अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौता हो चुका है और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप होर्मुज स्ट्रेट को पूरी तरह खोलने की घोषणा भी कर चुके हैं, फिर भी ईंधन की आपूर्ति को पटरी पर लौटने में अभी कुछ वक्त लग सकता है। इसी आशंका को ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार ने एक अहम कदम उठाया है। सरकार ने डीजल और एविएशन टर्बाइन फ्यूल (ATF) के निर्यात पर लगने वाली ड्यूटी बढ़ा दी है, ताकि देश के भीतर पेट्रोलियम उत्पादों की पर्याप्त उपलब्धता बनी रहे और घरेलू मांग को पहले पूरा किया जा सके।
नई दरें और क्या नहीं बदला
वित्त मंत्रालय के राजस्व विभाग की अधिसूचना के अनुसार, अब डीजल के निर्यात पर 14 रुपये प्रति लीटर और ATF के निर्यात पर 12.5 रुपये प्रति लीटर की ड्यूटी वसूली जाएगी। ध्यान देने वाली बात यह है कि पेट्रोल के निर्यात पर लगने वाली ड्यूटी में कोई फेरबदल नहीं किया गया है। इसके साथ ही घरेलू बाजार में बिकने वाले पेट्रोल और डीजल पर मौजूदा उत्पाद शुल्क (Excise Duty) भी पहले की तरह ही रहेगा। सरकार की ओर से तय की गई ये नई दरें आज से प्रभावी हो गई हैं।
यह कदम क्यों उठाया गया
दरअसल यह कोई पहली बार की गई कार्रवाई नहीं है। मार्च 2026 में जब ईरान का अमेरिका और इजरायल के साथ टकराव चल रहा था, तभी सरकार ने पेट्रोल, डीजल और ATF के निर्यात पर विशेष अतिरिक्त उत्पाद शुल्क (SAED) और रोड एंड इंफ्रास्ट्रक्चर सेस (RIC) लगाया था। इसका साफ मकसद था कि कंपनियां जरूरत से ज्यादा निर्यात न करें और घरेलू बाजार में ईंधन की कमी न होने पाए। सरकार हर 15 दिन में अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल, पेट्रोल, डीजल और ATF की कीमतों की समीक्षा करती है और उसी आधार पर इन दरों को घटाती-बढ़ाती है। इससे पहले 1 जून को इन टैक्सों में बदलाव किया गया था।
सरकार का भरोसा, कमी नहीं है
दूसरी ओर पेट्रोलियम मंत्रालय ने देशवासियों को आश्वस्त किया है कि भारत में पेट्रोल, डीजल, एलपीजी और प्राकृतिक गैस की कोई किल्लत नहीं है। मंत्रालय ने आम लोगों और उद्योगों दोनों से अपील की है कि वे ऊर्जा का इस्तेमाल जिम्मेदारी के साथ करें।
पेट्रोलियम मंत्रालय की संयुक्त सचिव सुजाता शर्मा ने सोमवार को एक प्रेस ब्रीफिंग में स्थिति को विस्तार से समझाया। उन्होंने बताया कि देश की सभी रिफाइनरियां पूरी क्षमता पर काम कर रही हैं और कच्चे तेल का भंडार भी पर्याप्त मात्रा में मौजूद है। उन्होंने जोर देकर कहा कि बीते दिनों कुछ इलाकों में जो दबाव महसूस किया गया, उसकी वजह आपूर्ति की कोई कमी नहीं थी, बल्कि मांग के स्वरूप में आया बदलाव था।
असल दिक्कत कहां से आई
सरकार के आंकड़ों के मुताबिक, औद्योगिक और कमर्शियल उपभोक्ता आमतौर पर अपने निजी पंपों से डीजल लेते हैं, लेकिन मई महीने में करीब 42 करोड़ लीटर डीजल की यह खपत खुदरा पेट्रोल पंपों की ओर खिसक गई। इसी बदलाव के चलते कुछ क्षेत्रों के रिटेल आउटलेट्स पर अचानक अतिरिक्त बोझ आ गया, जिससे वहां दबाव की स्थिति बन गई।
200 लीटर की अस्थायी सीमा
इसी हालात पर काबू पाने के लिए केंद्र सरकार ने 11 जून को एक अस्थायी आदेश जारी किया। इसके तहत अब खुदरा पंपों से किसी एक व्यक्ति को एक दिन में अधिकतम 200 लीटर डीजल ही दिया जा सकेगा। बड़े औद्योगिक और व्यावसायिक उपभोक्ताओं से कहा गया है कि वे अपनी जरूरत का डीजल अपने उपभोक्ता पंपों से ही लें। सरकार ने स्पष्ट किया है कि यह व्यवस्था करीब 90 दिनों के लिए अस्थायी रूप से लागू की गई है और इसका एकमात्र उद्देश्य आम उपभोक्ताओं को किसी तरह की असुविधा से बचाना है।
पेट्रोलियम मंत्रालय का कहना है कि देश में ईंधन की उपलब्धता पूरी तरह सामान्य है, इसलिए घबराकर अतिरिक्त खरीदारी करने की कोई जरूरत नहीं है। सरकार लगातार पूरी स्थिति पर नजर बनाए हुए है और आगे जरूरत पड़ने पर और भी कदम उठाए जा सकते हैं।













