देशभर में किसान अपनी खेती से होने वाली आमदनी को बढ़ाने के लिए नई-नई तकनीकों और तरीकों को अपना रहे हैं। आमतौर पर देखा जाता है कि अधिकांश किसान अपने खेतों के मुख्य हिस्से में फसलों की बुवाई तो करते हैं, लेकिन खेत के चारों तरफ मौजूद मेड़ यानी सीमा क्षेत्र को पूरी तरह खाली छोड़ देते हैं। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, यदि किसान इस खाली पड़ी जमीन का योजनाबद्ध तरीके से उपयोग करें, तो यही मेड़ भविष्य में उनके लिए एक बड़े वित्तीय फंड का जरिया बन सकती है। खेत के किनारों पर सागवान और पॉपलर जैसे उच्च गुणवत्ता वाले इमारती लकड़ी देने वाले पेड़ लगाकर फसल उत्पादन को प्रभावित किए बिना लाखों रुपये की अतिरिक्त कमाई की जा सकती है।
खेती की जमीन बचाकर अतिरिक्त कमाई का बेहतर विकल्प
खंडवा के कृषि सलाहकार नरेंद्र पटेल का कहना है कि खेत की खाली मेड़ पर व्यावसायिक दृष्टि से महत्वपूर्ण पेड़ लगाना किसानों के लिए अतिरिक्त आय अर्जित करने का एक बेहतरीन माध्यम है। पारंपरिक खेती में जहां फसलों से हर सीजन में नियमित आय मिलती है, वहीं मेड़ पर लगाए गए इमारती पेड़ लंबे समय बाद एकमुश्त बड़ी वित्तीय मदद प्रदान करते हैं। इस पद्धति का सबसे बड़ा लाभ यह है कि इसके लिए किसान को अपनी मुख्य खेती योग्य भूमि में कोई कटौती नहीं करनी पड़ती।
इसके अतिरिक्त, मेड़ पर लगाए गए यह मजबूत पेड़ खेत की प्राकृतिक सीमा का निर्माण करते हैं। इससे खेत की बाउंड्री स्पष्ट रहती है और पड़ोसी खेतों के साथ सीमाओं को लेकर होने वाले विवादों की संभावना भी कम हो जाती है। जब ये पौधे बढ़कर विशाल वृक्ष का रूप लेते हैं, तो बाजार में इनकी लकड़ी की बहुत अधिक कीमत मिलती है, जिससे किसान अपने परिवार की भावी वित्तीय जरूरतों को आसानी से पूरा कर सकते हैं।
सागवान की खेती: मजबूत लकड़ी और दीर्घकालिक वित्तीय सुरक्षा
सागवान को भारत में इमारती लकड़ियों का राजा माना जाता है। अपनी उत्कृष्ट मजबूती, टिकाऊपन और दीमक-रोधी गुणों के कारण सागवान की लकड़ी का उपयोग महंगे फर्नीचर, मकानों के दरवाजे, खिड़कियों और भारी निर्माण कार्यों में प्रमुखता से किया जाता है। कृषि सलाहकार नरेंद्र पटेल के अनुसार, किसानों को सागवान के पौधे लगाने के लिए मानसून के मौसम का चुनाव करना चाहिए, क्योंकि इस दौरान मिलने वाली स्वाभाविक नमी पौधों की शुरुआती ग्रोथ के लिए बेहद अनुकूल होती है।
सागवान का पौधारोपण करते समय खेत की मेड़ पर ऐसी जगह का चयन करना बेहद जरूरी है जहां बारिश का पानी ठहरता न हो। जलभराव वाली जमीन में सागवान के पौधों की जड़ें सड़ने लगती हैं, इसलिए अच्छी जल निकासी वाली दोमट या बलुई मिट्टी इसके लिए सबसे उपयुक्त मानी जाती है। पौधे लगाते समय दो पौधों के बीच पर्याप्त दूरी बनाई रखनी चाहिए ताकि जब वे बड़े हों तो एक-दूसरे के विकास में बाधा न बनें। इसके साथ ही, इस बात का भी ध्यान रखना आवश्यक है कि पेड़ों की जड़ें और घनी शाखाएं मुख्य फसल के पोषण और धूप को न रोकें।
पॉपलर का चुनाव: तेज बढ़त और स्थानीय जलवायु का आंकलन
सागवान के अलावा पॉपलर भी एक प्रमुख इमारती लकड़ी देने वाला पेड़ है जो किसानों को कम समय में अच्छा मुनाफा दे सकता है। पॉपलर का पेड़ बहुत तेजी से बढ़ता है और प्लाइवुड उद्योग, माचिस उद्योग तथा पैकिंग बॉक्स बनाने में इसकी लकड़ी की जबरदस्त मांग रहती है। हालांकि, कृषि विशेषज्ञों का स्पष्ट कहना है कि पॉपलर की खेती हर भौगोलिक क्षेत्र या हर तरह के मौसम में संभव नहीं होती।
इसलिए, मेड़ पर पॉपलर के पौधे लगाने से पहले किसानों को अपने क्षेत्र की स्थानीय जलवायु और कृषि वैज्ञानिकों से सलाह अवश्य लेनी चाहिए। पॉपलर के बेहतर विकास के लिए उपजाऊ दोमट मिट्टी और समुचित जल निकासी वाली जमीन सबसे अच्छी मानी जाती है। पौधों की रोपाई के बाद शुरुआती वर्षों में पर्याप्त सिंचाई, समय पर खाद और नियमित देखभाल की आवश्यकता होती है। यदि शुरुआत में पौधों पर ध्यान दिया जाए, तो यह पेड़ तेजी से तैयार होकर किसानों को बढ़िया आय दिलाता है।
मेड़ पर पौधरोपण करते समय ध्यान रखने योग्य जरूरी सावधानियां
खेत की मेड़ पर इमारती पेड़ लगाते समय किसानों को कुछ बेहद महत्वपूर्ण बातों का ध्यान रखना चाहिए ताकि मुख्य फसल के उत्पादन पर कोई नकारात्मक असर न पड़े। सबसे पहली बात यह है कि पौधों को इस तरह लगाया जाना चाहिए कि उनकी छाया मुख्य फसल पर अधिक समय तक न पड़े, अन्यथा फसल की प्रकाश संश्लेषण प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। इसके लिए पेड़ों की छांटाई और दूरी का विशेष ख्याल रखा जाना चाहिए।
पौधरोपण के शुरुआती दो से तीन वर्षों में खरपतवार नियंत्रण, कीट सुरक्षा और नियमित सिंचाई पर ध्यान देना बेहद जरूरी है। इसके साथ ही समय-समय पर निचली शाखाओं की छंटाई करते रहना चाहिए ताकि पेड़ सीधा और मोटा बढ़े। कृषि सलाहकार नरेंद्र पटेल बल देकर कहते हैं कि मेड़ पर लगाए गए पेड़ों को तुरंत आय देने वाला साधन न समझें, बल्कि इसे एक दीर्घकालिक सावधि जमा यानी फिक्स डिपॉजिट की तरह देखें। जब यह पेड़ पूरी तरह तैयार हो जाते हैं, तो किसान को एकमुश्त मोटी रकम मिलती है जो उनके खेती के व्यवसाय को और अधिक मजबूत बनाती है।



















