कृषि क्षेत्र में घटते भूजल स्तर और बढ़ती लागत के बीच किसान अब ऐसी फसलों के विकल्प तलाश रहे हैं जिनमें बार-बार बुवाई की जरूरत न पड़े और सिंचाई भी कम लगे। राजस्थान के करौली जिले में किसान इस समय पारंपरिक खेती से अलग हटकर थाई एप्पल की बागवानी को प्राथमिकता दे रहे हैं। गेहूं और चना जैसी फसलों में हर सीजन भारी लागत और सिंचाई की जरूरत होती है, जबकि थाई एप्पल के पौधे एक बार लगाने के बाद कई वर्षों तक लगातार फल देते हैं। यही कारण है कि यह बागवानी कम मेहनत में किसानों की आय बढ़ाने का एक मजबूत माध्यम बनकर उभर रही है।
बार-बार की बुवाई और खेत तैयारी के खर्च से राहत
थाई एप्पल की खेती की सबसे प्रमुख विशेषता यह है कि इसमें किसानों को हर मौसम में नए बीज खरीदने या खेत की जुताई करने की आवश्यकता नहीं पड़ती। पारंपरिक फसलों में बुवाई से लेकर कटाई तक कई चरणों में लागत आती है, लेकिन थाई एप्पल के मामले में एक बार पौधे रोपने के पश्चात उचित देखभाल से लंबे समय तक उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है। इससे सीजन दर सीजन खेत तैयार करने का खर्च बचता है और खेती की शुद्ध लागत में काफी कमी आती है।
कटाई-छंटाई का समय और फल आने का चक्र
इस बागवानी में पौधों की सही समय पर कटाई-छंटाई का बहुत बड़ा योगदान होता है। विशेषज्ञों और अनुभवी किसानों के मुताबिक फरवरी से मार्च के महीनों में पौधों की कटाई-छंटाई की जाती है। इसके तुरंत बाद पौधों में नई शाखाएं फूटने लगती हैं। शाखाओं के समुचित विकास के बाद अक्टूबर और नवंबर के आसपास पौधों पर फल आने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। इस व्यवस्थित चक्र के कारण किसानों को साल के उत्तरार्ध में फलों का बेहतर उत्पादन और बाजार मूल्य मिलता है।
कम सिंचाई में बेहतर पैदावार और जल संरक्षण
करौली जैसे जल संकट से जूझने वाले इलाकों के लिए थाई एप्पल की खेती बेहद उपयोगी मानी जा रही है। जहां गेहूं, चना और अन्य मौसमी फसलों को पूरे चक्र के दौरान बार-बार सिंचाई की आवश्यकता होती है, वहीं थाई एप्पल के पौधों को बहुत कम पानी की जरूरत पड़ती है। कम पानी में भी ये पौधे बेहतर विकास करते हैं, जिससे किसान सीमित जल संसाधनों का उपयोग करके भी अपनी खेती को टिकाऊ और लाभदायक बना सकते हैं।
सह-फसली खेती से दोहरी कमाई का अवसर
थाई एप्पल के बागों का एक और बड़ा फायदा खाली जमीन का कुशल उपयोग है। पौधों के बीच की जगह खाली छोड़ने के बजाय किसान वहां आलू और मूंगफली जैसी अंतरवर्ती यानी सह-फसली खेती कर रहे हैं। इससे किसानों को केवल सेब की बिक्री पर निर्भर नहीं रहना पड़ता। मुख्य फसल के तैयार होने के दौरान सह-फसल से होने वाली उपज किसानों को अतिरिक्त आर्थिक सहायता प्रदान करती है और एक ही खेत से दोहरा लाभ मिलता है।
सफल बागवानी के लिए ध्यान देने योग्य मुख्य बातें
हालांकि थाई एप्पल की खेती में मेहनत कम लगती है, लेकिन इसे पूरी तरह देखभाल मुक्त नहीं माना जा सकता। बेहतर पैदावार हासिल करने के लिए किसानों को पौधों के बीच की सही दूरी, समय पर जैविक खाद और सिंचाई का ध्यान रखना पड़ता है। इसके अलावा फरवरी और मार्च में समय पर छंटाई के साथ-साथ कीट और बीमारियों से बचाव प्रबंधन भी अनिवार्य है। पौधे खरीदते समय उनकी किस्म और गुणवत्ता की जांच करना भी सफलता की कुंजी है।



















