बुजुर्गों का दर्द
फलटनिया की यह दुखद घटना केवल एक टूटे हुए मकान की कहानी नहीं है, बल्कि यह उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में बुजुर्गों की उस गहरी पीड़ा को उजागर करती है जो पलायन के कारण उत्पन्न हो रही है। बेहतर भविष्य और रोजगार की खोज में युवा पीढ़ी शहरों का रुख कर रही है, जिसके चलते गांवों में बुजुर्ग माता-पिता अकेले छूट जाते हैं। विषम परिस्थितियों, बीमारी या प्राकृतिक आपदा के समय इन बुजुर्गों के पास अपनों का साया नहीं होता। ऐसी स्थिति में अक्सर पड़ोसी ही उनके सुख-दुख के साथी बनते हैं और रेडक्रॉस जैसी सामाजिक संस्थाएं आपातकालीन सहायता प्रदान करती हैं।
सामाजिक ताने-बाने पर उठते गंभीर सवाल
यह मामला हमारे समाज के सामने एक बेहद संवेदनशील और गंभीर प्रश्न खड़ा करता है। क्या बुजुर्ग माता-पिता के प्रति बच्चों की जिम्मेदारी केवल दूर रहकर औपचारिक बातें करने तक सीमित है? जीवन के अंतिम पड़ाव पर जब माता-पिता को सबसे अधिक शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक सहारे की जरूरत होती है, तब उनका अकेला रह जाना सामाजिक ताने-बाने के बिखरने की गवाही देता है। तारा सिंह के लिए रेडक्रॉस की ओर से दी गई मदद ने तात्कालिक राहत तो प्रदान कर दी है और अस्पताल में उनका इलाज जारी है, लेकिन अपने ही बच्चों द्वारा नकारे जाने और अकेलेपन का जो गहरा जख्म उन्हें मिला है, उसकी भरपाई कोई भी संस्था नहीं कर सकती।



















