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पानी में कांटों के बीच से निकलता है पूर्णिया का मखाना, फिर भी किसानों से मुनाफा दूर क्यों?व्यापार
11 घंटे पहले· 1

पानी में कांटों के बीच से निकलता है पूर्णिया का मखाना, फिर भी किसानों से मुनाफा दूर क्यों?

व्हाइट गोल्ड कहे जाने वाले मखाने ने पूर्णिया को ग्लोबल पहचान दी है, लेकिन कच्चे मखाने यानी गुड़िया की कीमत घटकर 21000 रुपये प्रति क्विंटल रह जाने से इस सीजन किसानों को मुनाफे की चिंता सता रही है.

बिहार के पूर्णिया में मखाना अब सिर्फ एक फसल नहीं बल्कि एक पहचान बन चुका है. सुपर फूड और व्हाइट गोल्ड के नाम से मशहूर यह मखाना पूर्णिया की सीमाओं को पार कर विदेशों तक अपनी जगह बना चुका है. यही वजह है कि आज बड़ी संख्या में किसान बड़े पैमाने पर मखाना की खेती कर रहे हैं. हालांकि मखाना की कीमत में उतार चढ़ाव आम बात है और इस बार किसानों के चेहरे पर मुनाफे को लेकर चिंता की लकीरें साफ नजर आ रही हैं.

बाजार या घरों में जो सफेद रंग का मखाना लाबा दिखता है, वह यूं ही आसानी से तैयार नहीं होता. इसके पीछे किसानों और मजदूरों की जबरदस्त मेहनत और जोखिम छिपा है. पानी की गहराई में उगे कांटों के बीच से मखाना निकालना बेहद कठिन काम माना जाता है. मौके पर मौजूद मजदूर और किसान बताते हैं कि इस दौरान अक्सर हाथों पर खरोंच तक आ जाती है. यही वजह है कि खेती करने वाले लोग मखाना की खेती को सबसे रिस्की खेती में गिनते हैं.

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गुड़िया से सफेद मखाना तैयार होने की पूरी प्रक्रिया

मखाना की खेती में फसल बोने के करीब 6 महीने बाद कच्चे मखाने की फसल यानी गुड़िया को पानी से निकाला जाता है. इसके बाद गुड़िया को अच्छी तरह साफ किया जाता है. साफ की गई गुड़िया को मखाना फोड़ी पर लाया जाता है, जहां कई चरणों में इसे तैयार किया जाता है. सबसे पहले इसे धूप में सुखाया जाता है, फिर बालू की आग पर गर्म किया जाता है. इसके बाद आकार के हिसाब से गुड़िया को पीटकर फोड़ा जाता है, तब जाकर सफेद रंग का मखाना लाबा तैयार होता है. इसी तैयार मखाने को फिर बाजार में बेचा जाता है.

21000 रुपये प्रति क्विंटल पर अटकी गुड़िया की कीमत

कच्चे मखाने यानी गुड़िया का दाम ही असल में यह तय करता है कि सफेद मखाने से किसानों को कितना मुनाफा मिलेगा. मखाना की खेती करने वाले किसानों और गुड़िया निकालने बेचने वाले मजदूरों तथा व्यापारियों ने बताया कि पहले के सीजन में हमेशा काले कच्चे मखाने यानी गुड़िया की कीमत ऊंची रहती थी. लेकिन इस बार यह कीमत घट गई है और फिलहाल कच्चे मखाने की गुड़िया 21000 रुपये प्रति क्विंटल के भाव पर बिक रही है. मौके पर मौजूद खैरू, वसीर, सुमित, मोजीम सहित अन्य लोगों ने बताया कि इस बार मखाना की खेती करने वाले किसानों को मुनाफे की चिंता सता रही है.

ज्यादा उत्पादन, कम खपत बना रहा नुकसान की वजह

किसानों और मजदूरों के मुताबिक मखाना की खेती करने वाले किसानों की संख्या लगातार बढ़ रही है. इसका सीधा असर यह हुआ है कि मखाना का उत्पादन तो बढ़ गया है, लेकिन उसकी खपत उस अनुपात में नहीं बढ़ी. उत्पादन ज्यादा और खपत कम होने की इसी वजह से मखाना की खेती इस बार किसानों को नुकसान की तरफ धकेल सकती है. यानी जो मखाना विदेशों में अपनी पहचान बनाकर सुपर फूड का दर्जा पा चुका है, उसी की खेती करने वाले किसान अब मुनाफे को लेकर असमंजस में हैं.

सवाल-जवाब

मखाना को व्हाइट गोल्ड क्यों कहा जाता है?
सुपर फूड के तौर पर इसकी बढ़ती मांग और ग्लोबल पहचान के चलते मखाना को व्हाइट गोल्ड कहा जाता है.
कच्चे मखाने यानी गुड़िया की मौजूदा कीमत क्या है?
फिलहाल कच्चे मखाने की गुड़िया 21000 रुपये प्रति क्विंटल के भाव पर बिक रही है.
सफेद मखाना कैसे तैयार होता है?
गुड़िया को पहले धूप में सुखाया जाता है, फिर बालू की आग पर गर्म कर आकार के हिसाब से पीटा जाता है, तब जाकर सफेद मखाना लाबा तैयार होता है.
मखाना की खेती को सबसे रिस्की खेती क्यों माना जाता है?
पानी की गहराई में कांटों के बीच से मखाना निकालने में मजदूरों को अक्सर खरोंच तक आ जाती है, इसलिए इसे सबसे रिस्की खेती माना जाता है.
इस सीजन किसानों को मुनाफे की चिंता क्यों है?
पहले काले कच्चे मखाने की कीमत ऊंची रहती थी, लेकिन इस बार कीमत घटकर 21000 रुपये प्रति क्विंटल रह गई है, जिससे मुनाफा घटने की आशंका है.
मखाना की कीमत घटने की मुख्य वजह क्या बताई गई है?
मखाना की खेती करने वाले किसानों की संख्या बढ़ने से उत्पादन ज्यादा हो गया है, जबकि खपत उस अनुपात में नहीं बढ़ी, यही असंतुलन नुकसान की वजह बन सकता है.
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