जगतपुर इलाके में खेती की तस्वीर पूरी तरह बदल गई है. यहां करीब 50 एकड़ से ज्यादा जमीन पर अब मखाने की खेती लहलहा रही है, जिस जमीन को कभी सिर्फ पानी भरा रहने की वजह से बेकार समझा जाता था. लोग अब इसी जमीन से मोटी कमाई कर रहे हैं.
पहले क्या उगाते थे किसान
स्थानीय किसान बताते हैं कि इस इलाके में पहले वे थोड़ी-बहुत सब्जियां लगाते थे, जबकि ज्यादातर किसान केले की खेती पर निर्भर थे. मुनाफा सीमित था क्योंकि यहां की जमीन ज्यादातर मौसम में जलजमाव की शिकार रहती थी और पारंपरिक फसलें ठीक से टिक नहीं पाती थीं.
सबौर कृषि विश्वविद्यालय ने दिखाया रास्ता
जगतपुर के इस हिस्से में साल के 7 महीने से ज्यादा समय तक पानी जमा रहता है. यही वजह थी कि यहां पारंपरिक खेती फायदे का सौदा नहीं बन पा रही थी. इस बीच सबौर कृषि विश्वविद्यालय से कुछ विशेषज्ञ यहां पहुंचे और किसानों को मखाने की खेती के बारे में जानकारी दी. विशेषज्ञों ने समझाया कि जलजमाव वाली यही जमीन मखाने की खेती के लिए सबसे मुफीद है.
पहली बार में ही अच्छा मुनाफा, लेकिन दिक्कतें भी आईं
किसानों ने पहली बार मखाने की खेती शुरू की तो अच्छा-खासा मुनाफा हुआ. हालांकि शुरुआत में कई दिक्कतें भी सामने आईं, क्योंकि यह तरीका किसानों के लिए बिल्कुल नया था और उन्हें इसका कोई पुराना अनुभव नहीं था. अब वे शुरुआती दिक्कतें दूर हो चुकी हैं और किसानों को भरोसा है कि आने वाले समय में वे बड़े पैमाने पर मखाने की खेती कर पाएंगे.
अब बागवानी की तरफ भी बढ़ रहे किसान, आय हो रही दोगुनी
मखाने की सफलता के बाद इलाके के किसान पुरानी खेती छोड़कर नई फसलों की तरफ रुख कर रहे हैं. इससे उनकी आय दोगुनी होने लगी है. अब यहां सेब, नारंगी, अनानास, एपल बेर और अमरूद जैसे फलों की बागवानी भी शुरू हो चुकी है, जिससे किसानों को पहले से कहीं ज्यादा मुनाफा मिल रहा है.
इलाके की बदलती तस्वीर
कुल मिलाकर जगतपुर इलाके की खेती और किसानों की माली हालत, दोनों में बड़ा बदलाव आया है. जो जमीन कभी सिर्फ जलजमाव की वजह से जानी जाती थी, वही अब मखाने और बागवानी की फसलों से किसानों के लिए कमाई का जरिया बन गई है. आने वाले समय में हालात और बेहतर होने की उम्मीद जताई जा रही है.











