दरभंगा के मिथिलांचल क्षेत्र में बड़े पैमाने पर केले की खेती की जाती है, जहां किसान बेहतर पैदावार पाने के लिए अपनी फसलों पर लगातार मेहनत करते हैं। इस प्रक्रिया में अक्सर देखा जाता है कि किसान नाइट्रोजन पर तो पूरा ध्यान केंद्रित करते हैं, लेकिन पोटाश जैसे महत्वपूर्ण पोषक तत्व की तरफ से लापरवाही बरत जाते हैं। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, इस तरह की अनदेखी किसानों को भारी पड़ सकती है क्योंकि पोटाश की कमी न केवल केले के पौधे के समग्र विकास को बाधित करती है, बल्कि पैदा होने वाले फलों और उनके गुच्छों की गुणवत्ता को भी गहराई से प्रभावित करती है।
कृषि विशेषज्ञों की राय और आंकड़े
डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय के पौधा रोग एवं सूत्रकृमि विभाग के प्रोफेसर डॉ. एस.के. सिंह का कहना है कि केले की बंपर और उच्च गुणवत्ता वाली पैदावार हासिल करने के लिए नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश यानी एनपीके का संतुलित प्रबंधन होना अनिवार्य है। देश के कृषि आंकड़ों पर नजर डालें तो भारत में कुल लगभग 9.48 लाख हेक्टेयर भूमि पर केले की खेती की जाती है, जिससे सालाना करीब 377 लाख टन उत्पादन प्राप्त होता है। इतने बड़े पैमाने पर होने वाली इस बागवानी में जरा सी भी पोषण संबंधी चूक बड़े पैमाने पर असर डाल सकती है।
पोटाश की कमी के मुख्य कारण
एक ही खेत में लगातार कई सत्रों तक केले की फसल उगाते रहना, मिट्टी में जैविक खाद की कमी होना, हल्की या रेतीली मिट्टी का होना और भारी बरसात के कारण जरूरी पोषक तत्वों का बह जाना पोटाश की कमी के प्रमुख कारण साबित होते हैं। केले के पौधों को अपने जीवन चक्र में पोटाश की बहुत अधिक मात्रा में आवश्यकता होती है, इसलिए जब मिट्टी में इसकी कमी होती है, तो इसका सीधा और नकारात्मक असर पौधे की वानस्पतिक वृद्धि और अंततः उत्पादन की मात्रा पर पड़ता है।
पैसे और उपज को बचाने के लक्षण पहचानें
पोटाश की कमी होने पर पौधे सबसे पहले पुरानी पत्तियों के माध्यम से अपने संकेत देते हैं। पत्तियों के किनारों पर सबसे पहले पीलापन उभरता है, जो वक्त के साथ भूरे रंग में बदलने लगता है और धीरे-धीरे पत्तियां किनारों से सूखने लगती हैं। इसके अतिरिक्त पौधे की लंबाई या फैलाव रुकना, कमजोर तना, पत्तियों का आपस में मुड़ना और फलों के गुच्छों का आकार में छोटा रह जाना भी इसी की तरफ इशारा करते हैं। हालांकि, केवल इन बाहरी लक्षणों को देखकर ही पोटाश की कमी की पक्की पुष्टि नहीं की जा सकती, जिसके लिए मिट्टी की वैज्ञानिक जांच करवाना सबसे विश्वसनीय उपाय माना जाता है।
नुकसान की आशंका और सही प्रबंधन के उपाय
विशेषज्ञों का स्पष्ट करना है कि हर खेत में पोटाश की कमी की वजह से सीधे तौर पर 40 फीसदी का ही नुकसान हो, यह कोई अनिवार्य नियम नहीं है, क्योंकि कुल नुकसान इस बात पर निर्भर करता है कि कमी कितनी गंभीर है, उस क्षेत्र की मिट्टी की भौतिक स्थिति कैसी है और किसान किस तरह का फसल प्रबंधन अपना रहे हैं। फिर भी, यदि स्थिति गंभीर हो जाए तो उपज में भारी गिरावट आ सकती है, जिससे किसानों को आर्थिक झटका लग सकता है। इसलिए बिना मिट्टी की जांच किए अंधाधुंध तरीके से एमओपी यानी म्यूरिएट ऑफ पोटाश या अन्य पोटाश आधारित उर्वरक खेतों में नहीं डालने चाहिए। किसानों को आवश्यकता के अनुसार सही मात्रा का आकलन करके इसे विभाजित खुराकों में देना ज्यादा फायदेमंद रहता है। जिन खेतों में ड्रिप सिंचाई की सुविधा उपलब्ध है, वहां कृषि विशेषज्ञों की देखरेख में फर्टिगेशन प्रक्रिया अपनाई जा सकती है। इसके अलावा खेतों में सड़ी हुई गोबर की खाद और कम्पोस्ट खाद का नियमित प्रयोग मिट्टी की उपजाऊ क्षमता और गुणवत्ता को बनाए रखने में मदद करता है। पत्तियों पर पोटाश का छिड़काव करते समय भी विशेष सावधानी बरतने की आवश्यकता होती है, क्योंकि घोल की अधिक सांद्रता होने पर पत्तियां झुलस सकती हैं। अंततः, केले की फसल में पानी और पोटाश दोनों का ही संतुलित प्रबंधन जरूरी है और किसानों को किसी भी नुकसान का इंतजार करने के बजाय समय पर मिट्टी की जांच कराकर सही पोषण प्रबंधन करना चाहिए।



















